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प्रख्यात लेखिका, मूर्धन्य साहित्यकार कृष्णा सोबती नहीं रहीं

जन्म : 18 फरवरी 1925
निधन : 25 जनवरी 2019
1980 में ‘ज़िन्दगीनामा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
1996 में उन्हें साहित्य अकादमी की फेलोशिप मिली जो कि अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है।
2017 में इन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान “ज्ञानपीठ पुरस्कार” से सम्मानित किया गया है।
उनके लेखन की कुछ स्मृतियाँ: 
”सर्जक की आँख पाना एक पुरस्कार है। कलाकार की आँख साधना लेखक के परिश्रम का सुफल और इन दोनों में संतुलन द्रष्टा की सामर्थ्य का संयोग, इन भरपूर क्षमताओं से लगभग परे लेखक को मात्र एक शिक्षार्थी की तरह जीवन भर सीखते चले जाना है। कोई भी रचनात्मक टुकड़ा अपने बीज और प्रकृति में, क़िस्म में एक साथ सार, संक्षिप्त, विस्तार और सघनता से प्रस्तुत किया जाए तो लेखक की मानसिक संलग्नता और रचना की सहवर्तिता एक-दूसरे के समानांतर रहते हैं। लेखक लिपिक होकर रचना से डिक्टेशन लेता है। इसी से संवेदनात्मक जोड़, योग और चित्ताकाश पर फैले बहु-संयोग रचना में जज़्ब हो जाते हैं।”
‘जो मैंने जिया वही मैंने लिखा’
“मैं उस सदी की पैदावार हूँ जिसने बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ छीन लिया. यानी एक थी आज़ादी और एक था विभाजन. मेरा मानना है कि लेखक सिर्फ़ अपनी लड़ाई नहीं लड़ता और न ही सिर्फ़ अपने दुःख-दर्द और ख़ुशी का लेखा जोखा पेश करता है.
लेखक को उगना होता है भिड़ना होता है हर मौसम और हर दौर से. नज़दीक और दूर होते रिश्तों के साथ, रिश्तों के गुणा और भाग के साथ. इतिहास के फ़ैसलों और फ़ासलों के साथ.
मेरे आसपास की आबोहवा ने मेरे रचना संसार और उसकी भाषा को तय किया. जो मैने देखा जो मैने जिया वही मैंने लिखा.”
अब आदरणीया स्व. कृष्णा सोबती जी की स्मृतियाँ शेष हैं। e-abhivyakti परिवार उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
सादर नमन!

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी एवं मित्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलित)

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