॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #14 (56 – 60) ॥ ☆

रघुवंश सर्ग : -14

मूर्छित सीमा को हुआ कुछ न दुःख का भान।

किन्तु चेतना पा दुखी हुई असीम अजान।।56अ।।

 

लक्ष्मण के उद्वोध से और बढ़ा दुखभार।

मूर्छा ने दी शांति, पर चेत ने कष्ट अपार।।56ब।।

 

पतिनिंदा उसने न की, यद्यपि निर-अपराध।

कोसा खुद को हर तरह फिर-फिर मन को साध।।57।।

 

सीता को धीरज बँधा, क्षमा माँग चुप-चाप।

वाल्मीकि-आश्रम का पथ दिखा, सहा संताप।।58।।

 

सीता बोली- ‘‘खुश रहो, तुम अग्रज आधीन।

वैसेहि जैसे विष्णु है इंद्र के आगे दीन’’।।59।।

 

सासों को कहने कहा लक्ष्मण से तो प्रणाम।

और कामना कुशल की सुखी हो जिससे राम।।60।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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