॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #14 (71 – 75) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -14
अश्रुपोंछ रोदन विरत सिया ने किया प्रणाम।
मुनि ने आशीर्वाद दे मन को दिया विराम।।71।।
कहा उन्होंने ध्यान बल से मुझको है ज्ञान।
है मिथ्या अपवाद पर होनी है बलवान।।72अ।।
पुत्री तुम निर्दोष हो तजो मनः संताप।
अन्य देश में पिता गृह में हो समझो आप।।72ब।।
जग संकटहारी सतत् दृढ़प्रतिज्ञ हैं राम।
पर तुम प्रति व्यवहर से कुद्ध मैं उनके नाम।।73।।
श्वसुर तुम्हारे दशरथ सखा मेरे विख्यात।
पिता जनक ज्ञानी बड़े तव सज्जन अवदात।।74अ।।
तुम पावन पतिव्रता हो अग्र पूज्य अविभाज्य।
इससे मेरे स्नेह का तुम पर है साम्राज्य।।74ब।।
तापस आश्रम में यहाँ रहो निडर निर्बाध।
हो पूरी निर्विघ्न तव पुत्र प्राप्ति की साध।।75अ।।
होंगे पूरे पुत्र के सभी जात संस्कार।
स्नेह पूर्ण होंगे यहाँ सबके सब व्यवहार।।75ब।।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈