☆ पुस्तक चर्चा ☆ “संवेदना (शताधिक काव्य रचनाएँ)” – कवि : श्री सुरेश पटवा ☆ साभार – डॉ साधना बलवटे ☆

पुस्तक : संवेदना (शताधिक काव्य रचनाएँ)

लेखक : श्री सुरेश पटवा 

प्रकाशक : समदर्शी प्रकाशन 

पृष्ठ संख्या : 206 

मूल्य : 320 रुपये

☆ “सम+वेदना की कविताएँ” – डॉ साधना बलवटे ☆

संवेदन से अनुभूति होती है या अनुभूति के कारण संवेदना जन्म लेती है यह प्रश्न बड़ा जटिल है। यदि हमारा मन संवेदनशील है तो वह अनुभूति कराता है किंतु कई बार किसी की पीड़ा या हर्ष  की अनुभूति करने के बाद संवेदना जन्म लेती है।  दोनों ही स्थितियों में संवेदना का अनुभूति से गहरा संबंध है। संवेदना अर्थात सम्+वेदना!  किसी की वेदना को समान रूप से अनुभव करना है संवेदना है। साधारण तौर पर वेदना का अर्थ केवल पीड़ा से लिया जाता है। किसी के ह्रदय में  उठे हर्ष, विषाद ,पीड़ा, आनंद, करुणा, उल्लास को देखकर आपके ह्रदय में जो सामान भाव उठते हैं वह सभी  वेदना है।  किसी पराए के मन में उठे भावों की अनुभूति आपके हृदय में समान रूप से होती है,  इसीलिए वह सम्वेदना कहलाती हैं।

डॉ साधना बलवटे

आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपनी पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास” के पृष्ठ 407 पर जयशंकर प्रसाद के कामायनी के “आशा सर्ग” के चिंता उपसर्ग संदर्भ में लिखते हैं कि

*

मनु का मन था विकल हो उठा,

संवेदन से खाकर चोट। 

संवेदन जीवन जगती को,

जो कटुता से देता घोट।

*

आह कल्पना का सुंदर यह,

जगत मधुर कितना होता।

सुख-स्वप्नों का दल छाया में,

पुलकित हो जगता-सोता।

*

संवेदन का और हृदय का,

यह संघर्ष न हो सकता।

फिर अभाव असफलताओं की,

गाथा कौन कहाँ बकता।

*

इन पंक्तियों में संवेदन बोध वृत्ति के अर्थ में व्यवहृत जान पड़ता है। बोध के एकदेशीय अर्थ में भी यदि संवेदन को लें तो उसे भावभूमि से ख़ारिज नहीं कर सकते। आगे चलकर संवेदन शब्द अपने वास्तविक या अवास्तविक दुख पर कष्ट अनुभव के रूप में आया है –

हम संवेदन शील हो चले,  यही मिला सुख,

कष्ट समझने लगे बनाकर निज कृत्रिम दुख।

श्री सुरेश पटवा जी का काव्य संग्रह “संवेदना” इसी प्रवृत्ति की परिणति है। समाज के प्रत्येक दुख, अभाव और आनंद उनके हृदय में वेदना पैदा करते हैं। अनुभूति की गहराइयां उन्हें प्रत्येक स्थिति में कलम चलाने को विवश करती है, इसीलिए उनका यह काव्य संग्रह विषय वैविध्य से परिपूर्ण है। गीत ग़ज़ल जैसी अनुशासित विधा पर लेखनी चलाने वाले सुरेश पटवा जी मुक्त छंद में भी उसी सहजता के साथ अभिव्यक्त होते हैं। सहजता और सरलता उनकी कविता की विशेषता है। सरल शब्दों में व्यक्त की गई भावनाएं पाठकों तक सरलता से पहुंच जाती हैं। सरल होना एक कठिन कार्य है, जबकि कठिन होना सरल। सरल होने का कठिन कार्य पटवा जी ने किया है। एक ओर  वे जीव विज्ञान की विस्तृत समझ रखते हैं, वहीं दूसरी ओर अध्यात्म से भी उनका गहरा नाता है।

वे जीवन के जटिल विषयों पर लेखन करते हैं, नर्मदा यात्रा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी लेखन करते हैं। कुल मिलाकर सभी विषयों पर समान अधिकार रखते हैं। विषय वैविध्य, विचार वैविध्य, विधा वैविध्य को अपने ज्ञान वैविध्य से साधते हैं। संग्रह की कविताएं समाज का मुखपत्र हैं। एक संवेदनशील मन जो अपना सामाजिक दायित्व निर्वहन करते हुए मुखरता से जो कुछ कहना चाहिए वह सब अपनी कविताओं में कहते हैं, किंतु इस कहन की विशेषता यह है कि उसे कहते हुए  वह अपनी करुणा या दुख का प्रदर्शन नहीं करते, उनकी कविताएं रोती चीखती चिल्लाती नहीं है, वरन दृढ़ता के साथ शिकायती लहजे में अपनी बात कहती है। ये शिकायती कविताएं जिम्मेदारों पर तंज भी करती है उलहाने भी देती है और चेतावनी देने के साथ सावधान भी करती हैं। कविता का यही धर्म है और सुरेश पटवा जी का ये काव्य संग्रह उस धर्म का बखूबी पालन करता है एक अच्छे संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

© डॉ साधना बलवटे

निदेशक, निराला सृजन पीठ, राष्ट्रीय मंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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