श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जीवन दर्शन…” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # 38 ☆ जीवन दर्शन… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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राम नहीं इक नाम
विचारों का मंथन है।
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सरयु का जल
पीकर जिसने
मर्यादा ओढ़ी
निर्वासित हो
गया लाँघकर
महलों की ड्योढ़ी
शब्द एक अविराम
जगत मिथ्या क्रंदन है।
*
शापित सी है
उम्र अहिल्या
राह रचे सन्यास
संकल्पों से
बंधे उदधि तो
पूरा हो वनवास
संघर्षों के नाम
नियति गढ़ती चिंतन है।
*
संयम शेष
अशेष कामना
सीता का संताप
झूठ के आगे
सत्य झेलता
परित्यक्ता का श्राप
जारी है संग्राम
यही जीवन दर्शन है।
…।…
© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈