प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “गजल – जियो और जीने दो…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # 205 ☆ गजल – जियो और जीने दो… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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जियो और जीने दो सबको यह सिद्धांत सुहाना है
निश्चित हो जन हितकारी है औं जाना पहचाना है
इसके द्वारा ही जग मे सुख शांति हमेशा आती है
किंतु आज आतंकवाद का उभरा नया जमाना है
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निर्दोषो का खून हो रहा गाँव गली शैतानी है
कब किसके संग कैसे क्या हो कोई नही ठिकाना है
जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी
हर बुराई को तज के मन से सहज भाव अपनाना है
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तरस रहे है तडप रहे है दीन दुखी अंधियारों मे
स्नेह दीप ले सबको मन से सही राह दिखलाना है
बिन समझे जो भटक रहे है स्वार्थो के गलियारो मे
जीवन औ ममता का मतलब उन्हें साफ समझाना है
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द्वेष हमेशा दुखदायी है प्रेमभाव सुखदाता है
आपस का संबंध मधुर कर जग को स्वर्ग बनाना है
सबको साथ लिये बढने से ही हो समृद्धि सहज
बैर भव रखने वालों को यह ही मंत्र पढाना है
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
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