हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 11 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

इस उपन्यासिका के पश्चात हम आपके लिए ला रहे हैं श्री सूबेदार पाण्डेय जी भावपूर्ण कथा -श्रृंखला – “पथराई  आँखों के सपने”

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 12 – गोविन्द ☆

(अब  तक आपने पढ़ा  —- पगली का विवाह हुआ, ससुराल आई, सुहागरात को नशे की पीड़ा झेलनी पड़ी, कालांतर में एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जहरीली शराब पीकर पति मरा, नक्सली आतंकी हिंसा की ज्वाला ने पुत्र गौतम की बलि ले ली, पगली बिछोह की पीड़ा सह नही सकी। वह सचमुच ही पागलपन की शिकार हो दर दर भटक रही थी।  तभी अचानक घटी एक घटना ने उसका हृदय विदीर्ण कर दिया। वह दर्द तथा पीड़ा से कराह उठी। अब आगे पढ़े——-)

गोविन्द एक नाम एक व्यक्तित्व जिसकी पहचान औरों से अलग, गोरा चिट्टा रंग घुंघराले काले बाल, चेहरे पर हल्की मूछें, मोतीयों सी चमकती दंत मुक्तावली, चेहरे पे मोहक मुस्कान।  हर दुखी इंसान के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना उसे लाखों की भीड़ में अलग पहचान दिलाती थी। वह जब माँ के पेट में था, तभी उसके सैनिक पिता सन् 1965 के भारत पाक युद्ध में सीमा पर लड़ते हुए शहीद हो  गये।

उन्होंने मरते मरते अपने रण कौशल से दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये।  दुश्मन की कई अग्रिम चौकियों को पूरी तरह तबाह कर दिया था।

जब तिरंगे में लिपटी उस बहादुर जवान की लाश घर आई, तो सारा गाँव जवार  उसके घर इकठ्ठा हो गया था। गोविन्द की माँ पछाड़ खाकर गिर पड़ी थी पति के शव के उपर।  उस अमर शहीद को बिदाई देने सारा क्षेत्र उमड़ पड़ा था। हर आंख नम थी, सभी ने अपनी भीगी पलकों से उस शहीद जवान को अन्तिम बिदाई दी थी।

उन आखिरी पलों में सभी  सामाजिक मिथकों को तोड़ते हुये गोविन्द की माँ ने पति के शव को मुखाग्नि दी थी।

उस समय स्थानीय प्रशासन  तथा जन प्रतिनिधियों ने भरपूर मदद का आश्वासन दे वाहवाही भी लूटी थी। लेकिन समय बीतते लोग भूलते चले गये।

उस शहीद की बेवा के साथ किये वादे को, उसको मिलने वाली सारी सरकारी सहायता नियमों कानून के मकड़जाल तथा भ्रष्टाचार के चंगुल में फंस कर रह गई।

अब वह बेवा अकेले ही मौत सी जिन्दगी का बोझ अपने सिर पर ढोने को विवश थी।  क्या करती वह, जब पति गुजरा था तो उस वक्त वह गर्भ से थी।

उन्ही विपरीत परिस्थितियों में गोविन्द नें अपनी माँ की कोख से जन्म लिया था।  उसके भविष्य को  ले उस माँ ने अपनी आँखों में बहुत सारे सुनहरे सपनें सजाये थे।  उस गरीबी में भी बडे़ अरमानों से अपने लाल को पाला था। लेकिन जब गोविन्द पांच बरस का हुआ, तभी उसकी माँ दवा के अभाव में टी बी की बीमारी से एड़ियाँ रगड़ रगड़ कर  मर गई। विधाता ने अब गोविन्द के सिर से माँ का साया भी छीन लिया था।  नन्हा गोविन्द इस दुनियाँ में अकेला हो गया था।

ऐसे में उसका अगला ठिकाना बुआ का घर ही बना था। गोविन्द के प्रति उसकी बुआ के हृदय  में दया तथा करूणा का भाव था, लेकिन वह अपने पति के ब्यवहार से दुखी तथा क्षुब्ध थी, गोविन्द का बुआ के घर आना उसके फूफा को रास नही आया था। उसे ऐसा लगा जैसे उसके आने से बच्चों के प्रति उसकी माँ की ममता बट रही हो।

वह बर्दाश्त नही कर पा रहा था गोविन्द का अपने परिवार के साथ रहना। इस प्रकार दिन बीतते बीतते गोविन्द बारह बरस का हो गया।
अब घर में गोविन्द एक घरेलू नौकर बन कर रह गया था।  लेकिन वह तो किसी और ही मिट्टी का बना था।  पढ़ाई लिखाई के प्रति उसमें अदम्य इछा शक्ति तथा जिज्ञासा थी।  वह  बुआ के लड़कों को रोज तैयार हो स्कूल जाते देखता तो उसका मन भी मचल उठता स्कूल जाने के लिए। लेकिन अपने फूफा की डांट खा चुप हो जाता।  एक दिन खेल खेल में ही बुआ के बच्चों के साथ उसका झगड़ा हुआ।

उस दिन उसकी  खूब जम कर पिटाई हुई थी।  इसी कारण गोविन्द नें अपनी बुआ का घर रात के अन्धेरे में छोड़ दिया था तथा सड़कों पर भटकने के लिए मजबूर हो गया था।

– अगले अंक में7पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग – 13 – सीढियाँ

© सूबेदार पांडेय “आत्मानंद”

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