श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पार्टी/शन।)

?अभी अभी # 423 ⇒ पार्टी/शन? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पार्टीशन को आप बंटवारा भी कह सकते हैं। मैं देश के बंटवारे की बात नहीं कर रहा, क्योंकि मेरा जन्म आजादी के बाद ही हुआ, इसलिए देश की आजादी में मेरा कोई योगदान नहीं। साथ ही आजादी के साथ ही हुए बंटवारे के लिए भी मैं जिम्मेदार नहीं। जो कथित रूप से जिम्मेदार थे, उन्हें भी सब जानते हैं।

पार्टीशन, डिविजन को भी कहते हैं। जब तक दो भाई प्रेम से रहते हैं, बंटवारे की बात नहीं होती, जहां परिवार बढ़ा, हर व्यक्ति अपने हिस्से और अधिकार की बात करने लगता है। अगर समझदारी और राजी खुशी से पार्टिशन हो जाए, तो सबको बराबरी से अपना हिस्सा मिल जाता है, लेकिन विवाद की स्थिति में मनमुटाव भी होता है, और कोर्ट कचहरी का मुंह भी देखना पड़ता है।।

संपत्ति का बंटवारा तो आप आसानी से कर सकते हैं, लेकिन देश का बंटवारा कैसे हो, लोगों के दिलों का बंटवारा कैसे हो। दूरदर्शन पर सन् १९८७ में एक धारावाहिक का प्रसारण हुआ था, बुनियाद, जिसमें एक ऐसे ही परिवार की दास्तान, मनोहर श्याम जोशी की कलम से, पर्दे पर प्रस्तुत की गई है।

बुनियाद का मुख्य पात्र हवेलीराम (आलोक नाथ) अपने पारिवारिक कर्तव्यों और स्वतंत्र भारत में रहने की इच्छा के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष करता है। आखिरकार, उसे देश के विभाजन के बाद बनी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच भी जीना पड़ता है।।

भले ही पार्टिशन गलत हुआ हो, बाद की बिगड़ती परिस्थितियों और पड़ोसी देश द्वारा आतंकवादी गतिविधियों के चलते, आज हमें इस कड़वे सच को स्वीकार करना पड़ेगा, कि अब हम हमारा रिश्ता भाई भाई का नहीं, एक दुश्मन देश का है। हिंदी चीनी भाई भाई का स्वाद हम पहले ही चख चुके हैं।

देश की छोड़िए, आज घर घर में हो रहे पार्टिशन की बात कीजिए। पहले दिलों के बीच दरार पड़ती है, उसके बाद ही घर के बीच दीवार खड़ी होती है। कैसे आदर्श संयुक्त परिवार थे, जहां सभी बड़े छोटे, काका बाबा, बेटे बहू और नाती पोते, एक ही छत के नीचे रहते थे। लेकिन पिछले ५० वर्षों में सब कुछ बदल गया है।।

आज अगर दो भाई ही साथ साथ नहीं रह सकते, तो हम कैसे उम्मीद करें कि हिंदू मुसलमान साथ साथ रह सकते हैं। सरकार किसी की भी हो, सियासत की फितरत एक जैसी रहती है।

अंग्रेज भले ही चले गए हों, लेकिन डिवाइड एंड रूल का महामंत्र पीछे छोड़ गए हैं। ये दुश्मनी हम नहीं छोड़ेंगे, मर मिटेंगे, लेकिन दुश्मन को मिटाकर ही दम लेंगे। भाईचारे की बात छोड़िए, हमारा दुश्मन चाहे भूखा मरे अथवा चारा खाए। हमने दुश्मन को भाई मानने से इंकार कर दिया है।।

पहले दिलों में दरार पड़ती है, दीवार तो बाद में खड़ी होती है। क्या टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली कोई अल्ट्राट्रैक सीमेंट नहीं। पांच रुपए के फेवीक्विक से बच्चों के खिलौने और घरों की क्रॉकरी जोड़ने के भ्रामक विज्ञापन तो बहुत देखे हैं, ज़ख्मी दिलों पर लगाने वाला मरहम हम अभी तक ईजाद नहीं करवा पाए।

क्या दिल की बीमारी का दिल के दर्द से कोई संबंध है। है कोई विज्ञान के पास ऐसी स्कैनिंग मशीन, जो दिल के जख्मों को पहचान ले। क्या घात प्रतिघात और बदले की भावना, तनाव और मानसिक आघात को जन्म नहीं देती। जिन चेहरों पर बनावटी मुस्कुराहट नजर आ रही है, कौन जानता है?

उनके दिलों का दर्द। काश हम स्वार्थ, खुदगर्जी और जोड़ तोड़ का कुछ तोड़ निकाल पाते। दो दिलों के बीच की दीवार को गिरा पाते।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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