॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (41 – 45) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -15
कुशल पूँछने पर कहा सब कुछ कर विस्तार।
पर वर्जित वाल्मीकि से आश्रम का न विचार।।41।।
कभी तभी एक विप्र निज युवापुत्र की देह।
लेकर रोते एक दिन आया उनके गेह।।42।।
बोला वसुधे तुम पड़ी घोर विपदा में आज।
जो आई दशरथ से तुम भ्रष्ट राम के हाथ।।43।।
अति लज्जित चिंतित हुये सुन यह बातें राम।
क्योंकि जानता था न कोई पुत्र-मृत्यु का नाम।।44।।
दुखी पिता से क्षमा हित माँग विनत हो दान।
किया मृत्यु पर विजय हित ‘पुष्पक’ का आव्हान।।45।।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈