॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (51 – 55) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -15
तप का उसे अधिकार नहिं, था वह अनुचित पोच।
समझ यही संहार का किया राम ने सोच।।51।।
तुहिन त्रस्त किंजल्क से थे उसके मुख-माल।
क्योंकि तापते अग्नि से झुलस गये थे बाल।।52अ।।
को संहारा राम ने कर ग्रीवा विच्छेद।
नृप को करना है उचित सही-गलत का भेद।।52ब।।
राज-दण्ड पा भी उसे मिला न सद्गति-द्वार।
सज्जन की गति तो मिली पर न हुआ उद्धार।।53।।
पक्ष में मिले अगस्त्य संग सुख-आनन यों राम।
शरद् भी खिलता चंद्र संग जैसे अधिक ललाम।।54।।
जलनिधि पायी अगस्त ने, उदधियुक्ति प्रतिदान।
जो पाये थे अस्त्र दिव्य दिये राम को दान।।55।।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈