॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #15 (61 – 65) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -15
पत्नी बिन संभव नहीं कोई धार्मिक विधान।
अतः कराई राम ने स्वर्ण मूर्ति निर्माण।।61अ।।
एक-पत्नी-व्रती राम से हुई न सीता दूर।
उनका त्याग महान भी रहा स्तुत्य भरपूर।।61ब।।
किया शास्त्र-विधि-संमत यज्ञ राम ने पूर्ण।
रक्षक वही राक्षस बने जो थे बाधक पूर्ण।।62।।
दिव्य ज्ञान से वाल्मीकि ने जो थी रची रामायण।
सीतासुत कुश-लव से ही लगे कराने गान।।63।।
राम चरित कवि वाल्मीकि, गायक कुश-लव गान।
फिर श्रोता वह कौन जो मुग्ध न हो मतिमान।।64।।
सुस्वरूप दो बालकों को करते मधु गान।
अनुज सहित श्रीराम ने देखा तज निज भान।।65।।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈