॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (86 – 88) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -16
यों कहते भूषण नृपति कर में देते, कन्या को कुश को समर्पित दिया कर।
कुश ने कहा-अब है आत्मीय मेरे सभी आप मन में न रक्खें कोई डर।।86।।
अग्नि को साक्षी बना ब्याह विधि से, ऊनी वलय मंगल सूत्र धारी।
कुमुदवती को तब ब्याह कुश ने अपनी विवाहिता पत्नी स्वीकारी।
होते ही ऐसा बजी दुदंभी, सब दिशाओं में मनहर मधुर ध्वनि छाई।
आकाश में मेघों ने आके सहसा, सुगंधित सुमन शुभ की वर्षा कराई।।87।।
इस विधि राम के आत्मज कुश को नाग कुमुद ने बना बहनोई,
राम के रूप श्री विष्णु के वाहन गरूड़ से भी निर्भीकता पाई।
तक्षक पुत्र कुमुद हुए साले, राज्य के सब के भयों से बचाया।
हो निश्चिंत तो कुश ने प्रजाप्रिय शासक बन कर राज्य बढ़ाया।।88।।
सोलहवां सर्ग समाप्त
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈