☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ सुमित्र संस्मरण ☆ आत्मकथ्य – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆
श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में सतत प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. ई-अभिव्यक्ति पर आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार को ‘साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष’ के अंतर्गत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के जीवन से संबन्धित विद्वतजनों के आत्मीय संस्मरणों पर आधारित आपकी पुस्तक सुमित्र संस्मरण पर आपका आत्मकथ्य।)
कौन कहता है कि सुमित्र जी हमारे बीच में नहीं रहे वह सदियों तक हम सभी के दिलों में जीवंत रहेंगे उनकी सहजता, सरलता, मिलन सारिता, प्रेम सहयोगात्मक रवैया एवं साहित्य एवं पत्रकारिता के प्रति उनका अनुराग और समर्पण स्मरणीय है. उन्होंने, रूस आदि देशों में जाकर संस्कारधानी का नाम साहित्य जगत में अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर गौरवान्वित, एवं रोशन किया है सुमित्र जी के साथ आचार्य भगवत दुबे जी एवं स्वर्गीय गार्गी शंकर मिश्रा हर कार्यक्रम में साथ-साथ रहे हैं. उनकी यह त्रिमूर्ति साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट उत्कृष्ट पहचान रखती है. पाथेय साहित्य अकादमी का गठन आपने किया, जिसके गठनोंपरांत सैकड़ो कृतियां पाथेय प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी हैं. आपसे जो भी मिला आप का होकर रह गया. हम जैसे नवोदित साहित्यकारों के लिए तो संजीवनी का काम करते थे और हमेशा समुचित मार्गदर्शन, आशीर्वाद और सानिध्य प्राप्त होता रहा है. मेरी प्रकाशित कृतियों में उनकी भूमिका एवं मार्गदर्शन मुझे प्राप्त होता रहा है.
साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें. क्योंकि श्रद्धांजलि सभा में सभी को अपनी भाव अभिव्यक्ति का अवसर देना संभव नहीं होता है. तब हमने श्री सुमित्र जी से जुड़े सभी साहित्यकारों से अपने-अपने संस्मरण आमंत्रित किए. आज उन्हीं के आशीर्वाद से यह सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन आपके सामने है.
जब हम सुमित्र जी की बात करते हैं तो भाई हर्ष की भी बात करना बहुत जरूरी है। आज के इस दौर में उनके जैसा पुत्र बमुश्किल देखने में नजर आता है। भाई हर्ष ने अपनी मातोश्री के साथ पिताजी की स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए गायत्री एवं सुमित्र सम्मान बड़े ही गौरव गरिमा के साथ स्वयं बाहर लोगों के स्वागत के लिए खड़े होकर संयोजित करना प्रणम्य एवं प्रसंसनीय है. साथ ही इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में ख्याति लब्ध हस्तियों को उनके द्वारा सम्मानित भी किया जाता है.
सुमित्र जी का एक दोहा मुझे बहुत ही प्रिय लगता है –
बांच सको तो बच लो आँखों का अखबार
प्रथम पृष्ठ से अंत तक, लिखा प्यार ही प्यार
इस एक दोहे से उनके व्यक्तित्व का स्पष्ट दर्शन होता है उनके दिल में सभी के लिए प्यार था.! हमने भी उनके जन्मोत्सव पर कुछ एक दोहे लिखे थे जो …
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राज करें हर दिलों में, राजकुमार सुमित्र
सबको अपने ही लगें, ऐसा मधुर चरित्र
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यथा नाम गुण के धनी, सबके हैं वो मित्र
मिले सदा स्नेह हमें, जीवन बने पवित्र
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मित्रों के भी मित्र हैँ, राजकुमार सुमित्र
मिलते सबसे प्रेम से, उनका हृदय पवित्र
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ज्ञान सुबुद्धि विवेक ही, होते सच्चे मित्र
संकट में जो साथ दें, होते वही सुमित्र
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जिनकी आभा से हमें, मिलता सदा प्रकाश
लेखन में गति शीलता, उनका दे आभास
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सुमित्र जी का आकस्मिक निधन समूचे साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है. उनके प्रति हम अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि भावांजलि प्रस्तुत करते हैं. डॉ हर्ष तिवारी, डॉक्टर भावना शुक्ला, श्रीमती कामना कौस्तुभ, चाचा श्री आनंद तिवारी एवं समूचे परिवार के प्रति उनके द्वारा प्रकाशन में दिए गए भावनात्मक सहयोग के लिए हम अत्यंत आत्मीयता के साथ आभार एवं कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं.
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
संस्थापक मंथनश्री
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
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