श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है दोहाश्रित सजल “कभी न भाते नेह के सपने… ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # 28 – सजल – कभी न भाते नेह के सपने… ☆
समांत- अता
पदांत- –
मात्राभार- 16
समझाने पर नहीं समझता।
अपनी आँखें मूंदे रहता।।
अहंकार को पाले मन में,
लहू बहा कर ही वह हँसता।
नव प्रकाश से नफरत करता,
आँख बंद कर सपने बुनता।
सदियों से बेड़ी में जकड़ा,
यही रही उसकी दुर्बलता।
कभी न भाते नेह के सपने
हँसी खुशी निश्छल निर्मलता।
मिली पराजय सदा उसे ही,
छद्म वेश धर रहा सुलगता।
आतंकों का गढ़ कहलाता,
करता तहस-नहस मानवता।
गड़ी आँख में बड़ी किरकिरी,
उपचारों से नहीं सफलता।
अब अरिमर्दन की अभिलाषा,
हम सबकी है यही विह्वलता।
© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
30 अगस्त 2021
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