श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्रि पर्व पर एक भावप्रवण रचना “आन विराजी भूमंडल पर… ”। )
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 120 ☆
☆ कविता – आन विराजी भूमंडल पर… ☆
कहीं विराजी गुफा में, ऊंचा बना कहीं आसन।
भिन्न-भिन्न रूपों में मैया, अलग-अलग तेरा वासन।
करते सभी मनुहार मैया, रखते श्रद्धा सुमिरन ।
जिसकी जैसी मनोभावना, पूरा करती पावन।।
पान सुपारी ध्वजा नारियल, मन के दीए जलाते।
हाथ जोड़ विनती करके, कन्या भोज खिलाते।।
कोई चढ़ाता छत्र यहां, कोई सोने का ताज।
जिसकी जैसी इच्छा शक्ति, माता का करे श्रृंगार।।
लाल चुनर ओढ़े मैया, शेरों पर करे सवार।
अनुपम मां रुप निराला, शक्ति का अवतार।।
अष्ट भुजा शस्त्र लिए, गले मोतियों की माल।
कुंचित केश लट बिखराए, नेत्र भृकुटी है लाल।।
दुष्टों का करती संघार, जन जन की सुने पुकार।
भक्तों का दुख दूर करती, भरती मां भंडार।।
आन विराजी भूमंडल पर, नव दिन है नव रात।
घर-घर जोत जलाए, भक्तों को मिले सौगात।।
© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈