श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा “रात का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना “अपेक्षाएँ हो रही बूढ़ी…”।)
☆ तन्मय साहित्य #127 ☆
☆ अपेक्षाएँ हो रही बूढ़ी… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
अपेक्षाएँ हो रही बूढ़ी
अब खनकती है नहीं चूड़ी।
देह का श्रृंगार
मन अंगार है
जीतने के यत्न
हिस्से, हार है,
युग-युगों से चल रही
यह अनन्तिम रूढ़ी
अपेक्षाएँ हो रही बूढ़ी।
लक्ष्य तक जाती
कईं पगडंडियाँ
हरी, नीली, लाल
पीली झंडियाँ,
रंग मनमौजी, न समझे
राह, कब कैसे मुड़ी
अपेक्षाएँ हो रही बूढ़ी।
मौन में बातें
स्वयं से ही करे
आहटें निश्चेष्ट
खुद से खुद डरे,
शाख टूटी, पेड़ से
फिर कब जुड़ी
प्रतिक्षाएँ हो रही बूढ़ी।
© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’
जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश
मो. 9893266014
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈