डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 84 – दोहे
सब कुछ तुमको मानकर, तोड़े सभी उसूल।
या पर्वत हो जाएंगे, या धरती की धूल।।
सांसों में तुम हो रचे, बचे कहां हम शेष।
अहम समर्पित कर दिया, करें और आदेश।।
नींद में निगोडी बस गई, जाकर उनके पास ।
धीरे धीरे कह गई, निर्वासन इतिहास ।।
जाग रही है आंख या जाग रही है पीर।
जाने कैसे नींद की, बदल गई तासीर।
नींद, आंख, आंसू ,सपन, जीवन के आधार ।
संजीवन की शक्ति है, प्यार, प्यार बस प्यार।।
© डॉ राजकुमार “सुमित्र”
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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