श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “संस्कारों के मूल्य…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 238 ☆ संस्कारों के मूल्य… ☆
अक्सर लोग शिकायती मुद्रा में दिखते हैं; हमेशा असंतुष्ट। किसी भी चीज में बुराई देखना तो मानो जन्मसिद्ध अधिकार है। दस कार्यों में यदि एक कार्य गलत भी होता है तो नौ को भूल कर उस दसवें के पीछे पड़ जाते हैं जो किसी कारणवश बिगड़ गया हो।
अब सोचिए यदि व्यक्ति डर कर कार्य करेगा तो सारे बिगड़ेंगे। जो करेगा उसी से तो गलती होगी। परन्तु नकारात्मक विचार धारा के लोग बस बाल की खाल निकाल कर खुद को श्रेष्ठ मानने का ढोंग करते हुए कब असहाय हो जाते हैं ये उन्हें पता ही नहीं चलता।
संस्कार का अर्थ -सजाना, अपने आस पास के परिवेश को नैतिक मूल्यों द्वारा समृद्ध करना जिससे भावी पीढ़ी संस्कारित हो अपनी संस्कृति पर गौरव कर सके। हमारे संस्कारों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाना ठीक वैसा ही है जैसे ये अजर अमर आत्मा एक शरीर को छोड़ दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।
भारतीय संस्कृति का ज्ञान वेदों में समाहित है जो हर भारतीय जनमानस में किसी न किसी रूप में देखा जा सकता है। हम अपने पूर्वजों के मूल्यों का अनुकरण करते हुए समाज में मिल जुल कर रहने का कार्य बड़ी निपुणता से करते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का मंत्र हमारे जीवन का आधार है। सर्वे भवन्तु सुखिनः… कार्यशैली है। देवों ने भी इस पुण्यधरा पर अवतरित होकर यहाँ की संस्कृति व संस्कार का परिमार्जन किया है। इन्हीं पद चिन्हों पर चलकर भारत का गौरव बढ़ा सकते हैं —
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संस्कार की जननी भारत
पुण्य धरा अवतारों की।
स्वर्ण कलश सी सम्मोहक है
गंग जमुन रसधारों की। ।
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यहीं कृष्ण की सम्मोहक छवि
गीता का वरदान मिला।
मर्यादा श्री रामचन्द्र सी
तुलसी मानस ज्ञान मिला। ।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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