श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – अब तो छोड़ो तुम नादानी। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 252 ☆
☆ अब तो छोड़ो तुम नादानी… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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अब तो छोड़ो तुम नादानी
सर से ऊपर निकला पानी
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कब तक शांत रहोगे भाई
समय ले रहा है अँगड़ाई
परशुराम फिर बनना होगा
याद दिला दो तुम भी नानी
अब तो छोड़ो तुम नादानी
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मातृभारती है पुकारती
आओ मिल सब करें आरती
माँ का अब अपमान सहो मत
बनना होगा अब बलिदानी
अब तो छोड़ो तुम नादानी
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अपनी संस्कृति को पहचानो
धर्म सनातन को तुम जानो
आँच न आए इस पर कोई
सार्थक होगी तभी जवानी
अब तो छोड़ो तुम नादानी
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छोड़ो अब सारी मजबूरी
नहीं चलेगी ये मगरूरी
आर-पार की लड़ो लड़ाई
नहीं बनो तुम अब अज्ञानी
अब तो छोड़ो तुम नादानी
*
जाति-पाँति अब भूलो भाई
है एकता में ही भलाई
तब ‘संतोष’ मिलेगा तुमको
जब होंगे बस हिंदुस्तानी
अब तो छोड़ो तुम नादानी
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈