सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम नवगीत – बावरे मंजुल नयन भी…।
रचना संसार # 43 – नवगीत – बावरे मंजुल नयन भी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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शब्द कुंठित हैं सभी अब,
नैन आँसू से भरे।
काँपती काया बहुत ये,
शांत स्वर मेरे डरे।।
अब विकल विटपी -विटप भी
बोझ जीवन ढो रहे।
कंटकों से है भरा पथ,
बीज कैसे बो रहे।।
नित्य पलकें भीग जातीं,
अब विपद भी क्या कहें।
मृदु कली कहती गगन से,
क्यों जगत में विष बहे।।
पीर कानन क्या बताएं,
वृक्ष सूखे हैं हरे।
स्वर्ण मृग को ढूँढता हैं,
अब मनुज बौरा गया।
ये धरा करती रुदन है,
कर ठगी भौंरा गया।।
मुख चमक फीकी हुई है,
अस्थि -पंजर हो रहे।
मूक भी कोयल हुई है,
और पंछी सो रहे।।
सब मुखौटे में खड़े हैं,
आदमी चारा चरे।
बावरे मंजुल नयन भी,
देखिए घबरा मिले।
मन कबीरा क्या लिखेगा,
मोंगरा कैसे खिले ।।
घोर छाया है तिमिर का
शाम सुख की है ढली।
चाल चलते हैं उजाले,
लक्ष्य भी भूला गली।।
आस की है डोर टूटी,
बोल हम कहते खरे।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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