डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पुरुष वर्चस्व और नारी। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 270 ☆
☆ पुरुष वर्चस्व और नारी… ☆
पितृसत्तात्मक युग के पुराने क़ायदे-कानून आज भी धरोहर की भांति सुरक्षित हैं और उनका प्रचलन बदस्तूर जारी है। हमारे पूर्वजों ने पुरुष को सर्वश्रेष्ठ समझ समस्त अधिकार प्रदान किए और नारी के हिस्से में शेष बचे मात्र कर्त्तव्य, जिन्हें गले में पड़े ढोल की भांति उसे विवशतापूर्वक आज तक बजाना पड़ रहा है। तदोपरांत उसे घर की चारदीवारी में कैद कर लिया गया कि वह अब गृहस्थी के सारे दायित्वों का वहन करेगी…यथा प्रजनन से लेकर पूरे परिवारजनों की हर इच्छा, खुशी व मनोरथ को पूर्ण करेगी; उनके इशारों पर कठपुतली की भांति ता-उम्र नाचेगी; उनके हर आदेश की सहर्ष अनुपालना करेगी और पति के समक्ष सदैव नतमस्तक रहेगी…जहां उसकी इच्छा का कोई मूल्य नहीं होगा। नारी के लिए निर्मित आदर्श-संहिता में ‘क्यों’ शब्द नदारद है, क्योंकि उसके लिए तो हर हुक्म बजाना अपेक्षित है… दासी और गुलाम की भांति ‘जी हां ‘कहना उसकी मात्र नियति है। इस संदर्भ में सीता का उदाहरण हमारे समक्ष है। वह पतिव्रता नारी थी, जिसने पति के साथ वनवास झेला और लक्ष्मण- रेखा पार करने पर क्या हुआ उसका अंजाम …सीता-हरण और आगे की कथा से तो आप सब परिचित हैं। ज़रा स्मरण कीजिए– शापित अहिल्या को, जिसे उसके पति त्रषि गौतम के श्राप-स्वरूप वर्षों तक शिला रूप में स्थित रहना पड़ा, क्योंकि इंद्र ने वेश बदल कर उसकी अस्मत पर हाथ डाला था। छल भी पुरुष द्वारा और उद्धारक भी पुरुष ही… इससे अंदाज़ लगा सकते हैं आप उसके दबदबे का, उसकी सर्वमान्य सर्वोच्च सत्ता का। महाभारत की पात्र द्रौपदी के इस वाक्य ‘अंधे की औलाद अंधी’ ने बवाल मचा दिया और उस रज:स्वला नारी को केशों से खींच कर भरी सभा में लाया गया, जहां उसका चीरहरण हुआ। प्रश्न उठता है, क्या किसी ने दुर्योधन व दु:शासन को दुष्कृत्य करने से रोका और उनकी निंदा की? शायद सब मर्यादा से बंधे थे और समर्पित थे राज्य के प्रति… सो! अंधा केवल धृतराष्ट्र नहीं, राजसभा में उपस्थित हर शख्स अंधा था, नपुंसक था, साहसहीन था। गुरू द्रौण, भीष्म व विदुर जैसे वरिष्ठजन भी अपनी पुत्रवधु की अस्मत लुटते हुए देखते रहे… आखिर क्यों? क्या उनका मौन रहना अक्षम्य अपराध नहीं था?
आइए! लौट चलते हैं सीता की ओर, जिसे रावण की अशोक-वाटिका में प्रवास झेलना पड़ा और लंका- दहन के पश्चात् अयोध्या लौटने पर सीता को एक धोबी के कहने पर विश्वामित्र के आश्रम में धोखे से छुड़वा दिया गया, जहां लव और कुश का जन्म हुआ। अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर लव व कुश द्वारा राम का घोड़ा पकड़ने पर राम का वहां आकर वीर बालकों से उनका परिचय पूछना, सीता से भेंट होना तथा उसका अग्नि-परीक्षा देना और पति के साथ अयोध्या लौट जाना। तदोपरांत एक धोबी के कहने पर सीता को अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के विरोध में राम को संतान सौंप पुन: धरती में समा जाना–क्या संदेश देता है मानव समाज को? नारी को कटघरे में खड़ा कर इल्ज़ाम लगाने के पश्चात् उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार न देना…क्या न्यायोचित है? यही सब हुआ था अहिल्या के साथ… गौतम ऋषि ने कहाँ हक़ीक़त जानने का प्रयास किया? उसे अकारण अपराधिनी समझ शिला बनने का श्राप दे डालना… क्या वह अनुचित नहीं था? इसमें आश्चर्य क्या है … आज भी यही प्रचलन जारी है। नारी पर इल्ज़ाम लगा उसे बे-वजह सज़ा दी जाती है, जबकि कोर्ट-कचहरी में भी मुज़रिम को अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया जाता है। परंतु नारी को जिरह करने का अधिकार कहां प्रदत्त है? वह हाड़-मांस की पुतली, जिसे भावहीन व संवेदनशून्य समझा जाता है; फिर उसमें बुद्धि होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है? वह तो सदियों से दोयम दर्जे की प्राणी स्वीकारी जाती है, जिसे संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की एवज़ में एक ही अधिकार प्राप्त है– ‘सहना’ और ‘कुछ नहीं कहना।’ यदि वह अपना पक्ष रखने का साहस जुटाती है, तो उसे ज़लील किया जाता है अर्थात् सबके सम्मुख प्रताड़ित कर कुलटा, कलंकिनी, कुलनाशिनी आदि विशेषणों द्वारा अलंकृत कर घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और उसके साथ ही समाज में पग-पग पर जाल बिछाए बैठे दरिंदे उसकी अस्मत लूट; किस प्रकार नरक में धकेल देते हैं…इससे तो आप सब परिचित हैं। वैसे जुर्म का बढ़ता ग्रॉफ़ भी इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए काफी है। सो! आप अनुमान लगा सकते हैं कि उस पीड़िता को कितनी शारीरिक यंत्रणा व मानसिक प्रताड़ना से गुज़रना पड़ता होगा? उस मासूम, बेकसूर, निर्दोष, मासूम बच्ची अथवा महिला को कितने ज़ुल्म सहने पड़ते होंगे…कारण दहेज हो या पति के आदेशों की अवहेलना; पति के अधिकारों के विस्तृत दायरों व कारस्तानियों की कल्पना तो आप भली-भांति कर ही सकते हैं।
आइए! चर्चा करते हैं पुरुष-वर्चस्व की…जन्म लेने से पूर्व कन्या-भ्रूण को नष्ट करने के निमित्त ज़ोर-ज़बर्दस्ती करना; जन्म के पश्चात् नवजात बालिका का मुख न देखना; प्रसव पीड़ा का संज्ञान न लेते हुए पत्नी पर ज़ुल्म करना और दूसरे ही दिन प्रसूता को घर के कामों में झोंक देना या घर से बाहर का रास्ता दिखा देना तथा पत्नी के देहांत के पश्चात् दूसरे विवाह के स्वप्न संजोना…सामान्य-सी बात है; घर-घर की कहानी है। बेटे-बेटी में आज भी अंतर समझा जाता है तथा बेटे को कुल-दीपक समझ उसके सभी दोष-अपराध क्षम्य स्वीकारे जाते हैं और पुत्री की अवहेलना, पुत्र की उतरन व जूठन पर उसका पालन-पोषण; हर पल उस मासूम पर दोषारोपण; व्यंग्य-बाणों की बौछार व उसे दूसरे घर जाना है… न जाने किस जन्म का बदला लेने आई है; इसने तो आते ही हमारे हाथ में कटोरा थमा दिया… ऐसे हृदय-विदारक जुमलों का सामना; तो उस अभागिन को आजीवन करना पड़ता है।
विवाह के अवसर पर पाँव में पायल, पाँव की अंगुलियों में बिछुए, हाथ में कंगन, अंगुलियों में अंगूठियां, कमर पर करधनी, नाक में नथ, कानों में कुंडल, माथे पर बिंदिया, मांग में सिंदूर व टीका और सिर से पांव तक आभूषणों से लदी, सजी-धजी महिला को आप क्या कहेंगे…मात्र एक वस्तु, जिसे उसके पति की ख़िदमत में पेश किया जाना है। वह कहां समझ पाती है कि वे आभूषण उसे बिना हथकड़ी के उम्र-भर बांधने का प्रयोजन हैं। महिला को ‘सदा सुहागिन रहो,’ व ‘पुत्रवती भव’ आदि आशीष भी उस ब्याहता के लिए नहीं; उनके अपने पुत्र की चिरायु व वंश बढ़ाने के लिए होते हैं।
काश! वह पुरूष वर्चस्व के दायरे को समझ पाती कि विवाहोपरांत तो दुल्हन से उसकी पहचान भी छीन ली जाती है, क्योंकि उसे पति के नाम व जाति से पुकारा जाता है। वह वस्तु-मात्र रह जाती है, जिसका कोई अस्तित्व व मूल्य नहीं होता। सारे व्रत, उपवास, कठोर नियम व कानून तो स्त्री के लिए बनाए गए हैं–जैसे करवाचौथ, पति की लंबी आयु के लिए पत्नी को ही रखना पड़ता है; पति इसके लिए बाध्य नहीं है। प्रश्न उठता है…पति के लिए व्रत रखने का प्रावधान क्यों नहीं? शायद! उसके पति को पत्नी के साथ की दरक़ार अथवा आवश्यकता नहीं है। वैसे भी पत्नी की चिता ठंडी होने से पूर्व ही रिश्ते आने प्रारंभ हो जाते हैं। क्या ऐसे समाज में स्त्री को समानता का दर्जा मिल पाना मात्र कपोल-कल्पना नहीं है? नहीं …नहीं… नहीं… कभी नहीं मिल पाता उसे समानता का अधिकार…बल्कि उसे तो आजीवन उसी भ्रम में जीना पड़ता है कि भले ही वह पत्नी है या मां– उसकी कोई अहमियत नहीं; न परिवार में, न ही समाज में… वह तो माटी की गुड़िया है…स्पंदनहीन, चेतनहीन व अस्तित्वहीन…जिसे आजीवन दूसरों की करुणा-कृपा पर आश्रित रहना पड़ता है।
विवाह के पश्चात् उसका पति हर पल उस निरीह पर निशाना साधता है। वैसे भी हर अपराध के लिए अपराधिनी तो औरत ही समझी जाती है, भले ही वह अपराध उसने किया ही न हो, क्योंकि उसे तो विदाई की बेला में समझा दिया जाता है कि अब उसे अपने ससुराल में ही रहना है; कभी अकेले इस चौखट पर पाँव नहीं रखना है। दूसरे शब्दों में उस पराश्रिता को आजीवन एकपक्षीय समझौता करना है… बापू के तीन बंदरों के समान आंख, कान, मुंह बंद करके जीवन बसर करना है। इसलिए वह नादान सब ज़ुल्म सहन करती है तथा कभी भी कोई ग़िला-शिक़वा या शिक़ायत नहीं करती। अक्सर सभी हादसों का मूल कारण होता है, उस विवाहिता से मुक्ति पाने का उपक्रम… कभी गैस के खुला रह जाने पर उसका जल जाना; कभी नदी किनारे पाँव फिसल जाना; तो कभी बिजली की नंगी तारों को छू जाना। मिट्टी के तेल, पेट्रोल या तेज़ाब से ज़िंदा जलने की यंत्रणा से कौन परिचित नहीं है? प्रश्न उठता है कि यह सब हादसे पुत्रवधु के साथ ही क्यों होते हैं? उस घर की बेटी उन हादसों का शिकार क्यों नहीं होती? यदि वह इन सबके चलते ज़िंदा बच निकलती है, तो उसे ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव तक, पिता द्वारा निर्देशित राह पर चल कर समस्त दायित्वों का वहन करना अनिवार्य होता है और उसके पश्चात् बेटा निर्धारित परंपरा का वहन बखूबी करता है। केवल चेहरा बदल जाता है, क़िरदार नहीं और यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनवरत चलता रहता है।
आधुनिक युग में नारी को प्रदत्त हैं समानाधिकार… हाँ! उसे स्वतंत्रता प्राप्त हुई है और उसे मनचाहा करने का अधिकार भी है। वह अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र है तथा किसी ज़ुल्म व अनहोनी होने पर उसकी शिकायत भी दर्ज करवा सकती है। परंतु मन में यह प्रश्न कुलबुलाता है… ‘आखिर कहां हैं वे क़ायदे-कानून, जो महिलाओं के हित में बनाए गए हैं?’ शायद! वे फाइलों के नीचे दफ़न हैं। कल्पना कीजिए – ‘जब एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म होने के पश्चात् उसके माता-पिता रिपोर्ट दर्ज कराने जाते हैं…तो वहां कैसा व्यवहार होता है उनके साथ?’ जब संभाल नहीं सकते, तो पैदा क्यों करते हो? क्यों छोड़ देते हो उन्हें, किसी का निवाला बनने हित ? शक्ल देखी है इसकी… कौन इसका अपहरण कर दुष्कर्म करने को ले जायेगा इस बदसूरत को? कितना चाहिए… इससे कमाई करना चाहते हो न… ले जाओ! इस मनहूस को… अपने घर संभाल कर रखो ‘ और न जाने कैसे-कैसे घिनौने प्रश्न पूछे जाते हैं और इल्ज़ाम लगाए जाते हैं …पहले पुलिस- स्टेशन और उसके पश्चात् कचहरी में…वे ऊल-ज़लूल बातें सुन अचंभित रह जाते हैं; उनके पांव तले से ज़मीन खिसक जाती है और लंबे समय तक वे उस सदमे से उबर नहीं पाते। यह सब सुनकर कलेजा मुंह को आता है, जब उस मासूम के माता-पिता को बोलने का अवसर ही प्रदान नहीं किया जाता और वे मूक प्राणी की भांति लौट आते हैंक्षप्रायश्चित भाव के साथ… आखिर क्यों उन्होंने बेटी को जन्म दिया और वह हादसा होने पर उन्होंने पुलिस-स्टेशन का रुख क्यों किया? उम्र-भर वह मासूम कहाँ उबर पाती है उस सदमे से…वे दुष्कर्मी, सफ़ेदपोश बाशिंदे रात के अंधेरे में अपनी हवस शांत कर सूर्योदय से पूर्व लौट जाते हैं अपने घरों की ओर, ताकि दिन के उजाले में वे पाक़-साफ़ व दूध के धुले कहला सकें।
कार्यस्थल पर यौन हिंसा की शिकायत करने वाली महिलाओं को जो कुछ झेलना पड़ता है, कल्पनातीत है। सब उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं, कुलटा व कुलनाशिनी समझ उसकी निंदा व आलोचना करते हैं…यहां तक कि उसके लिए नौकरी करना ही नहीं; जीना भी दूभर हो जाता है। 15अक्टूबर 2019 के ट्रिब्यून को पढ़कर आप हक़ीक़त से रू-ब -रू हो सकते हैं। तमिलनाडु की महिला पुलिस अधीक्षक द्वारा महानिरीक्षक-स्तरीय अधिकारी पर कार्य-स्थल पर उत्पीड़न के आरोपों की जांच को उच्च न्यायालय द्वारा दूसरे राज्य में भेजने का मामला प्रश्नों के घेरे में है, जिनके उत्तर सुप्रीम कोर्ट तलाश रहा है। परंतु इससे क्या होने वाला है? उच्च न्यायालय अपनी अधीनस्थ अदालतों में लंबित किसी मामले या अपील की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच अथवा सुनवाई के लिए मुकदमे या प्रकरण को; धारा 407 के अंतर्गत अपने अधिकार-क्षेत्र में आने वाले किसी भी अन्य ज़िले में स्थानांतरित कर सकता है…और इसी बिनाह पर स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच के लिए उसे तमिलनाडु से तेलंगाना स्थानांतरित कर दिया गया। अक्सर कार्य-स्थल पर यौन हिंसा के मामलों में महिला व उसके परिवार को हानि पहुंचाने की बातें कही जाती हैं; उन्हें ज़िंदगी से बेदखल करने के फरमॉन सुनाए जाते हैं तथा उस पीड़िता पर समझौता करने का दबाव बनाया जाता है। इतना ही नहीं, उसे तुरंत कार्यालय से बर्खास्त कर दिया जाता है तथा उसे बदनाम करने की हर संभव कोशिश की जाती है। क्या यह पुरुष वर्चस्व नहीं है, जो समाज में कुकुरमुत्तों की भांति सब पर तेज़ी से अपने वर्चस्व का दायरा बढ़ाता तथा अपनी पकड़ बनाता जा रहा है।
आइए! इसके दूसरे पक्ष पर भी दृष्टिपात करें। आजकल ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ का बोलबाला है। चंद स्वतंत्र प्रकृति की उछृंखल महिलाएं सब बंधनों को तोड़; विवाह की पावन व्यवस्था को नकार, ‘लिव-इन’ को अपना रही हैं। अक्सर इसका ख़ामियाज़ा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि कुछ समय के पश्चात् पुरुष साथी ही उसे यह कहकर छोड़ देता है…’तुम्हारा क्या भरोसा… जब तुम अपने माता-पिता की नहीं हुई; कल किसी ओर के साथ रहने लगोगी?’… इल्ज़ाम फिर उसी महिला के सर। वैसे भी चंद महीनों बाद महिला को दिन में तारे दिखाई देने लगते हैं और वह धरती पर लौट आती है। कोर्ट का ‘लिव-इन’ के साथ, पुरुष को ‘पर-स्त्री गमन’ अर्थात् दूसरी औरत से संबंध बनाने की स्वतंत्रता ने हंसते-खेलते परिवारों की खुशियों में सेंध लगा दी है। इसके साथ ही ‘मी-टू’ अर्थात् पच्चीस वर्ष में अपने साथ घटित किसी हादसे को उजागर कर पुरुष को जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाने का उपक्रम अर्थात् औचित्य समझ से बाहर है। इसके परिणाम-स्वरूप हंसते- खेलते परिवार उजड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, ऐसे हादसों से महिलाओं की साख पर भी तो आँच आती ही है, परंतु वे ऐसा सोचती कहाँ हैं कि इसका अंजाम उन्हें भविष्य में अवश्य भुगतना पड़ेगा। परंतु पुरुष तो महिला पर सदैव पूर्णाधिकार चाहता है तथा अहं फुंफकारने की दशा में वह उसे घर-परिवार व ज़िन्दगी से निष्कासित करने में तनिक भी ग़ुरेज़ नहीं करता। अंततः मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि ‘औरत पहले भी उपेक्षित थी, दलित थी, गुलाम थी और सदा रहेगी, क्योंकि पुरुष की सोच व दूषित मानसिकता में बदलाव आना सर्वथा असंभव है। सतयुग से चला आ रहा यह अनवरत सिलसिला कभी थमने वाला नहीं।’ परंतु अपवाद-स्वरूप चंद भले लोग समाज की रीढ़ होते हैं तथा उनकी सकारात्मक सोच, त्याग व परोपकार आदि शुभ कर्मों पर सृष्टि कायम है।
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© डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈