श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा।)
यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-२० ☆ श्री सुरेश पटवा
दोपहर होने को थी। हमारी परीक्षा लेने के लिए दिनकर पूरी चमक से सिर के ऊपर तांडव नृत्य कर रहे थे। पानी की बोतलें खाली होने लगी थीं। लोग दूसरों की बोतलों को चाहत भरी निगाह से देखने लगे थे। तभी भीड़ की चाल सुस्त हुई और रुकावट आ गई। ज़ाहिर था कि मनुष्यों का ट्रैफ़िक जाम हो गया था। यह तो ठीक था कि सीढ़ियों के आसपास घने पेड़ की छाँह थी। कुछ उत्साही युवक इन पेड़ों की शाख पकड़ कर सीढ़ियों से हटकर पत्थरों पर चढ़ बंदरों की तरह चढ़ने-उतरने लगे। हमने उन बंदरों से ट्रैफ़िक जाम का कारण पूछा। उन्होंने बताया चढ़ने और उतरने वाली भीड़ सामने-सामने जम गई है। जब बहुत देर होने लगी, तो हम सीटी बजाते हुए बंदरों की तरह पत्थरों से कूदकर आगे बढ़े। काफ़ी मेहनत मशक्कत के बाद ट्रैफ़िक जाम स्थान पर पहुँच सीटी बजा-बजा कर एक तरफ़ का रास्ता खुलवाया। ट्रैफ़िक चालू हो गया। भलमनसाहत में एक अजनबी ने पानी भी पिलवा दिया। थोड़ी देर में हमारे साथी भी आ मिले।
एक साथी ने पूछा – इंद्र के बारे में कुछ और बताइए। ये पौराणिक कथाओं में हर कहीं प्रकट क्यों हो जाते हैं। महाभारत में अर्जुन के पिता बनकर आ जाते हैं।
हमने कहा – देखो भाई, इंद्र बड़ा रोचक चरित्र है। पौराणिक साहित्य में इन्द्रियों का स्वामी सत्ता लोभी वर्णित है। जैसे हम सभी इन्द्रिय लोभी हैं। इंद्र की सत्ता लोलुपता इससे पता चलती है कि वह अपनी पुत्री जयंती को शुक्राचार्य की तपस्या भंग करने भेजता है। यह जयंती को पसंद नहीं है, परंतु पिता की आज्ञा पालन हेतु वह शुक्राचार्य की सेवा करके दस वर्ष बिताती है। दोनों के संसर्ग से देवयानी का जन्म होता है। जिसका विवाह महाभारत के एक प्रमुख चरित्र ययाति से होता है। जो इंद्र सत्ता के कारण पुत्री तक को दाव पर लगा सकता है, वह नेताओं की तरह कुछ भी कर सकता था। इसी से उसकी सत्ता लोलुपता का पता चलता है। भारतीय दर्शन में ब्रह्म विचार आने के पश्चात विष्णु के अवतार मात्र अवतार ना रहकर ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं। तब कृष्ण इंद्र की सत्ता की चुनौती देकर गिरिराज होकर इंद्र की पूजा स्थगित करवाते हैं। याने इंद्र की सत्ता के ऊपर ब्रह्म की सत्ता स्थापित होती है।
एक अन्य साथी ने पूछा- ‘हनुमान जी को बजरंग क्यों कहा जाता है ?
हमने बताया – हनुमान वानर के मुंह वाले अत्यंत बलशाली पुरुष हैं। जिनका शरीर वज्र के समान है। इंद्र का वज्र अस्त्र बहुत शक्तिशाली है। इंद्र के वज्र अस्त्र के वार से हनुमान के मुँह से सूर्य देव मुक्त तो हुए लेकिन उनकी देह वज्र की होने से उनका बाल भी बाँका नहीं हुआ था। उनका अंग वज्र का था। वज्र+अंग = वज्रांग अर्थात् वजरंग हुआ। अवधी में ‘व’ शब्द नहीं होता ‘ब’ होता है। इसीलिए तुलसीदास जी ने हनुमान की महिमा और शक्तियों का बखान करने के लिए बजरंग बाण रचा था।
बन उपबन मग गिरि गृह माही, तुम्हरे बल हम डरपत नहीं।
अपने जन को तुरत उबारौ, सुमिरत होय आनंद हमारौ।
यह बजरंग बाण जेहि मारै, ताहि कहौ फिरि कौन उबारै।
पाठ करै बजरंग बाण की, हनुमत रक्षा करै प्रान की।
यह बजरंग बाण जो जापै, तासौं भूत प्रेत सब काँपै।
धूप देय जो जपै हमेशा, ताके तन नहि रहे कलेशा।
ध्यान दीजिए अवधी में वन को बन और उपवन को उपबन लिखा है। इस तरह वजरंग जी बजरंग जी हुए। आदमियों की तरह शब्द भी बहरूपिए होते हैं। अब देखो, बजरंग से एक शब्द गढ़ लिया ‘बजरंगी भाईजान’| इस नाम से फ़िल्म भी बन गई, और खूब चली। बजरंगी भाईजान पासपोर्ट-वीसा के बिना पाकिस्तान तक हो आए। यह फ़िल्म पाकिस्तान में भी खूब देखी गई। आख़िर वो लोग भी हैं तो हिंदुस्तानी ही, अपने सदियों पुराने मन से बजरंग को कैसे निकाल सकते हैं।
इसके बाद हनुमान जन्म कथा चर्चा चल पड़ी। उनको बताया कि यहाँ भी इंद्र की भूमिका है। पुंजिकथला नाम की एक अप्सरा थी जो इंद्र के दरबार में नृत्य किया करती थी। पुंजिकथला जिसे पुंजत्थला भी कहा जाता है, एक बार धरती लोक में आई। महर्षि दुर्वासा एक नदी के किनारे ध्यान मुद्रा में तपस्या कर रहे। पुंजत्थला ने उन पर बार-बार पानी उछाला, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई। तब उन्होंने पुंजत्थला को शाप दे दिया कि तुम इसी समय वानरी हो जाओ। वह उसी समय वानरी बन गई और पेड़ों पर इधर उधर घूमने लगी। देवताओं के बहुत विनती करने के बाद ऋषि ने उन्हें बताया की इनका दूसरा जन्म होगा और यह वानरी ही रहोगी लेकिन अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल सकेगी।
केसरी सिंह नाम के एक राजा वन में एक मृग का शिकार करते ऋषि आश्रम पहुंचे। वह मृग घायल था और वह ऋषि के आश्रम में छुप गया ऋषि ने राजा केसरी से कहा कि तुम मेरे आश्रम से इसी समय अतिशीघ्र चले जाओ नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगा। यह सुनकर केसरी हँसने लगे और बोले ‘मैं किसी शाप को नहीं मानता।’ क्रोध में आकर ऋषि ने उन्हें भी शाप दे दिया और कहा कि ‘तुम बांदर हो जाओ’ उधर पुंजत्थला भी बांदरी थी।
इन दोनों ने भगवान शिव की तपस्या की भगवान शिव ने इन्हें वरदान दिया कि तुम अगले जन्म में वानर के रूप में ही जन्म लोगे। तुम दोनों को एक पुत्र होगा जो बहुत तेजस्वी और बहुत पराक्रमी होगा जिनका नाम युगों युगों तक लिया जाएगा फिर उन दोनों वानरों का शरीर वही पर त्याग कर दोनों ने अलग-अलग रूप में अलग-अलग राज्य में जन्म लिया। जिसमें केसरी वासुकि नाम के एक राजा के यहां जन्म लेकर वह वानरों के राजा बना और पुंजत्थला पुरू देश के राजा पुंजर के यहां जन्मी।
पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन के बाद शिव जी ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने की इच्छा प्रकट की। उनका वह आकर्षक रूप देखकर वह कामातुर हो गए, और उनका पुंसत्व तिरोहित हो गया। वायुदेव ने शिव जी के अंश को वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में पवन देव द्वारा स्थापित कर दिया। इस तरह अंजना के गर्भ से वानर रूप हनुमान का जन्म हुआ, इसलिए उन्हें शिव का 11 वां रूद्र अवतार माना जाता है। साथ में पवन पुत्र भी कहा जाता है।
वृतांत मिलता है कि महाराज पुंजर ने अपनी बेटी अंजना का विवाह महाराज वासुकि के पुत्र केसरी से किया कुछ दिनों के उपरांत उन्हें एक पुत्र हुआ जिसका नाम वज्रअंग अर्थात् बजरंगबली हनुमान केसरी नंदन आदि नामों से जाना जाता है उन्हें पवन पुत्र भी कहा जाता है क्योंकि हनुमान जी के पालनहार वायु देवता ही हैं उन्होंने हनुमान जी को जन्म से लेकर हमेशा उनका साथ दिया है और उनका पालन पोषण भी वायु देवता के निकट ही हुआ है इसलिए उनको पवन पुत्र भी कहा जाता है और यह थी माता अंजना की विस्तृत कहानी। हनुमान के अलावा अंजना के गर्भ से पांच पुत्रों का भी जन्म हुआ था। जिनके नाम हैं, मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈