आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है नवरात्रि विशेष – सप्तश्लोकी दुर्गा )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 229 ☆

☆ नवरात्रि विशेष – सप्तश्लोकी दुर्गा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

(नवरात्रि और सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र हिंदी काव्यानुवाद सहित)

नवरात्रि पर्व में मां दुर्गा की आराधना हेतु नौ दिनों तक व्रत किया जाता है। रात्रि में गरबा व डांडिया रास कर शक्ति की उपासना तथा विशेष कामनापूर्ति हेतु दुर्गा सप्तशती, चंडी तथा सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती तथा चंडी पाठ जटिल तथा प्रचण्ड शक्ति के आवाहन हेतु है। इसके अनुष्ठान में अत्यंत सावधानी आवश्यक है, अन्यथा क्षति संभावित हैं। दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ करने में अक्षम भक्तों हेतु प्रतिदिन दुर्गा-चालीसा अथवा सप्तश्लोकी दुर्गा के पाठ का विधान है जिसमें सामान्य शुद्धि और पूजन विधि ही पर्याप्त है। त्रिकाल संध्या अथवा दैनिक पूजा के साथ भी इसका पाठ किया जा सकता है जिससे दुर्गा सप्तशती,चंडी-पाठ अथवा दुर्गा-चालीसा पाठ के समान पूण्य मिलता है।

कुमारी पूजन

नवरात्रि व्रत का समापन कुमारी पूजन से किया जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिन दस वर्ष से कम उम्र की ९ कन्याओं को माँ दुर्गा के नौ रूप (दो वर्ष की कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी चार वर्ष की कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की काली, सात वर्ष की चण्डिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा, दस वर्ष की सुभद्रा) मान पूजन कर मिष्ठान्न, भोजन के पश्चात् व दान-दक्षिणा भेंट करें।

सप्तश्लोकी दुर्गा

निराकार ने चित्र गुप्त को, परा प्रकृति रच व्यक्त किया।

महाशक्ति निज आत्म रूप दे, जड़-चेतन संयुक्त किया।।

नाद शारदा, वृद्धि लक्ष्मी, रक्षा-नाश उमा-नव रूप-

विधि-हरि-हर हो सके पूर्ण तब, जग-जीवन जीवन्त किया।।

*

जनक-जननि की कर परिक्रमा, हुए अग्र-पूजित विघ्नेश।

आदि शक्ति हों सदय तनिक तो, बाधा-संकट रहें न लेश ।।

सात श्लोक दुर्गा-रहस्य को बतलाते, सब जन लें जान-

क्या करती हैं मातु भवानी, हों कृपालु किस तरह विशेष?

*

शिव उवाच-

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।

कलौ हि कार्यसिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥

*

शिव बोले:

सब कार्यनियंता, देवी! भक्त-सुलभ हैं आप।

कलियुग में हों कार्य सिद्ध कैसे?, उपाय कुछ कहिये आप।।’

*

देव्युवाच-

श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्‌।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥

*

देवी बोलीं:

सुनो देव! कहती हूँ इष्ट सधें कलि-कैसे?

अम्बा-स्तुति बतलाती हूँ, पाकर स्नेह तुम्हारा हृद से।।’

*

विनियोग-

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः

अनुष्टप्‌ छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः

श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।

*

ॐ रचे दुर्गासतश्लोकी स्तोत्र मंत्र नारायण ऋषि ने

छंद अनुष्टुप महा कालिका-रमा-शारदा की स्तुति में

श्री दुर्गा की प्रीति हेतु सतश्लोकी दुर्गापाठ नियोजित।।

*

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥१॥

*

ॐ ज्ञानियों के चित को देवी भगवती मोह लेतीं जब।

बल से कर आकृष्ट महामाया भरमा देती हैं मति तब।१।

*

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।

दारिद्र्‌यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥२॥

*

माँ दुर्गा का नाम-जाप भयभीत जनों का भय हरता है,

स्वस्थ्य चित्त वाले सज्जन, शुभ मति पाते, जीवन खिलता है।

दुःख-दरिद्रता-भय हरने की माँ जैसी क्षमता किसमें है?

सबका मंगल करती हैं माँ, चित्त आर्द्र पल-पल रहता है।२।

*

सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥३॥

*

मंगल का भी मंगल करतीं, शिवा! सर्व हित साध भक्त का।

रहें त्रिनेत्री शिव सँग गौरी, नारायणी नमन तुमको माँ।३।

*

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते॥४॥

*

शरण गहें जो आर्त-दीन जन, उनको तारें हर संकट हर।

सब बाधा-पीड़ा हरती हैं, नारायणी नमन तुमको माँ ।४।

*

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते॥५॥

*

सब रूपों की, सब ईशों की, शक्ति समन्वित तुममें सारी।

देवी! भय न रहे अस्त्रों का, दुर्गा देवी तुम्हें नमन माँ! ।५।

*

रोगानशोषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान्‌ सकलानभीष्टान्‌।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति॥६॥

*

शेष न रहते रोग तुष्ट यदि, रुष्ट अगर सब काम बिगड़ते।

रहे विपन्न न कभी आश्रित, आश्रित सबसे आश्रय पाते।६।

*

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि।

एवमेव त्वया कार्यमस्यद्वैरिविनाशनम्‌॥७॥

*

माँ त्रिलोकस्वामिनी! हर कर, हर भव-बाधा।

कार्य सिद्ध कर, नाश बैरियों का कर दो माँ! ।७।

*

॥इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम्‌॥

।श्री सप्तश्लोकी दुर्गा (स्तोत्र) पूर्ण हुआ।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१.२.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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