श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 43 ☆

☆ स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड 

मैंने आपको शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों के विषय में बताया था। इन तीनों नाड़ियों की तुलना भारत की तीन मुख्य नदियों के साथ कर सकते हैं गंगा इड़ा है, यमुना पिंगला और सरस्वती सुषुम्ना नाड़ी है । कलियुग में इन नाड़ियों के कर्म इनके नामों के अनुसार ही समझ सकते हैं । इन दिनों कोई भी नहीं या बहुत कम लोग आध्यात्मिक रूप से दिनचर्या जीते हैं, जिसका अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी या सरस्वती नदी में कोई प्रवाह नहीं है क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी किसी भी व्यक्ति के जीवन के अध्यात्म को दर्शाती है । सरस्वती नदी की वास्तविक उपस्थिति की स्थिति के विषय में भी यह सत्य है । कलियुग में सरस्वती नदी लगभग लुप्त हो गयी है ।

अब इड़ा नाड़ी या गंगा नदी को ले लो जो मानसिक गतिविधियों को दर्शाती है । आजकल हमारे विचार शुद्ध नहीं हैं, और वास्तविक गंगा नदी भी बहुत ज्यादा प्रदूषित हो गयी है । पिंगला नाड़ी या यमुना नदी के साथ भी सामान परिस्थिति है, आजकल लोग शारीरिक रूप से तंदरुस्त नहीं हैं । उन्हें हर दिन पैदा होने वाली कई नई बीमारियां होती रहती हैं । पिंगला नाड़ी शारीरिक शक्ति या सूर्य ऊर्जा होती है । तो फिर इन दिनों पिंगला नाड़ी और यमुना नदी शुद्ध नहीं रह गयी है । इसी तरह मानव शरीर में उपस्थित सभी नाड़ियाँ वास्तव में भारत की प्राचीन नदियाँ ही हैं । मैं वेदों, पुराणों आदि में उल्लिखित नदियों के विषय में बात कर रहा हूँ ।

पर क्या कारण है कि ये नदियाँ केवल भारत में है दुनिया में अन्य कहीं नहीं? क्योंकि उस समय सभ्यता केवल भारत में ही उपस्थित थी । जिसकी सीमाएं भारत के इन दिनों की भौगोलिक सीमाओं से बहुत अलग थी, और इसमें एशिया, यूरोप, अफ्रीका आदि के भौगोलिक क्षेत्र भी शामिल थे । और उस समय लगभग पूरी मानव आबादी उस समय के भौगोलिक भारत में ही बसी थी । कृष्णा, कावेरी, सरयू इत्यादि जैसी सभी भारतीय नदियाँ वास्तव में मानव शरीर की नाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । यहाँ तक कि नदी ‘वैतरनी’ जो यमलोक (मृत्यु के भगवान के निवास स्थान) की ओर जाती है भी मानव शरीर में सूक्ष्म रूप में भी उपस्थित है । और यमलोक की ओर जाने वाली आत्मा मृत्यु के समय इस नदी से ही निकलती है कुछ लोगों ने इस नदी को अन्य नाम दिए हैं ।

मैंने कलियुग का उदाहरण लिया है । क्या आप जानते हैं कि विभिन्न युगों के बीच बुनियादी अंतर क्या है और हमारे दैनिक जीवन को अच्छे गुण और बुरे गुण कैसे प्रभावित करते हैं?

सत्य युग में सत्य के चार भाग थे और कुछ भी भ्रष्ट या धोखाधड़ी या बुरा नहीं था । सत्य हर जगह उपस्थित था, यह वैदिक युग और उससे पहले का समय था । दूसरे युग त्रेता युग होता है जिसमें तीन भाग अच्छे और एक बुरा होता है । इस युग में विभिन्न साम्राज्यों के अधीन विभिन्न विभिन्न क्षेत्र थे कुछ क्षेत्रों में अच्छे साम्राज्य स्थापित थे एवं कुछ अन्य में बुरे । जिनके बीच में कभी कभी टकराव हुआ करता था जिसमें अच्छे एवं सच्चे साम्राज्य के लोग बुरे और गंदे साम्राज्य के लोगों को परास्त कर देते थे । उदाहरण रामायण जिसमें भगवान राम के क्षेत्र अयोध्या में धर्म के अनुसार ही सब कार्य होते थे और लंका का क्षेत्र जिसमें धर्म विरुद्ध कार्य होते थे एवं जिसका राजा राक्षस रावण था वह क्षेत्र अयोध्या से दूर स्थान पर स्थित था। भगवान राम ने रावण को मार डाला और फिर से सच्चाई स्थापित की ।

तीसरा युग द्वापर होता है जिसमें दो भाग अच्छे और दो बुरे थे । उस युग में अच्छाई और बुराई और करीब आ गयी । उदाहरण महाभारत जिसमें एक ही परिवार में अच्छे और बुरे लोग उपस्थित  थे । कुछ परिवार के सदस्य पांडव अच्छे थे, और अन्य कौरव बुरे थे । पांडव और कौरव एक ही परिवार के थे । उनके बीच में संपत्ति को लेकर युद्ध हुआ जिसमें पांडव जीते और कौरव हार गए, और सच्चाई एवं धर्म फिर से स्थापित हुए । कलियुग में सभी लोग अच्छे और बुरे का संयोजन हैं । कोई भी शत प्रतिशत अच्छा नहीं है और कोई भी शत प्रतिशत बुरा नहीं है”

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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