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English Literature – Short Story – The Accidental Son – Shri Suraj Kumar Singh

Shri Suraj Kumar Singh The Accidental Son (e-abhivyakti welcomes Shri Suraj Kumar Singh from Ranchi. Mr Suraj is a young and dynamic author.  He is also an editor of "Young Literati"  (E-Magazine) “How many times do I have to repeat? Don’t you get what I want you to learn? Are you really that naive or Mr. Shah was right when he said that you are mentally challenged? You see I always felt nervous about leaving you in this selfish world alone only because you don’t show any signs of maturity. If you want to survive you need to take lessons. You need to learn how to deal with things. The world isn’t as benevolent as you think. This world no doubt is a big place but offers limited opportunities and when the opportunity knocks your door you need to open and let it in. Understood?” While all these was being said to 16 year old Rahul by his father Mr. Singh he was simply...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – * संवाद मुका झाला * – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते संवाद मुका झाला (प्रस्तुत है  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी ते का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। पढ़िये श्री सातपुते जी का एक विचारणीय आलेख)   भावनांचा कोंडमारा शब्दातुनीच वाहतो व्यक्त मी, अव्यक्त मी स्मरणात तुमच्या राहतो. मनामध्ये व्यक्त अव्यक्त भावनांचा कोंडमारा सुरू झाला की, प्रत्येकाला आपल मन कुणाजवळ तरी मोकळं करावसं वाटतं. बर्‍याचदा समवयस्क व्यक्तींकडे असा संवाद साधला जातो. सुखदुःखाच्या अनुभूतींचे आदानप्रदान होते. एकमेकांना समजून घेऊन धीर दिला जातो. काही समस्या  असल्यास त्यावर चर्चा करून त्यातून मार्ग सुचवला जातो.  अनुभवाचे बोल या प्रसंगी  आपली कामगिरी चोख बजावतात. संवाद साधला जात  असताना प्रत्येक वेळी समस्या असतेच असे नाही. समोर घडणार्‍या  एखाद्या वास्तवदर्शी घटनेवर सहज भाष्य करता करता संवाद साधला जातो. वादासह संक्रमित होणारा संवाद ही मतपरिवर्तन घडवू शकतो. संवाद हा प्रत्यक्ष बोलाचालीतून, वाचनातून, लेखनातून, साहित्य निर्मिती मधून, तसेच नृत्य, नाट्य, कला,क्रीडा, यांच्या अविष्कारातून साधला जाऊ शकतो. विद्या आणि कलेच्या व्यासंगातून साधला जाणारा संवाद प्रत्येकाला कार्यप्रवण राहण्यास प्रेरक ठरतो . आपल्या देशात आपण अनेकविध स्वातंत्र  अबाधितपणे उपभोगत असतो ,त्यामुळे कुणी,कुठे, कधी, कुणाशी, कसा संवाद साधायचा हे व्यक्तिसापेक्ष आहे. हा...
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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (41) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥41॥ होता सदा अधर्म से कुल स्त्रियों में दोष दुष्टाओं में वर्ण संकरों से बढता जन रोष।।41।। भावार्थ :  हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥ By prevalence of impiety, O Krishna, the women of the family become corrupt and, women becoming corrupted, O Varsneya (descendant of Vrishni), there arises intermingling of castes. ॥41॥   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल – 83 – Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.) Our collective health as a country is cause for grave concern. Yet, there is plenty of hope. We can change this by changing our sedentary lifestyles, keeping ourselves fit and playing a sport. We must inculcate and develop a sporting culture in our country. LifeSkills Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indor...
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मराठी साहित्य – कविता * मराठी दिवस व कुसुमाग्रजांच्या जन्मदिवसा निमित्त * हायकू * सुश्री स्वप्ना अमृतकर

मराठी दिवस व कुसुमाग्रजांच्या जन्मदिवसा निमित्त हायकू : सुश्री स्वप्ना अमृतकर जन्मदिवस वर्षाव सदिच्छांचा क्षण मोलाचा           १, कुसुमाग्रज दिव्य मराठी कवी तेजाळ रवी             २, थोर तो दिवा अंधारात विझला वाटतो हेवा            ३, माय मराठी उमेद लेखणीला देऊनी गेला            ४, मराठी दिनी देव्हांर्‍र्रा शारदेचा शब्दपंक्तिचा            ५.... © स्वप्ना अमृतकर (पुणे) ...
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हिन्दी साहित्य – आलेख – * मीठे जल का झरना है लघुकथा * – श्री बलराम अग्रवाल जी से डॉ.भावना शुक्ल की वार्ता

मीठे जल का झरना है लघुकथा  (श्री बलराम अग्रवाल जी से डॉ.भावना शुक्ल की वार्ता  के अंश) वरिष्ठ साहित्यकार ,लघु कथा के क्षेत्र में नवीन आयाम स्थापित करने वाले, लघुकथा के अतिरिक्त कहानियां, बाल साहित्य, लेख, आलोचना तथा अनुवाद के क्षेत्र में अपनी कलम चलाने वाले, संपादन के क्षेत्र में सिद्धहस्त, जनगाथा, लघुकथा वार्ता ब्लॉग पत्रिका के माध्यम से संपादन करने वाले, अनेक सम्मानों से सम्मानित, बलराम अग्रवाल जी सौम्य और सहज व्यक्तित्व के धनी हैं. श्री बलराम जी से लघुकथा के सन्दर्भ में जानने की जिज्ञासा रही इसी सन्दर्भ में श्री बलराम अग्रवाल जी से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत के अंश ...... भावना शुक्ल : आपके मन में लघुकथा लिखने के अंकुर कैसे फूटे? क्या घर का वातावरण साहित्यिक था? बलराम अग्रवाल : नही; घर का वातावरण साहित्यिक नहीं था, धार्मिक था। परिवार के पास सिर्फ मकान अपना था। उसके अलावा न अपनी कोई दुकान थी, न खेत, न चौपाया, न नौकरी। पूँजी भी नहीं थी। रोजाना कमाना और खाना। इस हालत...
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आध्यात्म / Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – प्रथम अध्याय (40) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन) कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥40॥ कुल विनाश से सहज है कुल धर्मो का नाश धर्म नष्ट होता तो फिर सहज अधर्म विकास।।40।। भावार्थ :  कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है ॥40॥   In the destruction of a family, the immemorial religious rites of that family perish; on the destruction of spirituality, impiety overcomes the whole family. ॥40॥   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल – 82 – Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)   Do you really feel for your brothers? Do you really feel that there is so much misery in the world, so much ignorance and superstition? Do you really feel that men are your brothers? Does this idea come into your whole being? Does it run with your blood? Does it tingle in your veins? Does it course through every nerve and filament of your body? Are you full of that idea of sympathy? LifeSkills Courtesy – Shri Jagat Singh Bisht, LifeSkills, Indore...
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मराठी साहित्य – मराठी आलेख – * निसर्गायन * – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस निसर्गायन  (प्रस्तुत है  सुश्री ज्योति  हसबनीस जी  का प्रकृति पर  एक अतिसुन्दर आलेख।) पाऊस पडून आकाश अगदी मोकळं झालेलं! स्वच्छ निळाईचं छत माथ्यावर, आजूबाजूला तृप्त हिरवाई, आणि संगतीला पाखरांची किलबिल! प्रसन्न सकाळ आणि तृप्त भंवतालाचा नजरेने आस्वाद घेत पावलं झपझप पडत होती. साऱ्या बहराची भरभरून वाहणारी ओंजळ अनंत हस्ते रिती करून अतीव समाधानात अनंत उभा होता. बकुळ मात्र एखाद्या सम्राज्ञीच्या थाटात आपल्या ऐश्वर्याची मुक्त हस्ते उधळण करीत होती . कदंब दिवास्वप्न बघण्यात गढल्यासारखा भासत होता. आवडत्या झाडांवर मायेने नजर फिरवतांना कोण सुख होत होतं ! आणि तेवढ्यात चिरपरिचित 'चीची' जरा कर्कश्श आवाज कानी पडला ! नजर त्या दिशेने वळतेय तेवढ्यात झाडाच्या फांदीवरून ग्रे हाॅर्न बिल्सची जोडी मोठ्या डौलात आकाशात झेपावली ! निमिषार्धात दुसऱ्याही जोडीने त्यांच्या मागोमाग आकाशात झेप घेतली ! क्षणभर विश्वासच बसेना ! काय सुंदर दृष्य होतं ते ! मुक्त आकाशात आपल्या जोडीदाराबरोबरचा मुक्त विहार ...! साथसंगत ...जिवलगाची ..किती हवीहवीशी ! त्याच्या साथीने गगनभरारी घेण्यासाठी पंखात संचारणारं  बळ...त्याच्या संगतीने सारे ऋतू अंगावर घेण्याचं सामर्थ्य ...बरोबरीने नवनव्या अवकाशाला घातली जाणारी गवसणी ...! सहजीवनाचं...
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हिन्दी साहित्य – आलेख – * परिवर्तनकामी थे: हरिशंकर परसाई * –श्रीमती सुसंस्कृति परिहार

श्रीमती सुसंस्कृति परिहार हिन्दी आलेख - परिवर्तनकामी थे: हरिशंकर परसाई (प्रस्तुत है श्रीमती सुसंस्कृति परिहार जी का स्व. हरीशंकर परसाईं  जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक खोजपरख आलेख।) - साभार श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी , जबलपुर  'बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही' कवियों के कवि शमशेर बहादुर सिंह की उपरोक्त पंक्तियां हरिशंकर परसाई की रचनाओं पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं । हरिशंकर परसाई अगर चौदहवीं शताब्दी में पैदा होते तो कबीर होते और कबीर यदि बीसवीं शताब्दी में पैदा होते तो हरिशंकर परसाई होते । आजादी के पहले के भारत को जानना हो तो प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए और आजादी के बाद के भारत को जानना हो तो हमें परसाई को पढ़ना होगा । इन मशहूर कथनों से हमें पता चलता है कि परसाई किस परंपरा में आते हैं ? हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1922 को होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में हुआ इनके पिता का नाम श्री झूमक लाल परसाई था। माता का नाम श्रीमती चंपाबाई था ।...
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