Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 2 – Dushyanta’s Regret ☆

Ms Neelam Saxena Chandra   (Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Dushyanta's Regret”. This poem is from her book “Tales of Eon)   ☆ Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 2 ☆ ☆ Dushyanta's Regret ☆ (Dushyanta speaks when he is told by Gods that Shakuntala is indeed his wife and Bharat is indeed his son)    O dearest Shakuntala, How could I forget you- O beautiful damsel? Regret flows through my eyes As I remember I called you lowly, wicked and without virtues. Shame envelopes me As I recall the moments When I  refused to accept Bharat, Our lovely son!   O dearest Shakuntala Holy was our union Already sanctified by heavens above; And Bharat, the most...
Read More

English Literature – Poetry – ☆ Life goes on…. ☆ – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM (We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi ji  for sharing his literary and art works with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national level projects. We present an emotional poem of Capt. Raghuvanshi ji "Life goes on....".)   ☆ Life goes on.... ☆   No one ever leaves before his time comes When will that happen? No one even knows...   There's no bigger catastrophe than the Heartache ceaselessly oozing out through eyes...   I sure've reaped gains by my carefree senselessness, As, now doesn't even exist a complaint with the life...   Though, the eternal quest still on deep inside me But never-ever bothered to explore my fathomless heart   There used to live a bounteous person inside However hard I searched but never found him again...   Life now is such an intense perpetual concatenate maze That doesn't even have foreseeable unpuzzled end!   But life goes on...   © Captain Pravin Raghuvanshi, NM...
Read More

पुस्तक समीक्षा/आत्मकथ्य – संवेदना के वातायन (काव्य संग्रह) – डॉ मुक्ता

संवेदना के वातायन  (काव्य संग्रह) – डॉ मुक्ता  पुस्तक : संवेदना के वातायन  लेखिका : डॉ मुक्ता प्रकाशन प्रारूप :  ईबुक, अमेज़न किंडल  प्रकाशक : वर्जिन साहित्यपीठ Amazon Link – संवेदना के वातायन Google Books Link – संवेदना के वातायन   लेखिका परिचय :  माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत/सम्मानित निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी (2009 से 2011 तक) निदेशक, हरियाणा ग्रंथ अकादमी, पंचकुला (तत्पश्चात् 2014 तक) सदस्य, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2013 से 2017 तक) उच्चतर शिक्षा विभाग, हरियाणा में प्रवक्ता (1971 से 2003 तक) तथा 2009 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त।   आत्मकथ्य  - संवेदना के वातायन    संवेदना के वातायन मेरा 11वां काव्य- संग्रह है,जिसमें आप रू-ब-रू होंगे...मानवीय संवेदनाओं से,मन में उठती भाव-लहरियों से जो आपके हृदय को उल्लास,प्रसन्नता व आह्लाद से सराबोर कर देंगी तो अगले ही पल आप को सोचने पर विवश कर देंगी कि समाज में इतना वैषम्य, मूल्यों का अवमूल्यन व संवेदन-शून्यता क्यों? मानव मन चंचल है। पलभर में पूरे ब्रह्मांड की यात्रा कर लौट आता है और प्रकृति की भांति हर क्षण रंग बदलता है।...
Read More

हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – वह-2 ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  (इस सप्ताह हम आपसे श्री संजय भारद्वाज जी की “वह” शीर्षक से अब तक प्राप्त कवितायें साझा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इन कविताओं के एक एक शब्द और एक-एक पंक्ति आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।)   ☆ संजय दृष्टि  – वह - 2☆   माँ सरस्वती की अनुकम्पा से  *वह* शीर्षक से थोड़े-थोड़े अंतराल में अनेक रचनाएँ जन्मीं। इन रचनाओं को आप सबसे साझा कर रहा हूँ। विश्वास है कि ये लघु कहन अपनी भूमिका का निर्वहन करने में आपकी आशाओं पर खरी उतरेंगी। –...
Read More

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 8 ♥ कुपोषण की चिंता में बटर चिकिन ♥ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे।  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य “कुपोषण की चिंता में बटर चिकिन”)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 8 ☆    ♥ कुपोषण की चिंता में बटर चिकिन ♥   एयर कंडीशन्ड, सजे धजे मीटिंग हाल में अंडाकार भव्य टेबिलो के किनारे लगी आरामदेह रिवाल्विंग कुर्सियों पर तमाम जिलों से आये हुये अधिकारियो की बैठक चल रही थी। गहन चिंता का विषय था कि विगत माह जो आंकड़े कम्प्यूटर पर इकट्ठे हुये थे उनके अनुसार प्रदेश में कुपोषण बढ़ रहा था। बच्चो का औसत वजन अचानक कम हो गया था। चुनाव सिर पर हैं, और पड़ोसी प्रदेश जहां विपक्षी दल की सरकार है, के अनुपात में हमारे प्रदेश में बच्चोँ में कुपोषण...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #10 ☆ ज़िंदगी ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “ज़िंदगी ”। )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #10☆   ☆ ज़िंदगी ☆   मैंने अपनी पत्नी को कहा, “आज उमेश चाय पर आ रहा है.” “क्या !” पत्नी चौंकते हुए बोली, “पहले नहीं कहना चाहिए था ?” मैंने पूछा, “क्यों भाई, क्या हुआ ?”’ “देखते नहीं, घर अस्तव्यस्त पड़ा है. सामान इधर उधर फैला है. पहले कहते तो इन सब को व्यवस्थित कर देती. वह आएगा तो क्या सोचेगा? मैडम साफ सुथरे रहते है और घर साफ सुथरा नहीं रखते हैं.” “वह यहीं देखने तो आ रहा है. शादी के बाद की जिंदगी कैसी होती है और शादी के पहले की जिंदगी कैसी होती है ?”’ “क्या !” अब चौंकने की बारी पत्नी की थी,...
Read More

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 10 – सार्थक…! ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम   (श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं।  साहित्य में नित नए प्रयोग हमें सदैव प्रेरित करते हैं। गद्य में प्रयोग आसानी से किए जा सकते हैं किन्तु, कविता में बंध-छंद के साथ बंधित होकर प्रयोग दुष्कर होते हैं, ऐसे में  यदि युवा कवि कुछ नवीन प्रयोग करते हैं उनका सदैव स्वागत है। प्रस्तुत है श्री सुजित जी की अपनी ही शैली में  एक अतिसुन्दर रचना   “सार्थक...!”। ) ☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #10 ☆    ☆ सार्थक...! ☆    कटेवरी  हात           उभा  विटेवरी दीनांचा   कैवारी        पांडुरंग  . . . . !   नाही राग लोभ         नाही मोजमाप सुख वारेमाप            दर्शनात. . . . . !   रूप तुझे देवा          मना करी शांत जाहलो निवांत         अंतर्यामी . . . ....
Read More

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – चतुर्थ अध्याय (37) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ चतुर्थ अध्याय ( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन ) ( ज्ञान की महिमा ) यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।।37।। अर्जुन ! जैसे अग्नि ज्वाला में लकड़ी सब जल जाती है वैसे ही ज्ञानाग्नि सभी कर्मो को भस्म बनाती है।।37।। भावार्थ :  क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है।।37।।   As the blazing fire reduces fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes! ।।37।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
Read More

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य – # 8 – कितना बचेंगे …… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’   (अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है एक गीत  “कितना बचेंगे..... ”। )   ☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 8 ☆   ☆ कितना बचेंगे .....    ☆     काल की है अनगिनत परछाईयाँ कितना बचेंगे।   टोह लेता है, घड़ी पल-छिन दिवस का शून्य से सम्पूर्ण तक के  झूठ - सच का मखमली है पैर या कि बिवाईयां है चलेंगे विपरीत, सुनिश्चित है थकेंगे  ।  काल की.......   कष्ट भी झेले, सुखद सब खेल खेले गंध  चंदन  की, भुजंग मिले  विषैले खाईयां है या कि फिर ऊंचाईयां है बेवजह तकरार पर निश्चित डसेंगे  । काल की.............।   विविध चिंताएं, बने चिंतक सुदर्शन वेश धर कर  दे रहे हैं, दिव्य प्रवचन यश, प्रशस्तिगान संग शहनाईयां है छद्म अक्षर, संस्मरण कितने रचेंगे  । काल की..............।   लालसाएं लोभ अतिशय चाह में सब जब कभी ठोकर  लगेगी, राह में तब छोर...
Read More

हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – वह ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  (इस सप्ताह हम आपसे श्री संजय भारद्वाज जी की "वह" शीर्षक से अब तक प्राप्त कवितायें साझा कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इन कविताओं के एक एक शब्द और एक-एक पंक्ति आत्मसात करने का प्रयास करेंगे।)   ☆ संजय दृष्टि  – वह ☆   माँ सरस्वती की अनुकम्पा से  *वह* शीर्षक से थोड़े-थोड़े अंतराल में अनेक रचनाएँ जन्मीं। इन रचनाओं को आप सबसे साझा कर रहा हूँ। विश्वास है कि ये लघु कहन अपनी भूमिका का निर्वहन करने में आपकी आशाओं पर खरी उतरेंगी। -...
Read More