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ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 39 – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 39 श्री गणेशाय नमः  सम्माननीय लेखक एवं पाठक गण सादर अभिवादन. परसाई-स्मृति अंक के पश्चात आपसे पुनः संवाद करने का अवसर प्राप्त हो रहा है.  24 अगस्त 2019 के पश्चात आप से ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से  संपर्क  एवं रचनाएँ प्रकाशित न कर पाने का अत्यंत दुःख है. संभवतः ई-अभिव्यक्ति या ऐसी ही किसी भी लोकप्रिय होती हुई वेबसाईट की बढ़ती हुई लोकप्रियता एवं  बढ़ती हुई विजिटर्स की संख्या के कारण वायरस/हैकिंग जैसी तकनीकी  समस्याओं और उतार चढ़ाव से गुजरना होता है. हमारे लिए हमारे व्यक्तिगत डाटा के साथ ही हमारे सम्माननीय लेखकों एवं पाठकों का डाटा भी उतना ही महत्वपूर्ण है.  इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में रख कर हमने कुछ दिनों का विराम लेकर ई-अभिव्यक्ति को सुरक्षा की दृष्टि से और सुदृढ़ करने का प्रयास किया है.  अब आपकी वेबसाइट http://www.e-abhivyakti.com के स्थान पर सुरक्षित वेबसाइट (Secured Website)  https://www.e-abhivyakti.com हो गई है. किन्तु, आपको अपनी ओर से तकनीकी तौर पर कुछ भी नहीं करना है और जैसा पहले ऑपरेट या प्रचालित करते थे वैसे...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 3 ☆ ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे   (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है।  इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका आलेख ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी। )    ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 3 ☆   ☆ ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी ☆   "चरखा,चपला आणि चेंजमेकर " या लेखात श्री.संदीप वासलेकर यांनी म्हटलंय. "आईसलंडसारख्या  फक्त तीन लाख लोकवस्तीच्या छोट्या देशातले ग्रामीण उद्योजक जगभर  कोळंबीच्या कवचाचं मलम लोकप्रिय करु शकतात.जगातले अनेक देश तिथल्या पारंपरिक पदार्थांना व वस्तूंना बाजारपेठेत स्थान मिळवून देण्याचा प्रयत्न करतात तर आपण कां नाही ? मला हे त्यांचं म्हणणं अतिशय मोलाचं वाटलं श्री.वासलेकर यांच्या एका बेल्जियमच्या मित्राच्या मुलानं उच्चविद्यविभूषित असूनही एकदा काही मित्रांच्या सांगण्यावरून इंटरनेटद्वारा चपला विकण्याचा व्यवसाय सुरू केला व त्याला काहीही अनुभव नव्हता, फक्त काहीतरी नवीन,वेगळं...
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हिन्दी साहित्य – कविता – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – मनुष्य जाति में ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  ??? मनुष्य जाति में ???   होता है एकल प्रसव, कभी-कभार जुड़वाँ और दुर्लभ से दुर्लभतम तीन या चार, डरता हूँ ये निरंतर प्रसूत होती लेखनी और जन्मती रचनाएँ कोई अनहोनी न करा दें, मुझे जाति बहिष्कृत न करा दें।   हर दिन निर्भीक जियें।   (प्रकाशनाधीन कविता संग्रह से )   ©  संजय भारद्वाज, पुणे ☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मोबाइल– 9890122603 writersanjay@gmail.com ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 6 – तत्वनाश ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार   (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “तत्वनाश”।)   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 6 ☆   ☆ तत्वनाश ☆   रावण अपने दरबार में अपने मंत्रियों के साथ अपने सिंहासन पर  बैठा हैं, और उसके सामने तीन अप्सरायें नृत्य कर रही हैं, जिन्हें इंद्र द्वारा मेघानाथ को शुल्क के रूप में दिया गया था, जब मेघनाथ ने भगवान ब्रह्मा के अनुरोध पर इंद्र को अपने बंधन से मुक्त कर दिया था । गंधर्व संगीत बजा रहे हैं । गंधर्व गंध का अर्थ है खुशबू और धर्व का अर्थ है धारण करना इसलिए गंधर्व पृथ्वी की गंध के धारक हैं, खासकर वृक्ष   और पौधों की । असल...
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हिन्दी साहित्य – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष – लघुकथा – ☆ आज का कान्हा ☆ – श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी“

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “   (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है।आज प्रस्तुत है  श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर एक लघुकथा   “आज का कान्हा”।    ☆ आज का कान्हा ☆   चल भाग बड़ा आया मेरे बेड पर मेरे साथ सोने। जा अपनी दादी के साथ सो। माँ की झिड़की से सहम गया शिवम। मगर ढीठ बना वहीं खड़ा रहा। आहत स्वाभिमान आँखों की राह बह निकला परंतु आँखों में आशा की ज्योत जलती रही। भले ही उसकी माँ उसे जन्म देते ही गुजर गई हो मगर कल कन्हैया के बारे में कहानी सुनाते वक्त दादी ने कहा था कि यशोदा मैया भी कान्हा की सगी माँ नहीं थी।...
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हिन्दी साहित्य – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष – कविता – ☆ दो गीत/भजन ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”   (आज प्रस्तुत है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  द्वारा रचित दो गीत/भजन  “आज जन्मे कृष्ण कन्हाई” तथा “मोरे मन में बस गए श्याम”)   ☆ गीत/भजन - “आज जन्मे कृष्ण कन्हाई” तथा “मोरे मन में बस गए श्याम”☆  एक ☆ आज जन्मे कृष्ण कन्हाई☆   आज जन्मे कृष्ण कन्हाई नंदबाबा के बजत बधैया,घर घर खुशियां छाई नगर नगर में धूम मची है,देते सभी बधाई यमुना गद गद पांव पखारे,शेषनाग परछाई धन्य धन्य ब्रज भूमि सारी,गायें देत दुहाई नंद भी नाचे,नाचीं मैया,खूबै धूम मचाई संग संग "संतोष" भी नाचे,मन में हर्ष समाई     दो मोरे मन में बस गए श्याम   मोरे मन में बस गए श्याम सबसे पावन नाम तिहारो,तेरे चरण सब धाम तू ही बिगड़े काज संवारे,दुनिया से क्या काम पीर द्रोपदी पल में हर ली,बनाये बिगड़े काम मोर मुकुट मुरलीधर मोहन,मधुसूदन घनश्याम भव सागर से पार लगाते,हरें सब पाप तमाम "संतोष" भजे नाम तिहारा,रोज ही सुबहो शाम © संतोष नेमा “संतोष” आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मोबा 9300101799 ...
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हिन्दी साहित्य – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष – कविता – ☆ कान्हा ! एक दिन तु्मको आना ही होगा ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष  डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव    (डॉ. प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की एक  भावप्रवण कविता।)   ☆ कान्हा ! एक दिन तु्मको आना ही होगा ☆   कान्हा ! एक दिन तु्मको आना ही होगा, अनंत प्रतीक्षा राधा की अंत करना होगा। नियति का चक्र भी तुम्हे बदलना होगा, तन मन प्राणों की पीड़ा हरना ही होगा।। कान्हा ! एक दिन तुमको आना ही होगा।   कोटि-कोटि सावन बीते, कलियुग बीते, मधु यौवन बीते, विरह ताप हरना होगा। विरहणी मृगनयनी के चछु रो रोकर रीते, प्रीति घट हुए रीते, प्रेम रस भरना होगा।। कान्हा ! एक दिन तुमको आना ही होगा।   कान्हा ! निज प्रथम प्रेम कैसे तुम भूल गए, गोकुल वृंदावन भूले, मधुवन हर्षाना होगा। नियति कोई हो, प्रेमांजलि चख के चले गए !! राधेय यौवन लौटा, मदन रस वर्षाना होगा।। कान्हा ! एक दिन तुमको आना ही होगा।   अगर नहीं आओगे, गीता का मान घटाओगे, नियंता तुम ही जग के अब दिखलाना होगा। प्रथम प्रेम भुलाओगे, नारी सम्मान मिटाओगे, मान दिला हर्षाओगे, प्रेम अमर कर जाओगे।। कान्हा ! एक दिन तुमको आना ही होगा,   अनंत प्रतीक्षा राधा की अंत करना होगा। नियति का चक्र भी...
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हिन्दी साहित्य – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष – कविता ☆ गोपाला-गोपाला ☆ – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष श्री मच्छिंद्र बापू भिसे (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के विशेष पर्व पर प्रस्तुत है  श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी की कविता  “गोपाला - गोपाला“।    एकता का जश्न हो, मानवता ही श्रीकृष्ण हो, नाम भले अनेक हो, हम सब भारतीय बनेंगे, हृदय हम सबका एक हो.   ? गोपाला-गोपाला  ? देवकी का लाल भी तू, यशोदा का गोपाल भी तू, वासुदेव का प्यारा भी तू, नंद का दुलारा भी तू, गोपियों का मतवाला तू, सृष्टी का रखवाला, गोपाला, गोपाला, सबके प्यारे-प्यारे गोपाला. कंस का भाँजा भी तू, बना उसका काल भी तू, बलराम का भ्राता भी तू, सबका बना दाता भी तू, द्रौपदी की लाज भी तू, अर्जुन का सरताज भी तू, रामायण का राम भी तू, महाभारत का कृष्ण भी तू, सबमें तू और तुझमें है सब, कैसा यह खेल  निराला? गोपाला, गोपाला, सबके प्यारे-प्यारे गोपाला. आज.... राम का रामचंद्र भी तू, रहीम का रहमान भी तू, मंदिर का भजन भी तू, मस्जिद की अजान भी तू, गीता का वचन भी तू, पाक कुरान का कहन भी तू, गुरूग्रंथ का नानकदेव भी तू, बाइबिल का ईसा-मसीह भी तू, न तेरा धर्म कोई, न किसी को माना है निराला, गोपाला, गोपाला, सबके प्यारे-प्यारे गोपाला.   © मच्छिंद्र बापू भिसे भिराडाचीवाडी, डाक भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा –...
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हिन्दी साहित्य – श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष – आलेख – ☆ आओ मनायें…श्रीकृष्ण’ का जन्मोत्सव ☆ – सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष  सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’ (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी  के शुभ अवसर पर प्रस्तुत है ,नरसिंहपुर मध्यप्रदेश की वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’ जी का आलेख "आओ मनाएँ....श्रीकृष्ण  जन्मोत्सव"। )    आओ मनायें...श्रीकृष्ण’ का जन्मोत्सव     भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि की भयानक तूफानी अंधियारी रात में धरती को असुरों के अत्याचारों से मुक्त कराने ‘कृष्ण’ रूपी सूर्य उदित हुआ, जिनका जन्मदिन हम हर साल बड़े ही हर्ष-उल्लास से मनाते हैं... द्वापर युग में सृष्टिपालक भगवान विष्णु सोलह कला संपन्न पूर्णावतार लेकर आये और अपने इस स्वरूप में उन्होंने मर्यादा पालन के साथ-साथ बालपन से ही सभी प्रकार की लीलायें दिखाई... परन्तु दुर्बल मानव मन केवल कुछ ही लीला के आधार पर उनके संपूर्ण जीवन का आकलन कर स्वयं को उनके समकक्ष खड़ा कर लेता हैं... अक्सर लोग उनके माखनचोर, मटकीफोड़, वस्त्रचोर, रास रचैया, मुरली बजैया, छलिया, रणछोड़, बहुपत्नीवादी, कूटनीतिज्ञ आदि कुछ प्रसंगों का ज़िक्र कर अपनी हरकतों पर पर्दा डालना चाहते हैं... जबकि उनके कर्मयोगी, संयमी, आदर्श शिष्य, पुत्र, भाई, राजा, मित्र, सलाहकार, सारथी, सहयोगी,...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 4 ☆ अंगाराची साथ तुला… ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे (सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  ऐसी ही एक संवेदनात्मक भावप्रवण मराठी कविता  ‘अंगाराची साथ तुला...’।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 4 ☆ ☆ अंगाराची साथ तुला...☆ कोण हरतो ! कोण जिंकतो! इथे कुणाची खंत कुणा, जो धडपडतो, जो कळवळतो, रोजच पडतो ही खंत मना.. अंगाराची साथ तुला... अंधारातुन दिशा काढ तू, हाच मानवा संदेश तुला, हृदयातून पेटव मशाल तू, मार्ग दाखवी रोज तुला.. अंगाराची साथ तुला... वादळात जरी पडले घरटे, जोमाने तू बांध पुन्हा, थरथरणारे हात ही दबतील, दगडाखालून काढ जरा.. अंगाराची साथ तुला... सूर्य सोबती नसो तुझ्या, ना चंद्र सोबती दिमतीला, काजव्याची माळ ओवून, बांध तुझ्या तू भाळाला... अंगाराची साथ तुला... लखलखणारा तारा नसू दे, नशीब तारा चमकव ना, वसंतातल्या रंग छटा या, पानगळीत ही पसरव ना... अंगाराची साथ तुला... वितळूनी पोलाद स्वतःस बनव तू, अंगाराची साथ तुला, ढाल नसु दे चिलखताची, छाती मधूनी श्वास हवा.. अंगाराची...
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