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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 10 ☆ जब कभी मैं तनहा होती हूँ ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा   (सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “जब कभी मैं तनहा होती हूँ”। )   साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 10 ☆ जब कभी मैं तनहा होती हूँ ☆ जब कभी मैं तनहा होती हूँ, नज्मों की धार पकड़ लेती हूँ और झूल जाती हूँ दहर के किसी कोने में छुपे एहसासों के खूबसूरत से जंगल में!   कभी-कभी इस धार को पकड़ मैं ऊपर को बढती रहती हूँ, छू लेती हूँ आसमान और उड़ने लगती हूँ मस्त परिंदों की तरह...   और कभी-कभी गिर जाती हूँ नीचे अलफ़ाज़ के दरिया में, अपनी नाज़ुक उँगलियों से तब मैं चुनती जाती हूँ एक-एक हर्फ़ और फिर...
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हिन्दी साहित्य – आलेख – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – रजत जयंती वर्ष विशेष – ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। )  (आज हम संजय दृष्टि के अंतर्गत श्री संजय भारद्वाज जी का  हिंदी आंदोलन परिवार की रजत जयंती पर विशेष आलेख प्रस्तुत करना चाहेंगे.  आखिर संजय दृष्टि ने कभी तो इस पर्व की कल्पना की होगी. अतः आप सबको समर्पित श्री संजय भारद्वाज जी का यह विशेष आलेख .)      ☆ संजय दृष्टि  – रजत जयंती वर्ष विशेष ☆ स्मृतिपटल पर है एक तारीख़, 30 सितम्बर 1995.., हिंदी आंदोलन परिवार की पहली गोष्ठी। पच्चीस वर्ष बाद आज 30 सितम्बर 2019..। कब सोचा था कि इतनी महत्वपूर्ण तारीख़ बन जायेगी 30...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #18 – धूर्त सारथी ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे   (वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एकसार्थक कविता “धूर्त सारथी”।)    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 18  ☆    ☆ धूर्त सारथी ☆   झालो गुलाम आहे सत्तांध या गटाचा होतो विचार कोठे माझ्या इथे मताचा   सत्ता जरी बदलली मी हा तिथेच आहे नेता धनाढ्य इतका व्यापार हा कशाचा   आश्वासने दिलेली होतील का पुरी ही द्यावा कसा भरवसा सत्त्येतल्या ठगांचा   चारा दिसेल तिकडे घोडे असे उधळले हो धूर्त सारथी मी होतो जरी रथाचा   सत्तेस भोगताना मी हात मारलेला कारागृहात शेवट होणार या कथेचा   शिक्षा नकोच इतकी या सेवकास तुमच्या मस्तीत गैरवापर होतो कधी पदाचा   पडलाय प्रश्न साधा जनतेस भाकरीचा नापाक हा इरादा युद्धात झोकण्याचा   © अशोक श्रीपाद भांबुरे धनकवडी, पुणे ४११ ०४३. मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८ ashokbhambure123@gmail.com...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 2 – ☆ लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस   (सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ” । इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)   ☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # २ ☆   ☆ लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले – स्व सुधीर मोघे ☆    कवितेची दालनं पार करत असतांना, अचानक सुधीर मोघेंची ही सुंदर रचना नजरेस पडली. तिच्या शब्दांनी मनाची पकड घेतली, नव्हे मनाचा तळच गाठला, आरपार सारं ढवळून निघालं आणि स्वत:चाच स्वत:शी मूक संवाद सुरू झाला.   *लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले*   लाख हाते द्यावया आभाळ पुढती वाकले ओंजळी पसरावया पण हात नसती मोकळे   स्वच्छंद वाटा धावत्या,डोळे दिवाणे शोधती रेशमी तंतूत पण हे पाय पुरते  गुंतले   सागराच्या मत्त लाटा साद दुरूनी घालती ओढतो जिवास वेड्या जीवघेणा तो ध्वनी   शीड भरल्या गलबतातून शीळ वारा घुमवितो तीच वाटे येतसे जणू हाक अज्ञातातूनी   सांग ओलांडू कसा पण हा वितीचा उंबरा झेप घेण्याला...
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सूचनाएं /Information – ☆ महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा “चार पीढ़ी के कवि” प्रकाशित ☆

 ☆ सूचनाएं /Information ☆  ☆ महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा "चार पीढ़ी के कवि" प्रकाशित ☆ सौ. सुजाता काळे हिंदी भाषा के विकास के लिए 'महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी' एवं ' सेंट पीटर्स विद्यालय, पंचगनी ' की ओर से 28 सितम्बर, 2019 को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था।   प्रथम सत्र में  डाॅ जीतेंद्र पांडेय जी द्वारा  सम्पादित पुस्तक ' चार पीढ़ी के कवि' एवं उनकी लिखी हुई पुस्तक 'कविता की स्वाधीन चेतना' का लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। द्वितीय सत्र में  विद्यार्थियों के लिए ' अपने प्रिय गीतकार से मिलिए ' कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। तृतीय सत्र  में भाषायी संगम कार्यक्रम  का आयोजन किया गया था ।   सौ. सुजाता काळे जी  की कवितायें  'चार पीढ़ी के कवि  में सम्मिलित की गई है इसके लिए उन्हें  ई-अभिव्यक्ति की ओर से  हार्दिक बधाई.    सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी...
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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 7 ☆ हास्य व्यंग्य – बातें बेमतलब  ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’    (हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  की पुस्तक चर्चा  “हास्य व्यंग्य - बातें बेमतलब ”।    ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 6 ☆    ☆ पुस्तक – हास्य व्यंग्य - बातें बेमतलब ☆   पुस्तक चर्चा पुस्तक –बातें बेमतलब लेखक –  अनुज खरे प्रकाशक – मंजुल पब्लिशिंग हाउस भोपाल मूल्य –  175 रु   ☆ पुस्तक  – हास्य व्यंग्य - बातें बेमतलब  – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆   ☆ हास्य व्यंग्य - बातें बेमतलब ☆   आपाधापी भरा वर्तमान समय दुष्कर हो चला है. ऐसे समय में साहित्य का  वह हिस्सा जन सामान्य को बेहतर तरीके से प्रभावित कर पा रहा है जिसमें आम आदमी की दुश्वारियो की पैरवी हो, किंचित हास्य हो, विसंगतियो पर मृदु...
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हिन्दी साहित्य – नवरात्रि विशेष – कविता/गीत ☆ नौ रूपों में नारी-नारायणी  ☆ – श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी”

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी”    (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है. आज प्रस्तुत है  श्रीमती हेमलता मिश्रा ‘मानवी’ जी की  नवरात्रि पर विशेष कविता/गीत  “नौ रूपों में नारी-नारायणी ”.)   ☆  नौ रूपों में नारी-नारायणी ☆   भरा हुआ भीतर तक तुम वो अमृत घट हो एक बार अपनी क्षमताओं सी हो जाओ। मूरत नहीं खुद को खुद में ही पहचानो एक बार तुम नारी-नारायणी हो जाओ।।   पूजाघर या चौराहों पर क्यों पुजो-पुजाओ मानवी बनकर अपने नौं रूपों में आओ। जन्म लेने वाली कन्या हो शैलपुत्री हो।   कौमार्यावस्था तक पवित्र पावनी ब्रह्मचारिणी विवाह पूर्व चंद्र सी निर्मल चंद्रघंटा जन्मदात्री गर्भधारिणी हो कूष्मांडा जन्म देने के बाद संतान की हो स्कंदमाता। संयम-साधन की धारिणी कात्यायनी जगत्राता अपने संकल्पों से पति की जीत ले जो मृत्यु अकाला कालरात्रि...
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हिन्दी साहित्य – नवरात्रि विशेष – कविता – ग़ज़ल/गीतिका ☆ – माँ का  उपवास ☆ – डॉ. अंजना सिंह सेंगर

डॉ. अंजना सिंह सेंगर   (आज प्रस्तुत है  डॉ. अंजना सिंह सेंगर जी  द्वारा रचित  नवरात्रि पर्व पर  माँ दुर्गा देवी  जी को  समर्पित  ग़ज़ल/गीतिका  - माँ का  उपवास)   ☆ ग़ज़ल/गीतिका  - माँ का  उपवास  ☆   माँ का जब उपवास करोगे, ख़ुशियों का आभास करोगे।   मन  में  श्रद्धा-भाव  जगेंगे, पूजन पर विश्वास करोगे।   यश, वैभव, आशीष मिलेगा, जीवन  हर्षोल्लास   करोगे।   माँ मंत्रों को रोज जपोगे, हर संकट का नाश करोगे।   मृत्यु लोक से मोक्ष मिलेगा, माँ चरणों में वास करोगे।   मंज़िल से आगे पहुँचोगे, जीवन को इतिहास करोगे।   आज चलो फिर ये प्रण ले लो, हर दुर्गुण का ह्रास करोगे।   ©  डॉ. अंजना सिंह सेंगर   जिलाधिकारी आवास, चर्च कंपाउंड, सिविल लाइंस, अलीगढ, उत्तर प्रदेश -202001 ईमेल : anjanasiak90@gmail.com...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 17 – नाम की महिमा ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’   (संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “लघु कथा -संस्मरण -नाम की महिमा”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी  ने  इस लघुकथा के माध्यम से  एक सन्देश दिया है कि कैसे धार्मिक स्थल पर तीर्थयात्रियों को श्रद्धा एवं अज्ञात भय से परेशान किया जाता है किन्तु, उनसे सुलझाने के लिए त्वरित कदम उठाना आवश्यक है।  )    ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 17 ☆   ☆ लघु कथा - संस्मरण - नाम की महिमा ☆   हमारे यहाँ हिंदू धर्म में आस्था का बहुत ही बड़ा महत्व है। इसका सबूत है कि यहां पेड़- पौधे, फूल-पत्तों, नदी-पर्वत, कोई गांव, कोई विशेष स्थान अपना अलग ही महत्व लिए हुए हैं। चारों धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग और ना जाने कितने धर्म स्थल अपने विशेष कारणों से प्रसिद्ध हुए हैं। जहाँ पर ना जाने हमारे 33 करोड़ देवी देवताओं का निवास (पूजन स्थल) माना गया है। ऐसी ही एक सच्ची...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (21) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ षष्ठम अध्याय ( विस्तार से ध्यान योग का विषय )   सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।।21।।   बौद्धिक सुख अति अतीन्द्रिय,अनुभव कर दिन रात हो ध्यानस्थ स्वरूप में पाता प्रभु का साथ।।21।।   भावार्थ :  इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं।।21।।   When he (the Yogi) feels that infinite bliss which can be grasped by the (pure) intellect and which transcends the senses, and, established wherein he never moves from the Reality . ।।21।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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