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हिन्दी साहित्य ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆ व्यक्तित्व एवं कृतित्व ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ( ई- अभिव्यक्ति का यह एक अभिनव प्रयास है।  इस श्रंखला के माध्यम से  हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकारों को सादर चरण स्पर्श है जो आज भी हमारे बीच उपस्थित हैं एवं हमें हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। इस पीढ़ी के साहित्यकारों को डिजिटल माध्यम में ससम्मान आपसे साझा करने के लिए ई- अभिव्यक्ति कटिबद्ध है एवं यह हमारा कर्तव्य भी है। इस प्रयास में हमने कुछ समय पूर्व आचार्य भगवत दुबे जी  एवं डॉ राजकुमार 'सुमित्र'  जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आलेख आपके लिए प्रस्तुत किया था जिसे आप निम्न  लिंक पर पढ़ सकते हैं : – हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆ – हेमन्त बावनकर हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆ –...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 27 – व्यंग्य – दुआरे पर गऊमाता ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार (आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन+ सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं।  कुछ पात्र तो अक्सर हमारे गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं ,जो कथानकों को सजीव बना देता है.  आज की  व्यंग्य  दुआरे पर गऊमाता । यह  सामयिक व्यंग्य  हमारे सामाजिक ताने बाने की सीधी साधी तस्वीर उकेरती है।  एक सीधा सादा व्यक्ति एवं परिवार आसपास की घटनाओं  जीवन जीने के लिए क्या कुछ नहीं  करता है? ऐसे सार्थक व्यंग्य के...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #24 – पहाड़ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज    (“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।” हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 24☆ ☆ पहाड़ ☆ 'पहाड़ के पार एक एक राक्षस रहता है। उसकी सीमा में प्रवेश करने वालों को वह खा जाता है।' बचपन में सुनी कहानियों में प्रायः इस राक्षस का उल्लेख मिलता है। बालमन...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ # 12 – विशाखा की नज़र से ☆ निर्वासित ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले    (श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर रचना निर्वासित . अब आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़ सकेंगे. )   ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 12 – विशाखा की नज़र से ☆ ☆ निर्वासित  ☆   पहले वो ज्वार उगाती थी वही खाती और खिलाती थी । पर कई बरस सूखा पडा ,पानी दुश्वार हुआ । धरती तपी और बहुत तपी   फिर उसने कपास ऊगाया उसे ओढा औरों को ओढ़ाया पर इस बदलाव से धरती का सीना छलनी हुआ उसके हर बूँद का दोहन हुआ फिर ना उसमें कपास ऊगा ।   कुछ थे इसी फ़िराक में ,जमीन के जुगाड़ में उन्होंने कंक्रीट का जंगल बुना खरपतवार सा उसे फेंका गया पर उसी जगह उसे काम मिला परिचय पत्र पर नया नाम मिला   पर कितने ही बर्तन वो साफ़ करें हर वक्त उसे फटकार...
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हिन्दी साहित्य – ☆ दीपिका साहित्य #2 ☆ ग़ज़ल – सूखे फूल के पत्ते . . . ☆ – सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान” ( हम आभारीसुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  के जिन्होंने ई- अभिव्यक्ति में अपना” साप्ताहिक स्तम्भ – दीपिका साहित्य” प्रारम्भ करने का हमारा आगरा स्वीकार किया।  आप मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता “Sahyadri Echoes” में पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है आपकी एक बेहतरीन ग़ज़ल सूखे फूल के पत्ते . . . । आप प्रत्येक रविवार को सुश्री दीपिका जी का साहित्य पढ़ सकेंगे।  ☆ दीपिका साहित्य #2 ☆ कविता – सूखे फूल के पत्ते . . .☆  सूखे फूल के पत्ते उड़ाया करता हूँ मैं, याद जब भी आती है तस्वीर तेरी बनाया करता हूँ मैं, रेत के घरोंदे जो बनाये थे हमने साहिल में , बेदर्द लहरों से उनको बचाया करता हूँ मैं , न...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #31 – ☆ Generation Gap ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते (प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी  'Generation Gap'.  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  सुश्री आरुशी जी का आज का आलेख दो  पीढ़ियों के बीच मानसिक द्वंद्व का पर्याय ही तो है।  यह आलेख पढ़ कर हमें अपनी पिछली पीढ़ी का यह वाक्य  कि "हमारे  जमाने में तो ..." अनायास ही  याद आ जाता है और हम अगली पीढ़ी को भी अपने अनुभव ऐसे ही उदाहरण देकर थोपने की कोशिश करते हैं। यह पीढ़ियों से चला आ रहा है। हम भूल जाते हैं कि हमारे समय मैं वह कुछ नहीं था जो आज की पीढ़ी को मिल रहा है चाहे वह रहन सहन से सम्बंधित हो, रुपये का अवमूल्यन हो या लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ' मीडिया'  का...
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हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई भाग 1 ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”   (आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  "पगली  माई"।    इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -"पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ ओ सम्मान वालो ☆ – श्री मनीष तिवारी

श्री मनीष तिवारी    (प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं ,अपितु राष्ट्रीय  स्तर ख्यातिलब्ध साहित्यकार -कवि  श्री मनीष तिवारी जी  की  एक सार्थक एवं कटु सत्य को उजागर करती एक  कविता  “ओ सम्मान वालो ।” इसमें कोई दो मत नहीं है कि  पुरस्कारों/सम्मानों की लालसा और इस दौड़ में अक्सर ऐसा हो रहा है। किन्तु, यहाँ यह कहना भी उचित होगा कि वास्तव में जो सम्मान के हकदार हैं वे  इससे वंचित रह जाते हैं और सभी समान दृष्टि से देखे जाते हैं।  फिर कई ऐसे भी हैं जो बिना किसी लालसा के शांतिपूर्वक स्वान्तः सुखाय साहित्य सेवा किये जा रहे हैं, जो कदापि इस रचना के पात्र नहीं हैं । श्री मनीष तिवारी जी को उनकी इस बेबाक कविता के लिए हार्दिक बधाई। ) ☆ ओ सम्मान वालो  ☆ ओ सम्मान वालो ओ सम्मान वालो लेना है शाल, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र तो रुपये निकालो ओ सम्मान वालो ओ सम्मान वालो ♥  ♥  ♥  ♥  ♥  ♥  ♥ सम्मान करने वाली थोक दुकान पर आओ फुटकर सम्मान वाली दुकान पर मत जाओ हमसे यश पा लो अपना...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (12-13) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ अष्टम अध्याय (ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) ( भक्ति योग का विषय )   सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌ ।।12।। ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌ ।।13।।   संयम से सब द्वार रूंध मन से हदय निरोध प्राणों को धर शीर्ष में साधक साधे योग।।12।। ओंकार का नाद कर मुझे जो करते याद जो तजता है देह वह पाता पद अविवाद।।13।।              भावार्थ :  सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है ।।12 - 13।।   Having closed all the gates, confined the mind in the heart and fixed...
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ई-अभिव्यक्ति: संवाद- 44 ☆ ई-अभिव्यक्ति  वेबसाइट को मिला 1,00,800+ विजिटर्स (सम्माननीय एवं प्रबुद्ध लेखकगण/पाठकगण) का प्रतिसाद ☆ – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–44 ☆ ई-अभिव्यक्ति  वेबसाइट को मिला 1,00,800+ विजिटर्स (सम्माननीय एवं प्रबुद्ध लेखकगण/पाठकगण) का प्रतिसाद ☆  प्रिय मित्रों, आज के संवाद के माध्यम से मुझे पुनः आपसे विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ है। 'ई-अभिव्यक्ति  वेबसाइट को मिला 1,00,800+ विजिटर्स (सम्माननीय एवं प्रबुद्ध लेखकगण/पाठकगण) का प्रतिसाद' शीर्षक से आपके साथ संवाद करना निश्चित ही मेरे लिए गौरव के क्षण हैं।  इस अकल्पनीय प्रतिसाद एवं इन क्षणों के आप ही भागीदार हैं। यदि आप सब का सहयोग नहीं मिलता तो मैं इस मंच पर इतनी उत्कृष्ट रचनाएँ देने में  स्वयं को असमर्थ पाता। मैं नतमस्तक हूँ आपके अपार स्नेह के लिए।  आप सबका हृदयतल से आभार।        वैसे तो मुझे कल ही आपसे विमर्श करना था जब आगंतुकों की संख्या 1,00,000 के पार हो गई थी। किन्तु, हृदय कई बातों को लेकर विचलित था। उनमें कुछ आपसे साझा करना चाहूंगा। कल मेरे परम पूज्य पिताश्री टी डी बावनकर जी की पुण्य तिथि थी, जिनके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं होता। यह सप्ताह भोपाल गैस त्रासदी...
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