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हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ विवशता ☆ डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक  (डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा रचित बदलते सामाजिक परिवेश पर विवशता पर विचार करने योग्य एक सार्थक लघुकथा   “ विवशता ”.) ☆ लघुकथा – विवशता ☆ मोहनलाल की लड़की सुंदर , सुशील, संस्कारित एवं गृह कार्य में दक्ष थी । बचपन से मिले सुसंस्कार एवं शर्मीले स्वभाव के कारण वह वर्तमान परिवेश की आधुनिकता से कोसों दूर थी । पढ़ने में रुचि होने के कारण स्नातक होने के बाद अन्य विभिन्न डिग्रियों को प्राप्त करते -करते उसकी उम्र 28 वर्ष हो चुकी थी। मोहनलाल अपनी लड़की की शादी हेतु बहुत परेशान थे। रिश्ते आ तो बहुत रहे थे, लेकिन लड़के वालों की मांग उनकी हैसियत से बहुत अधिक होने के कारण वे मन मसोस कर रह जाते। एक शाम वे आफिस से घर पहुंचे तो उनकी पत्नी ने उनसे कहा - "क्यों जी, आपने कुछ सुना, मेहता साहब की लड़की ने लव मैरिज कर ली, घर से भाग कर।" पत्नी की बात सुन वे गुमसुम से अपने अंदर उठते विचारों के...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सौंदर्य और प्रेम ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “ ‘ (सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी की  एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता  सौंदर्य और प्रेम) ☆ सौंदर्य और प्रेम  ☆ सौंदर्यबोध मन के प्रेम का चित्रण अबोध आंखों के कैनवास पर मन की तूलिका उकेरती प्रीति की रीति, स्नेह की नीति और वात्सल्य की पाती।। सौंदर्य परिभाषा उभरती प्रेम की भाषा आंखों और मन की सँवरती पुतलियों में!! मां की आंखों में काला कलूटा बेटा कान्हा श्यामसुंदर है और बालक के मन में शूर्पणखा सी मां जग से न्यारी है सबसे प्यारी है - - - सौंदर्य और प्रेम और कुछ नहीं मन और आंखों का आशीष है-- दिल में बसा ईश है और प्रेम हर एक के हदय में बसा प्रेम मंदिर है।।   ©...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विचार -2 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  ☆ संजय दृष्टि  – विचार - 2 ☆ तुम सहमत मत होना मेरे विचार से, यदि हो भी जाओ तो मत करना समर्पण, बचा रखना झीनी-सी अंतररेखा.., अंतररेखा के इस पार मैं उस पार तुम, चिंतन करना मनन करना मंथन करना, मेरे-तुम्हारे विचारों की बिलोई उत्पन्न करेगी नया आविष्कार.., आविष्कार उस आग का जो चकमक के आपसी घर्षण से जन्मती है और सचमुच गलानेे लगती है दाल, सेंकने लगती है रोटियाँ; उन अर्थों में नहीं जिन्हें मुहावरों के आवरण में बदनाम कर रखा है शब्दकोशों ने, आग...
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हिन्दी साहित्य ☆ पुस्तक विमर्श #9 – स्त्रियां घर लौटती हैं – “स्त्रियों  को लेकर बहुत  ही श्रेष्ठ रचाव इन कविताओं में है” – श्री नरेंद्र पुण्डरीक ☆ श्री विवेक चतुर्वेदी

पुस्तक विमर्श – स्त्रियां घर लौटती हैं  श्री विवेक चतुर्वेदी  ( हाल ही में संस्कारधानी जबलपुर के युवा कवि श्री विवेक चतुर्वेदी जी का कालजयी काव्य संग्रह  “स्त्रियां घर लौटती हैं ” का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।  यह काव्य संग्रह लोकार्पित होते ही चर्चित हो गया और वरिष्ठ साहित्यकारों के आशीर्वचन से लेकर पाठकों के स्नेह का सिलसिला प्रारम्भ हो गया। काव्य जगत श्री विवेक जी में अनंत संभावनाओं को पल्लवित होते देख रहा है। ई-अभिव्यक्ति  की ओर से यह श्री विवेक जी को प्राप्त स्नेह /प्रतिसाद को श्रृंखलाबद्ध कर अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास है।  इस श्रृंखला की चौथी कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं श्री  नरेंद्र पुण्डरीक के विचार “स्त्रियों  को लेकर बहुत  ही श्रेष्ठ रचाव इन कविताओं में है ” ।) अमेज़न लिंक >>>   स्त्रियां घर लौटती हैं ☆ पुस्तक विमर्श #9 – स्त्रियां घर लौटती हैं – “स्त्रियों  को लेकर बहुत  ही श्रेष्ठ रचाव इन कविताओं में है ” – श्री नरेन्द्र पुण्डरीक ☆   स्त्रियां घर लौटती हैं' के लिए वरिष्ठ कवि एवं सम्पादक 'माटी' आदरणीय श्री नरेन्द्र पुण्डरीक जी...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 32 – चन्द्रमा की गति और तिथि विज्ञान ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण आलेख  “चन्द्रमा की गति और तिथि विज्ञान”। ) Amazon Link – Purn Vinashak ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 32☆ ☆ चन्द्रमा की गति और तिथि विज्ञान ☆ अब 'सोमवती के अर्थ को समझने की कोशिश करें, यह वह दिन है जो 'सोम' या 'चंद्रमा' का दिन है, जिसका अर्थ सोमवार है क्योंकि चंद्रमा का एक नाम 'सोम' भी है । तो सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं । सोमवार वह दिन है जब चंद्रमा ऊर्जा की अपने चरम पर होती है या 'अमरता' का 'सोम-तरल' वास्तव में चंद्रमा से गिरता है । दूसरी...
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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ # 24 ☆ नवदुर्गांचीऔषधी नऊ रुपे ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे (वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है। श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ ” में आज प्रस्तुत है  नौ देवियों के नवदुर्गा के औषधी रूप  कविता   “नवदुर्गांची औषधी नऊ रुपे”।  उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। ) ☆ नवदुर्गांचीऔषधी नऊ रुपे ☆    उपासना नवरात्री आदिमाया देवीशक्ती महालक्ष्मी महाकाली बुद्धी दात्री सरस्वती !!१!!   नवरात्री तिन्हीदेवी युक्त असे नऊ रुपे औषधांच्याच रुपात जगदंबेची ही रुपे !!२!!   श्रीमार्कण्डेय चिकित्सा नवु गुणांनी युक्त ती श्रीब्रह्मदेवही त्यास दुर्गा कवच म्हणती !!३!!   नवु दुर्गांची रुपे ही युक्त आहेत औषधी उपयोग करुनिया होती हरण हो व्याधी!!४!!   शैलपुत्री ती पहिली रुप दुर्गेचे पहिले हिमावती हिरडा ही मुख्य औषधी म्हटले!!५!!   हरितिका म्हणजेच भय दूर करणारी हितकारक पथया धष्टपुष्ट करणारी!!६!!   अहो कायस्था शरीरी काया सुदृढ करीते आणि अमृता औषधी अमृतमय करीते !!७!!   हेमवती ती सुंदर हिमालयावर दिसे चित्त प्रसन्नकारक तीच चेतकीही असे!!८!!   यशदायी ती श्रेयसी शिवा ही कल्याणकारी हीच औषधी हिरडा सर्व शैलपुत्री करी !!९!!   ब्रह्मचारिणी दुसरी स्मरणशक्तीचे वर्धन ब्राह्मी असे वनस्पती करी आयुष्य वर्धन!!१०!!   मन...
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हिन्दी साहित्य☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 27 ☆ वक्त ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”   (आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी की एक भावपूर्ण कविता  “ वक्त ”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़  सकते हैं . )  ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 27 ☆ ☆ वक्त  ☆ चलने लगी पुरवाइयाँ हैं खलने लगी तनहाइयाँ हैं   झूठ जब भी आया सामने उड़ने लगी हवाईयां हैं   वक्त कुछ ऐसा भी आया साथ न अब परछाइयाँ हैं   दर्द से हम गुजरे इस तरह अब चुभती शहनाइयाँ हैं   अब संभल चलो ज़माने से हरतरफ अब रुसवाईयाँ हैं   हम दिल को समझायें कैसे "संतोष"बड़ी परेशानियाँ हैं   © संतोष नेमा...
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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #4 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका (हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।) आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी  Shri Jagat Singh Bisht (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.) ☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे #4 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆  (हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। ) आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल,...
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आध्यात्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – दशम अध्याय (36) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ दशम अध्याय (भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का कथन)   द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌।।36।। छलियों में मैं द्यूत हॅू तेजस्वी में तेज जय हूँ शिव संकल्प मैं सत्व हूँ सत्य परहेज।।36।। भावार्थ :  मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ।।36।।   I am the gambling of the fraudulent; I am the splendour of the splendid; I am victory; I am determination (of those who are determined); I am the goodness of the good.।।36।।   प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 36 ☆ कलम से अदब तक ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता (डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  प्रेरकआलेख “कलम से अदब तक”.  डॉ मुक्ता जी का यह विचारोत्तेजक एवं प्रेरक लेख हमें और हमारी सोच को सकारात्मक दृष्टिकोण देता है।  जहाँ अदब नहीं है वहां  निश्चित ही अहम् की भावना होगी। अदब हमारे व्यवहार में ही नहीं हमारी लेखनी में भी होनी चहिये। अदब के अभाव में साहित्य सहज सरल और स्वीकार्य कैसे हो सकता है ?  इस आलेख की अंतिम पंक्तियाँ 'चल ज़िंदगी नई शुरुआत करते हैं/ जो उम्मीद औरों से थी/ खुद से करते हैं'... ही हमारे लिए प्रेरणास्पद  कथन है।  यह सत्य है कि शुरुआत स्वयं से करें तभी हम अन्य से आशा रख सकते हैं। इस अतिसुन्दर एवं प्रेरणास्पद आलेख के लिए डॉ मुक्ता जी की कलम को सादर नमन।  कृपया...
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