डॉ भावना शुक्ल

(1)

दुआ
वे करते हैं दुआ
दीन दुनिया के लिए
और
मर जाते हैं बिना दवा के
वे
काटते हैं चक्कर
ओझा,पंडित और गुनिया के
ताने सहते हैं
दुनिया के।
जाहिल का खिताब पाते हैं
सहारा खोजते हैं
जादू-टोना या मंत्र का
दरअसल
वे शिकार है षड्यंत्र का
उन्हें न रोटी मिलती है
न दवा फिर भी वे देते हैं दुआ ।
संतोषी मन सोचता है
जो हुआ सो हुआ ।
जो हुआ सो हुआ ।
(2)
प्रश्न 
भजन से भूख
और
प्रार्थना से
युद्ध का अंत नहीं होता
ज्वालामुखिओं की चर्चा से
चूल्हे नहीं सुलग सकते
और
जुगनुओं के प्रकाश से
नहीं मर सकते अंधेरे ।
घेरे है
प्रश्न ।
हो सकता है
भेड़िए आदमी न बने
किंतु
कैसे रुक सकेगा
आदमियों का
वीडियो में तब्दील होना
तब
बच्चे
बचे आदमी सोचेंगे
कि वे
 क्या करें
कहां रहे
और कैसे मरे ?
© डॉ भावना शुक्ल

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