श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना )

 

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌ ।। 31 ।।

उग्र रूप  तुम कौन प्रभु ! तुम्हें नमन , समझाओ

प्रवृति न जानूं  आपकी , अब प्रसन्न हो जाओ ।। 31 ।।

 

भावार्थ :  मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।। 31 ।।

 

Tell me, who Thou art, so fierce in form. Salutations to Thee, O God Supreme! Have mercy; I desire to know Thee, the original Being. I know not indeed Thy doing.।। 31 ।।

 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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