श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं शिखाप्रद आलेख  “ज्योतिष शास्त्र। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 39 ☆

☆ वास्तु शास्त्र एवं गीता

आप आकाश के विज्ञान के विषय में नहीं जानते जिसे वास्तु कहा जाता है ? वास्तु शास्त्र पारंपरिक वास्तुकला का पारंपरिक हिंदू तंत्र है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘वास्तुकला का विज्ञान’। संस्कृत में कहा गया है कि… गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना । वास्तु शास्त्र घर, प्रासाद, भवन अथवा मन्दिर निर्मान करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है । दक्षिण भारत में वास्तु की नींव के लिए परंपरागत महान साधु मायन को जिम्मेदार माना जाता है और उत्तर भारत में विश्वकर्मा को जिम्मेदार माना जाता है । उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं । वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अतरिक्त 4 विदिशाएं हैं । आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है । इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस मानी गयी है । मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है ।

वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है क्योंकि यह सूर्य के उदय होने की दिशा है। इस दिशा के स्वामी देवता इन्द्र हैं । भवन बनाते समय इस दिशा को सबसे अधिक खुला रखना चाहिए। यह सुख और समृद्धि कारक होता है । इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर भवन में रहने वाले लोग बीमार रहते हैं । परेशानी और चिन्ता बनी रहती हैं । उन्नति के मार्ग में भी बाधा आती है । पूर्व और दक्षिण के मध्य की दिशा को आग्नेश दिशा कहते हैं । अग्निदेव इस दिशा के स्वामी हैं । इस दिशा में वास्तुदोष होने पर घर का वातावरण अशाँत और तनावपूर्ण रहता है । धन की हानि होती है । मानसिक परेशानी और चिन्ता बनी रहती है । यह दिशा शुभ होने पर भवन में रहने वाले उर्जावान और स्वस्थ रहते हैं । इस दिशा में रसोईघर का निर्माण वास्तु की दृष्टि से श्रेष्ठ होता है । अग्नि से सम्बन्धित सभी कार्य के लिए यह दिशा शुभ होती है । दक्षिण दिशा के स्वामी यम देव हैं । यह दिशा वास्तुशास्त्र में सुख और समृद्धि का प्रतीक होती है । इस दिशा को खाली नहीं रखना चाहिए । दक्षिण दिशा में वास्तु दोष होने पर मान सम्मान में कमी एवं रोजी रोजगार में परेशानी का सामना करना पड़ता है । गृहस्वामी के निवास के लिए यह दिशा सर्वाधिक उपयुक्त होती है । दक्षिण और पश्चिम के मध्य की दिशा को नैऋत्य दिशा कहते हैं । इस दिशा का वास्तुदोष दुर्घटना, रोग एवं मानसिक अशांति देता है । यह आचरण एवं व्यवहार को भी दूषित करता है । भवन निर्माण करते समय इस दिशा को भारी रखना चाहिए । इस दिशा का स्वामी देवी निर्ऋति है। यह दिशा वास्तु दोष से मुक्त होने पर भवन में रहने वाला व्यक्ति सेहतमंद रहता है एवं उसके मान सम्मान में भी वृद्धि होती है । इशान दिशा के स्वामी शिव होते हैं, इस दिशा में कभी भी शौचालय नहीं बनना चाहिये । नलकुप, कुआ आदि इस दिशा में बनाने से जल प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है ।

दरअसल वास्तु संरचना के विभिन्न हिस्सों में प्राण ऊर्जा के प्रवाह से खुद को जागरूक करा कर उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने के अतरिक्त और कुछ भी नहीं है । हम आंतरिक प्राण वायुओं की पहचान कर सकते हैं क्योंकि प्राण दृष्टि की भावना के लिए जिम्मेदार है, गंध के लिए अपान, स्वाद के लिए समान, सुनने के लिए उदान और स्पर्श के लिए व्यान । इसके अतरिक्त हम सबसे सामान्य स्थिति में पर्यावरण की प्राण वायुओं को श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं उत्तर दिशा का वायु प्राण है, दक्षिण में अपान है, पूर्व में समान है, पश्चिम में यह व्यान और ऊपर की ओर उदान है ।

ब्रह्मांड में कुछ अन्य प्रकार के वायु भी हैं जो विभिन्न वायुमंडलीय गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हैं । वे संख्या में 7 हैं :

  1. प्रवाह : यह वायु आकाश में बिजली निर्मित करता है ।
  2. अहावा : इस वायु द्वारा ही अंतरिक्ष में सितारे चमकते हैं और समुद्र का पानी जल-वाष्प के रूप में ऊपर जाता है और बारिश के रूप में नीचे आता हैं ।
  3. उधवाहा : यह वायु बादलों के बीच गति के लिए जिम्मेदार है और गर्जन पैदा करता है ।
  4. सांवाहा : यह वायु पहाड़ों को धड़काता है । सांवाहा बादलों को आकार देने और गरज का उत्पादन करने के लिए भी जिम्मेदार है ।
  5. व्यावाहा : यह वायु आकाश में पवित्र जल तैयार करने और आकाशगंगा के निर्माण के लिए जिम्मेदार है।
  6. पारिवाहा : यह वायु ध्यान में बैठने वाले व्यक्ति को ताकत देता है ।
  7. पारावहा : यह वह वायु है जिस पर आत्मा यात्रा करता है ।

© आशीष कुमार 

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