श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत एकअतिसुन्दर सार्थक लघुकथा  “ऊँचा आसन….। प्रत्येक व्यक्ति की सोच भिन्न हो सकती है किन्तु, कई बार कोई बातों बातों में जो कह जाता है वह विचारणीय हो जाता है। एक ऐसी ही विचारणीय रचना के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 75 ☆

? लघुकथा – ऊँचा आसन …. ?

काम वाली बाई उमा का रोज आना होता था, अच्छे संपन्न परिवार में। मेम साहब और साहब भी उसकी बातों से बहुत खुश रहते थे। नाटे कद की सरल स्वभाव की सारे जहां का गम छुपाए वह बहुत मुस्कुरा कर काम करती थी। आते ही ‘किस स्टेशन पर क्या हुआ, कोरोना में कौन मरा, किसके यहां चोरी हुई, किसी की सास ने आज अपनी बहू को खूब खरी-खोटी सुनाई और आज सब्जी का ताजा भाव क्या है’।

इन सब के बीच वह अपनी भी बात कहती जाती:- ” अरे मैम साहब आज मेरा आदमी बिना रोटी खाए चला गया।  घर में आटा जो नहीं था। किसी दिन कहती – आज जी नहीं चला, बच्चों की खूब धुनाई कर कर आई हूं।” और खिलखिला कर हंस पड़ती। पर दिल की बहुत अच्छी थी उमा।

एक दिन घर में मेम साहब अकेली थी। उसको बैठा कर चाय पी रहे थे। अचानक उमा बोल पड़ी :-“मेम साहब मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं, आप लोग बहुत अच्छे हैं, बहुत पढ़े लिखे लोग हैं, बताइए सभी देवी का मंदिर ऊपर ऊँची पहाड़ी पर या किसी कोने की गुफा पर क्यों बना है? जहां देखो चढ़ैया चढ़कर जाना पड़ता है या गुफा में कठिनाई से छुपकर जाना होता है।”

मेम साहब बोली – “अरे उमा उन्होंने अपना स्थान ऊँचा बनाया है। उनकी अपनी जगह है।”

जोर से उमा हंस पड़ी :-“बस यही तो होता आया है।  स्त्री को पहले भी सताया जाता था। सभी देवी घर छोड़ एकांत में ऊपर चढ़कर बैठ जाती थी और कहती- मना अब मुझे। ऊपर चढ़कर आने में तुझे कितना दर्द और बेचैनी सहनी पड़ती है। मुझ तक पहुंचने में तुझे कितना कष्ट सहना  पड़ता है। देवियों ने ऊंचे पहाड़ पर इसीलिए ऊँचा आसन बनाया अब आओ तुम मेरे पास तब पता चलेगा। नारी को पाना सहज नहीं समझो। “यह कहकर वह चलती बनी।

नारी मन उमा की बात को सोचते-सोचते ‘” क्या आज संसार बदल पाया? तब और अब मैं क्या अंतर है? “‘ इस बात को मेम साहब भी सोचने लगी। देवी और नारी की दशा और दिशा में क्या अंतर आया!!!!

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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