डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’
(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं। आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अत्यंत विचारणीय आलेख “कहानी और चुनौतियाँ ”.)
☆ किसलय की कलम से # 43 ☆
☆ कहानी और चुनौतियाँ ☆
प्राचीन काल में जब मानव अपनी स्मृतियाँ एवं घटनायें भाषा लिपि के बिना स्थायी रूप से सँजो नहीं पाता था, तब मानव शिकार, विपदा आदि के संस्मरण अपने परिवार तथा परिचितों को सुनाया करता था। यही बातें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रही हैं। कुछ आश्चर्यजनक, कुछ साहसिक एवं हृदयस्पर्शी प्रसंग परिचितों एवं बच्चों को भले लगते थे। हमारे दादा-दादी और नाना-नानी द्वारा सुनाये गये प्रसंग ही कहानी बने और यही कहानी का शुरुआती दौर माना गया।
किसी घटना, स्थान, वस्तु या व्यक्ति के किसी एक पहलू पर प्रकाश डालते हुए संक्षिप्त में उद्देश्यपूर्ण रोचक विवरण ही कहानी कहलाते हैं। कहानी में कम पात्र एवं सीमित विषय वस्तु होने पर भी कहानीकार यदि कहानी के उद्देश्य को रोचक ढंग से प्रस्तुत कर पाने में सफल होता है, तब कहानी निश्चित रूप से लोकप्रिय हो जाती है। आज भी दादा-दादी अथवा नाना-नानी की कहानियाँ बड़ी रुचि और चाव से इसीलिए सुनी जाती हैं कि उनमें उद्देश्यपूर्ण रुचिकर विषयवस्तु का समावेश तो रहता ही है, साथ ही साथ ये कहानियाँ ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद भी होती हैं। तात्पर्य यह है कि कहानी ऐसी विधा है जो किसी अन्य सहारे की मोहताज नहीं हैं, वह स्वयं ही इतनी सशक्त अभिव्यक्ति है कि उसे ही आधार बनाकर साहित्य विशेषज्ञ उसका विस्तार उपन्यास, एकांकी, महाकाव्य अथवा चित्रपट-कथा आदि के रूप में करते हैं।
इन सबके बावजूद कहानी आशानुरूप विस्तार प्राप्त क्यों नहीं कर पाई? कहानी के पिछड़ने के अनेक कारण हैं। कुछ साहित्यकारों द्वारा अपनी सस्ती लोकप्रियता हेतु लगातार निम्नस्तरीय साहित्य रचना की प्रवृत्ति ने समाज के एक विशेष वर्ग को ही आकर्षित किया है। शेष वर्ग को यह साहित्य अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहा है। वहीं कर्णप्रिय संगीत, लय और आवाज ने पद्य को शिखर पर पहुँचा दिया है। दूरदर्शन, सिनेमा और अंतरजाल आधारित दृश्य साधन उपन्यासों , नाटकों, पटकथाओं को अमर बना रहे हैं । इस प्रकार की साहित्य रचना आधुनिक युग में अपार धन-दौलत की आय के स्रोत बन गये हैं। वैसे भी समाज में ऐश्वर्य प्रतिस्पर्धा के प्रत्येक स्तर में पैर फैलने के कारण समाज जातिगत आधारित न होकर अमीरी-गरीबी के तबके में बँटता जा रहा हैं। यही कारण है कि साहित्य से जुड़े लोग भी आज जनता की रुचि और अपनी व्यावसायिक प्रवृत्ति के कारण स्तरीय साहित्य सृजन को छोड़कर अश्लील व स्तरहीन साहित्य लिखने लगे हैं। यह बात अलग है कि इससे उनकी आमदनी और विलासिता के स्तर में गुणात्मक वृद्धि होती है, परन्तु ऐसे लोग समाज में अपना सकारात्मक योगदान दरकिनार कर अपनी स्वार्थसिद्धि में ही लिप्त रहते हैं। ऐसे ही अनेक कारण हैं, जिससे कहानी विधा एक तरह से पिछड़ी ही है, इसे वह धरातल नहीं मिल पाया है जहाँ इसकी गुणवत्ता में चार चाँद लग सकते थे।
मैं सोचता हूँ, कहानी ऐसी साहित्य विधा है जिसमें न ही काव्य जैसे छन्द-लय के बन्धन होते हैं और न ही किसी वृहद स्तर पर क्लिष्ट शब्दों, अविधा-व्यंजना-लक्षणा शब्द शक्तियों अथवा भाषा की गूढ़ता का प्रयोग की आवश्यकता होती। कहानी में कहानीकार घटना विशेष को अपनी तूलिका से किस अंदाज में प्रस्तुत करता है? उसके द्वारा चुनी गई विषय वस्तु समाज के कितनी नजदीक है। उसके द्वारा अपनाई गई भाषा की मिठास ही उसके द्वारा लिखी कहानी की लोकप्रियता का मानक बनता है। यही कारण है कि लगातार कहानी लेखन से आगे चलकर श्रेष्ठ कहानियों के लिखे जाने में कोई संदेह नहीं रहता।
आज आवश्यकता है कहानी लेखन में एक क्रांति की। आज आवश्यकता है साहित्यप्रेमियों का इस ओर ध्यान आकर्षित कराने की। अन्य साहित्य विधायें जिन कारणों से आगे बढ़ रही हैं, वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न करना आज के कहानीकारों का दृढ़संकल्प ही ‘कहानी’ को आगे बढ़ा सकेगा। अत: सभी कहानीकारों को ऐसे अहम प्रयास करने होंगे जिससे कहानी जन-जन के और निकट पहुँच सके। हमें कहानी गोष्ठियों, कहानी संग्रहों के प्रकाशन से जनमानस में इसकी महत्ता प्रतिपादित करनी होगी। कहानी क्षेत्र में प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर और यथासंभव जागरूकता, कार्यशालाएँ, निरंतर आयोजनों के साथ-साथ वार्षिक सम्मानों की स्थापना भी करनी होगी। आज ऐसे प्रयास ही कहानी को भविष्य में जन-जन तक लोकप्रिय बना सकेंगे।
© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈






इस विख्यात ई-अभिव्यक्ति में आलेख प्रकाशित करने हेतु हम संपादक महोदय के हृदय से आभारी हैं।
– विजय तिवारी ‘ किसलय ‘
सार्थक एवं विचारणीय आलेखों के लिए हार्दिक आभार ।