श्री जय प्रकाश पाण्डेय

“सवाल एक – जवाब अनेक (6)”
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है छठवाँ उत्तर दुर्ग, (छत्तीसगढ़) के प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
आज के संदर्भ में लेखक खुद ही अपनी आँखों पर चमड़े का चपड़ा लगाकर बैठ गया है और अपनी दूरदृष्टि को सीमित कर गया है. यह सरकार, प्रशासन और उसकी व्यवस्था से डरा सहमा हुआ लेखक है जो कोई पंगा लेने से भागता है. यह सुविधाभोगी लेखक दिनोंदिन दुनियांदार होता जा रहा है और साहित्य से इतर अपना कैरियर बनाने में जुटा हुआ है और लिखने पढने में कम और विमोचन, सम्मान, अभिनन्दन कराने और पुरस्कार झपटने में अधिक लगा हुआ है. उसकी किसी भी रचना से उसका बायोडाटा कई गुना बड़ा हो गया है. घोडा तो शक्ति व गति का द्योतक है उससे हर क्षमतावान मशीन का ‘हॉर्सपावर’ तय होता है पर यह लेखक तो अपनी निरर्थक रचनाओं की पाण्डुलिपि और बायोडाटा को अपने ऊपर लादकर किसी गदहे की भांति हांफते हुए पुरस्कारों के पहाड़ खोज रहा है. इस गदहे को लगाम लगाकर उसे साहित्य का घोडा बनाने की ज़रुरत है. विशेषकर व्यंग्यकारों को तो अपने समय की राजनीति और सामाजिक, धार्मिक दुर्दशा पर हस्तक्षेप करने का साहस करना चाहिए जैसा उनके पुरोधा लेखक परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल व अन्यान्य करते आए हैं. उसको अपने लेखन को लगाम की तरह इस्तेमाल करने आना चाहिए ताकि उसके सामने व्यवस्था का जो घोडा बेलगाम हो रहा है उसकी पीठ पर अपने धारदार शब्दों और विचारों की आक्रामकता की चाबुक वह फटकार सके.




