श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा “रात का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना “हक न छीनें परिश्रम का….”।)
☆ तन्मय साहित्य #125 ☆
☆ हक न छीनें परिश्रम का…. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
घाम, सूरज का तपाये
बारिशें, जी भर भिंगाये
निठुर जाड़ा तो जड़ों तक
शीत में तन-मन कँपाये।
वे सदा रहते खुले में
खेत में खलिहान में
गुनगुनाते साथ श्रम के
चाय के बागान में,
बेबसी भीतर दबे दुखदर्द
ये किसको सुनाए…..
मुँह अंधेरे जब उठे
चिंता सताए पेट की
निगल, बासी कौर कुछ
ड्योढ़ी चढ़े फिर सेठ की,
झिड़कियों को अनसुना कर
पसीने में वे बहाए…….
राज-मिस्त्री मजदूरों के
साथ असंगठित हैं जो
करें चिंता श्रमजीवी
समुदाय की अधपेट हैं वो
हक न छीनें परिश्रम का
उसी से अट्टालिकाएँ…..
वे सदा मुस्तेद सीमा पर
अथक अविराम से
युद्ध या हो विभीषिकाएँ
डोर ये ही थामते,
मौसमों से जूझते, पथ में
कई है विषमताएँ…….
© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’
जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश
मो. 9893266014
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈