प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण  ग़ज़ल  “झुलसती सी जा रही है…”। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। ) 

☆ काव्य धारा 76 ☆ गजल – झुलसती सी जा रही है…  ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

विश्वका परिदृश्य तेजी से बदलता जा रहा है

समझ पाना कठिन है कि क्या जमाना आ रहा है।

दुनियाँ के हर देश में है त्रस्त जन, शासक निरंकुश

बढ़ रहे संघर्ष दुःखों का अंधेरा छा रहा है।

प्रेम औ’ सद्भाव की दिखती नहीं छाया कहीं भी

तपन के नये तेज से हर एक पथिक घबरा रहा है।

झुलसती सी जा रही है शांति-सुख की कामनायें

बढ़ रहा आतंक का खतरा, सत्त मंडरा रहा है।

भूख प्यास की मार से घुट सा रहा है दम सबों का

लगता है नई आपदाओं का बवण्डर आ रहा है।

तरसते है नयन लखने हरित् सरिता के किनारे

दृश्य पर मरूभूमि का ही देखने में आ रहा है।

बढ़ रहीं है आदमी में राक्षसी नई वृत्तियाँ नित

अपने आप विनाश का सामान मनुज जुटा रहा है।

सूखती दिखती निरन्तर प्रेम की पावन मधुरता

नित ’विदग्ध’ नया प्रबल संदेह बढ़ता जा रहा हैं।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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