श्री श्याम संकत
(श्री श्याम संकत जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। स्वान्त: सुखाय कविता, ललित निबंध, व्यंग एवं बाल साहित्य में लेखन। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व आकाशवाणी पर प्रसारण/प्रकाशन। रेखांकन व फोटोग्राफी में रुचि। आज प्रस्तुत है आपकी एक गज़ल – ‘टूट जाता है रोज रात में…’।
☆ कविता ☆ गज़ल – टूट जाता है रोज रात में…☆ श्री श्याम संकत ☆
किसी के पेट में जब आग कहीं जलती है
भूख नागिन सी वहां केचुली बदलती है
मिलेगा क्या वहां लज़ीज़ भाषणों के सिवा
भीड़ की जीभ जहां स्वाद को मचलती है
किसी के घर में चहकती है उजालों की किरण
किसी के आंगने दर्दों की शाम ढलती है
टूट जाता है रोज रात में सपनों का महल
नींद उम्मीद में खुद जब भी उठ के चलती है
जिंदगी को न समझ लेना एक भोली बिटिया
चंद बोसे और खिलौनों से जो बहलती है।।
© श्री श्याम संकत
सम्पर्क: 607, DK-24 केरेट, गुजराती कालोनी, बावड़िया कलां भोपाल 462026
मोबाइल 9425113018, [email protected]
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈