श्री विजयानन्द विजय
☆ हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – और, मंजिल मिल गयी… ☆ श्री विजयानन्द विजय ☆ ☆
” स्साली नौकरी न हुई, बेगारी हो गयी है। सुबह से शाम तक बस चाय पिलाओ, नाश्ता कराओ। जैसे और कोई काम ही नहीं है। ” – रामबाबू चाय की केतली लिए बड़बड़ाता हुआ दुकान से ऑफिस की ओर जा रहा था।
राज्य पुलिस में पाँच वर्षों से वह सिपाही के रूप में काम कर रहा था।मगर उसका काम था बस, कुछ फाईल वर्क करना और साहब लोगों को नाश्ता कराना और चाय पिलाना। रोज – रोज के इसी काम से वह ऊब-सा गया था।वह भी चाहता था कि हाथों में बंदूक लेकर दूसरे सिपाहियों की तरह डीएसपी साहब के साथ बाहर जाए।अपराध और अपराधियों का खात्मा करने में अपना भी योगदान दे।आखिर उसकी नियुक्ति भी तो इसी काम के लिए हुई है ? मगर इन पाँच वर्षों में ऐसा मौका उसे कभी मिला ही नहीं।
घर की आर्थिक स्थिति खराब रहने की वजह से माँ-बाबूजी उसे पढ़ा नहीं पाए।किसी तरह उसने मैट्रिक की परीक्षा पास की और पुलिस विभाग में सिपाही बन गया, ताकि घर और माँ-बाबूजी को सँभाल सके। बहन की शादी कर सके।
धीरे-धीरे उसकी कमाई से घर की स्थिति भी सुधरने लगी।बाबूजी ने गाँव में कुछ जमीन खरीद ली।वे उस पर खेती करने लगे। वे मजदूर से खेतिहर बन गये। बहन की शादी भी उसने धूमधाम से अच्छे घर में कर दी।
अपनी इच्छा को मारकर ऑफिस में उसे वह सब कुछ करना पड़ता था, जो वह नहीं चाहता था। मगर वह कर भी क्या सकता था ? हाँ, इस बीच उसने पढ़ाई से अपना मन नहीं हटाया और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से स्नातक की परीक्षा पास कर ली।
उस दिन पहले ही की तरह डीएसपी साहब ने उसे चाय लाने के लिए भेजा था।दुकान पर जाकर उसने केतली दी और चार चाय का आर्डर दिया। तभी उसका मोबाईल फोन बजा। उसके दोस्त का फोन था।
चाय की केतली और कप लेकर जब वह पुलिस स्टेशन पहुँचा, तो सभी उसे देखकर खड़े हो गये।
सामने दीवार पर लगी टीवी पर न्यूज चल रही थी – ” जिले में पदस्थापित पुलिस के जवान रामबाबू आईएएस बने। “
© श्री विजयानन्द विजय
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