श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अथ रंगानुशासनम्”।)
प्रकृति में रंग भी है,और अनुशासन भी ! नीले आकाश में तारे भी हैं और सितारे भी। कहीं कोई तारा टूटता है तो किसी का सितारा डूबता है। फिर भी,एक थाल मोती भरा,सबके सिर पर उल्टा धरा।
आकाश गंगा की तरह इस संसार सागर में भी कई हीरे मोती जड़े हुए हैं। मेरे देश की धरती में कितने खनिज पदार्थ हैं,हीरा पन्ना और सोना है, कौन जानता है। मुंशी प्रेमचंद की एक हीरा मोती नामक दो बैलों की जोड़ी जो करिश्मा नहीं कर पाई वह चमत्कार भारत कुमार की फिल्म उपकार कर गई। इतने हीरे मोती उगले इस फिल्म ने कि भारत कुमार मालामाल हो गए। और सातों महासागरों में कितने मोती होंगे, जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैंठ।।
हमारे रंगों की कथा भी बड़ी अजीब है। दुनिया रंग रंगीली बाबा दुनिया रंग रंगीली। जिंदगी के कई रंग साथी रे! प्रकृति के रंग देखकर तो अनायास ही मन कह उठता है,ये कौन चित्रकार है। ये रंग भरे बादल,ये उड़ता हुआ आंचल। सूर्योदय और सूर्यास्त की रंग बिरंगी छटा, बारिश के दिनों में काले काले बादलों के बीच धरती और आकाश को एक करता इंद्रधनुष।
जरा रंग बिरंगे फूलों का अनुशासन तो देखिए। कलियों ने घूंघट खोले, हर फूल पे भंवरा डोले। इधर भंवरा रस का प्यासा है तो उधर नन्हीं नन्हीं नन्हीं,रंग बिरंगी तितलियां फूलों पर मंडराती,इतराती फिरती हैं। मानो फूलों के कानों में कुछ ऐसा कहकर उड़ जाती है, कि फूल के चेहरे की रंगत ही बदल जाती है।।
यह बाग हमने नहीं लगाया। कौन है इन फूलों की घाटी का माली जो दिन रात इनकी रखवाली और देखरेख करता है। हमारे फूल से कोमल बच्चे भी तो उसी फुलवारी का हिस्सा हैं। कितने सारे फूल और सिर्फ एक माली। फिर भी हाय हमारा कर्तापन और हम्माली।
रंगों का भी अपना एक अनुशासन होता है। पहले कोई आपके मन पर शासन करता है। जब तक आप किसी का मन नहीं रंग सकते,तन के कान में जूं तक नहीं रेंगती। जब किसी के लिए सात रंग के सपने बुने जाते हैं,तब ही मन की रंगत सामने आती है। यूं ही किसी के रंग में चुनरिया नहीं रंगी जाती।।
हम रंगों में केवल अपनों को ही नहीं रंगते, गैरों को भी अपना बनाकर रंग देते हैं। वैसे देखा जाए तो रंग से ही रंग मिलता है,तब ही असली रंगपंचमी मनती है। काश प्रेम के रंग की एक ऐसी बौछार हमारे तन,मन पर पड़े, कि सब राग द्वेष,शिकवे शिकायत,अमीरी गरीबी का भेद सदा के लिए मिट जाए। रंगों का कीर्तिमान किसी के मन को रंगे बिना नहीं रचा जा सकता।
यह कोई भंग की तरंग नहीं,एक नया रंगानुशासन है,जो कभी रंग में भंग नहीं मिलाता,दो बिछड़े हुए दिलों को हमेशा के लिए एक ही रंग,प्रेम के रंग में रंग देता है। सिर्फ एक दिन का नहीं, हर पल का है यह त्योहार,जिसे प्रकृति तो हर पल, हर घड़ी एक उत्सव की तरह,जश्न की तरह मनाती है,लेकिन हम इसी प्रकृति की गोद में रहते हुए भी इससे कितनी दूर हैं।
जीव जब सारे मतभेद,मनभेद और रंगभेद मिटाकर अंतरंग में प्रवेश करता है, तब ही तो वह केवल एक प्रेमरंग ही में डूब जाता है।
प्रेम भले ही उन्मुक्त हो,रंगों का अपना एक अनुशासन है। एक श्याम रंग कितना रंगीला है,रसीला है,बस हर राधा एक राधा, हर श्याम, एक घनश्याम, हर दिन, हर पल, सुबहो शाम। सीताराम, राधेश्याम।।
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© श्री प्रदीप शर्मा
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