श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “भटक रहे बंजारे” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 98 ☆ भटक रहे बंजारे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

आँखों के आगे अँधियारे

भीतर तक फैले कजरारे

सुख की बात करो तो लगता

रूठ गये सारे उजियारे ।

*

अब बातों में बात कहाँ है

कदम-कदम पर घात यहाँ है

सन्नाटों से चीख़ उठी है

मौन हुए सारे गलियारे ।

*

टूटे फूटे रिश्ते नाते

सबके सब केवल धुँधवाते

अपनेपन से खाली-खाली

हुए सभी घर-द्वार हमारे।

*

बेइमानी के दस्तूरों में

जंग लगी है तक़दीरों में

बूझ पहेली उम्र रही है

कहाँ खो गए हैं भिन्सारे।

*

काँधे लिए सफ़र को ढोता

जीवन तो बस राहें बोता

कहाँ मंज़िलों पर पग ठहरें

भटक रहे हैं हम बंजारे।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२०.३.२५

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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