श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २ ☆
☆ कविता ☆ ~ सती उर्मिला ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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माँ सिय तेरे चरित को, कोटि कोटि प्रणाम |
धन्य जानकी मातु जूँ, प्रिय तेरो प्रभु राम ||
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पति के संग वन गमन कर, दिया नेक संदेश |
तुमको था जाना नहीं, था प्रभु को आदेश ||
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पति संग रहने का लिया, एक महा संकल्प |
पतिव्रता के रूप में, नाम विदित बहु कल्प ||
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माता तेरे चरित को, करता पुत्र प्रणाम |
मेरे हिय में राजते, युगल मूर्ति सिय राम ||
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नाम और भी एक है, जिसका अति सम्मान |
लखनप्रिया उर्मिला का, मन में आया ध्यान ||
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एक त्याग कर महल को, गई पिया के संग |
एक विरह में जल रही, हुआ अधूरा अंग ||
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जीवन को वन, बना कर, करती उसमें वास |
वन सा ही था बन गया कोशल राज प्रसाद ||
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राजमहल में बैठकर, करती थी नित ध्यान |
रामानुज थे ह्रदय में, ज्यों शरीर में प्राण ||
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चौदह वर्षों का कठिन, लिया सती ने व्रत |
लखनलाल तत् समय थे, रघुवर सेवा रत ||
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मौन व्रती थी उर्मिला, वीर लखन भी मौन |
मानस के ये श्रेष्ठ जन, नहीं जानता कौन ||
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त्याग दिया रस -राग को, पिय में था अनुराग |
लखन हृदय थीं उर्मिला, रहते निश दिन जाग ||
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बीते जब कुछ वर्ष तो, समय हुआ विपरीत |
संकट के बादल घिरे, बदली सारी रीति ||
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शांत वनस्थल बन गया, रणस्थल अशांत |
सिया हरण मारण मरण, था माहौल अक्रांत ||
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वानर दल को साथ ले, प्रभु ने किया पयान |
सेना साजी विविध रंग, योद्धा थे हनुमान ||
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सागर ने की धृष्टता, मन में आया अभिमान |
रघुवर क्रोधित हो गए, उठा लिया सन्धान ||
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युद्ध भयंकर छिड़ा तब, लंका हुई शमशान |
मेघनाद मारा गया, लछिमन का था बाण ||
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सुलोचना पतिव्रता थी, इंद्रजीत की नारी |
दो सतित्व का समर था, किया बात स्वीकार ||
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सुलोचना – उर्मिला के, पतिव्रत का था जंग |
रण जीती सती उर्मिला, थी लक्ष्मण बामांग ||
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हारी नही सुलोचना, हारा उसका भाग्य |
सीता के संताप ने, मिटा दिया सौभाग्य ||
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पति का पक्ष कुपक्ष था, कारण थी कमजोर |
उर्मि तेरी साधना, शांत प्रात की भोर ||
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विदित उर्मिला नाथ का, जग में विदित प्रताप |
सूर्य उर्मिला नाथ हैं, उर्मि उसकी ताप ||
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उर्मि का तप बन गया, पावन रक्षा सूत्र |
धैर्य – धर्म श्रृंगार शुभ, लज्जा मंगल सूत्र ||
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श्रेयस शब्दों से नही, कर सकता गुणगान |
राम लखन सिय उर्मिला, चारो परम महान ||
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 03-04-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈