श्री हरभगवान चावला
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम और विचारणीय लघुकथा – चाबी)
☆ लघुकथा – चाबी ☆ श्री हरभगवान चावला ☆
बरसों बाद घर का मालिक घर लौटा था। घर की इमारत खंडहर में तब्दील हो गई थी। द्वार जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था, द्वार पर लटका ज़ंग खाया ताला बूढ़ा हो चला था। इस ताले ने बरसों अपनी बेटी चाबी के लौट आने का इन्तज़ार किया था। उसे वह क्षण कभी नहीं भूला, जब घर का मालिक उसे द्वार पर लटका, चाबी को जेब में डालकर चला गया था। लंबे इन्तज़ार के बाद ताले को लगने लगा था कि उसकी चाबी सामान की भीड़ में कहीं खो गई होगी, जैसे कोई बच्ची मेले में खो जाती है। अवसाद में डूबा ताला चाबी से मिलने की आशा छोड़ चुका था। घर के मालिक ने चाबी को दाएँ हाथ की उँगलियों में थामा।
उत्कंठित चाबी चिल्लाई – मैं आ गई हूँ मेरे प्यारे पिता!
मालिक ने बाएँ हाथ में ताले को थामा कि दाएँ हाथ में थामी चाबी से उसे खोल सके। हाथ लगते ही ताला मालिक के हाथ में आ गिरा।
चाबी बार-बार चिल्ला रही थी – मैं आ गई हूँ मेरे प्यारे पिता!
भला मर चुका ताला अपनी चाबी की बेसब्र आवाज़ को कैसे सुनता?
© हरभगवान चावला
सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा, सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
ताले और चाबी के प्रतीक के माध्यम से आज के यथार्थ को उजागर करती बहुत सुंदर लघुकथा ।