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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 72 ☆ मासूमियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है बाल मनोविज्ञान पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा मासूमियत। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस संवेदनशील एवं विचारणीय लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 72 ☆

☆ लघुकथा – मासूमियत ☆

सुनीता  पेट से है, आठवां महीना चल रहा है अब एक साथ सारा काम नहीं होता उससे, सुस्ताती फिर काम में लग जाती।  मालकिन ने कहा भी  कि नहीं होता तो काम छोड दे, पैसा नहीं काटेंगी, पर सुनीता  को डर है कि बच्चा होने के बाद काम ना मिला तो क्या करेगी? दो लडकियां हैं, एक तीन साल की दूसरी पाँच साल की, तीसरा आनेवाला है। घर कैसे चलाएगी वह? मालकिन दिलदार है, उसके खाने – पीने का बहुत ध्यान रखती है इसलिए इसी घर का काम रखा है, बाकी छोड दिए हैं।

काम निपटाने के बाद सुनीता और उसकी लडकियां एक तरफ बैठ गईं। बडकी बोली – अम्मां ! सब काम होय गवा, अब  भाभी दैहें ना हम लोगन का अच्छा – अच्छा खाए का? भाभी रोज बहुत अच्छा खाना खिलावत हैं ,सच्ची  –।  छुटकी बिटिया की नजर तो रसोई से हटी ही नहीं बल्कि बीच – बीच में होंठों पर जीभ भी फिरा लेती । मालकिन ने एक ही थाली में भरपूर भोजन उन तीनों के लिए परोस दिया। दोनों बच्चियां तो इंतजार कर ही रही थीं तुरंत खाने में मगन हो गईं । खाना देकर मालकिन ने सुनीता से पूछा – नवां महीना  पूरा होने को है, कब से छुट्टी ले रही हो तुम? सुनीता कुछ बोले इससे पहले उसकी पाँच साल की बडकी सिर नीचे झुकाए खाना खाते – खाते जल्दी से  बोली ‌- भाभी ! ऐसा करा अम्मां को रहे दें,  हम तोहार सब काम कर देब – झाडू, पोंछा, बर्तन —जो कहबो तुम — –। बस काम छोडे को ना कहैं।

सब खिलखिलाकर हँस पडे, बचपन रो रहा था।

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हिंदी माह विशेष – भाषा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

💥 संजय दृष्टि – राजभाषा मास विशेष – भाषा 💥

 

नवजात का रुदन

जगत की पहली भाषा,

अबोध की खिलखिलाहट

जगत का पहला महाकाव्य,

शिशु का अंगुली पकड़ना

जगत का पहला अनहद नाद,

संतान का माँ को पुकारना

जगत का पहला मधुर निनाद,

प्रसूत होती स्त्री केवल

एक शिशु को नहीं जनती,

अभिव्यक्ति की संभावनाओं के

महाकोश को जन्म देती है,

संभवतः यही कारण है,

भाषा स्त्रीलिंग होती है!

अपनी भाषा में अभिव्यक्त होना अपने अस्तित्व को चैतन्य रखना है।

©  संजय भारद्वाज

(रात्रि 3:14 बजे, 13.9.19)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 114 ☆ संतुलन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण कविता  संतुलन। इस विचारणीय विमर्श के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 114 ☆

🌻 कविता – संतुलन 🌻

 

संतुलन ही तो है

जीवन

समय के पहिये पर

भागम भाग के कांटे

जरा चूक हुई

और गिरे

 

पार करना है

अकेले

जन्म और जीवन की पूर्णता

के बीच बंधी रस्सी

अपने कौशल से

 

जो इस सफर को

मुस्कुरा कर

बुद्धिमत्ता से पूरा कर लेते हैं

उनके लिए

तालियां बजाती है दुनिया

उनकी मिसाल दी जाती है

और

जो बीच सफर में

लुढ़क जाते हैं

असफल

वे भुला दिए जाते हैं जल्दी ही ।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 88 – लघुकथा – फासले ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण लघुकथा  “फासले।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 88

☆ लघुकथा — फासले ☆ 

जय की शादी में मंच पर उस के पिता नहीं आए तो नवविवाहिता अपने को रोक नहीं पाई. अपने पति से पूछ बैठी, “ पापा जी !”

“मंच पर नहीं आएँगे,” जय की आँखों में आंसू आ गए, “ मैं भी चाहता हूँ कि वे यहाँ नहीं आएं.”

पत्नी की निगाहों में प्रश्न था. पति ने धीरे से कहा,“ उन्हें मेरी माँ ने ऐसे ही एक मंच पर, अपनी शादी में बुला कर अपने नए पति के सामने मुझे सौंप दिया था – मुझे अपना प्यार मिल गया और आप को अपना पूत. इसे  सम्हालना.” अभी बेटे की बात खत्म नहीं हुई थी कि पिताजी मंच पर खड़े मुस्करा रहे थे.

मानो कह रहे हो,” बेटा ! इस टीस को कब तक सम्हाल कर तो नहीं रख सकता हूँ ना ?”

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

13-08-21

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 68 ☆ उम्मीद कायम है … ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना उम्मीद कायम है …। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 68 – उम्मीद कायम है …

किसी घटनाक्रम में जब हम सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देते हैं तो स्वतः ही सब कुछ अच्छा होता जाता है। वहीं नकारात्मक देखने पर खराब असर हमारे मनोमस्तिष्क पर पड़ता है।

अभावों के बीच ही भाव जाग्रत होते हैं। जब कुछ पाने की चाह बलवती हो तो व्यक्ति अपने परिश्रम की मात्रा को और बढ़ा देता और जुट जाता है लक्ष्य प्राप्ति की ओर। ऐसा कहना एक महान विचारक का है। आजकल सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा  वीडियो इन्हीं विचारों से भरे हुए होते हैं। जिसे देखो वही इन्हें सुनकर अपनी जीवनशैली बदलने की धुन में लगा हुआ है। बात इतने पर आकर रुक जाती तो भी कोई बात नहीं थी लोग तो सशुल्क कक्षाएँ  भी चला रहे हैं। जिनकी फीस आम आदमी के बस की बात नहीं होती है क्योंकि इन्हें देखने वाले वही लोग होते हैं जो केवल टाइम पास के लिए इन्हें देखते हैं। दरसल चार लोगों के बीच बैठने पर ये मुद्दा काफी काम आता है कि मैं तो इन लोगों के वीडियो देखकर बहुत प्रभावित हो रहा हूँ। अब मैं भी अपना ब्लॉग/यू ट्यूब चैनल बनाकर उसे बूस्ट पोस्ट करूंगा  और देखते ही देखते  सारे जगत में प्रसिद्ध हो जाऊँगा।

इतने लुभावने वीडियो होते हैं कि बस कल्पनाओं में खोकर सब कुछ मिल जाता है। जब इन सबसे मन हटा तो सेलिब्रिटी के ब्लॉग देखने लगते हैं बस उनकी दुनिया से खुद को जोड़ते हुए आदर्शवाद की खोखली बातों में उलझकर पूरा दिन बीत जाता है। कभी – कभी मन कह उठता है कि देखो ये लोग कैसे मिलजुल एक दूसरे के ब्लॉग में सहयोग कर रहे हैं। परिवार के चार सदस्य और चारों के अलग-अलग ब्लॉग। एक ही चीज चार बार विभिन्न तरीके से प्रस्तुत करना तो कोई इन सबसे सीखे। सबको लाइक और सब्सक्राइब करते हुए पूरा आनन्द मिल जाता है। मजे की बात,  जब डायरी लिखने बैठो तो समझ में आता है कि सारा समय तो इन्हीं कथाकथित महान लोगों को समझने में बिता दिया है। सो उदास मन से खुद को सॉरी कहते हुए अगले दिन की टू डू लिस्ट बनाकर फिर सो जाते हैं। 

बस इसी  उधेड़बुन में पूरा दिन तो क्या पूरा साल कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चल बीतता जा रहा है। हाँ कुछ अच्छा हो रहा है तो वो ये कि मन सकारात्मक रहता है और एक उम्मीद आकर धीरे से कानों में कह जाती है कि धीरज रखो समय आने पर तुम्हारे दिन भी बदलेंगे और तुम भी मोटिवेशनल स्पीकर बनकर यू ट्यूब की बेताज बादशाह बन चमकोगे।

 

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हिंदी माह विशेष – हिंदी के मुक्तक ☆ प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

☆ हिंदी माह विशेष – हिंदी के मुक्तक ☆ प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे ☆

(1)

हिंदी नित आगे बढ़े, यही आज अरमान।

हिंदी का उत्थान हो, यही फले वरदान।

हिंदी की महिमा अतुल, जाने सारा विश्व,

हिंदी का गुणगान हो, हिंदी का यशगान।।

(2)

हिंदी का अभिषेक हो, जो देती उजियार।

हिंदी का विस्तार हो, जो हरती अँधियार।

हिंदी तो सम्पन्न है, मंगल का है भाव,

हिंदी को पूजे सदा, अब सारा संसार।।

(3)

हिंदी तो शुभ नेग, हिंदी तीरथधाम।

फलदायी हिंदी सदा, लिए विविध आयाम।

हिंदी तो अनुराग है, हिंदी है संकल्प,

हिंदी को मानें सभी, यूँ ही सुबहोशाम।।

(4)

हिंदी में तो शान है, हिंदी में है आन।

हिंदी में क्षमता भरी, हिंदी में है मान।

हिंदी की फैले चमक, यही आज हो ताव,

हिंदी पाकर उच्चता, लाए नवल विहान।।

(5)

हिंदी में है नम्रता, किंचित नहीं अभाव।

नवल ताज़गी संग ले, बढ़ता सतत प्रभाव।

दूजी भाषा है नहीं, हिंदी तो अनमोल,

कितना नेहिल है ‘शरद’, इसका मधुर स्वभाव।।

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे 

शासकीय जेएमसी महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661
(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 76 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – पञ्चदशोऽध्यायः अध्याय ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । 

आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है पञ्चदशोऽध्यायः अध्याय

पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 76 ☆

☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – पञ्चदशोऽध्यायः अध्याय ☆ 

स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई है। आज आप पढ़िए पन्द्रहवां अध्याय। आनन्द उठाइए। 🌹🙏

– डॉ राकेश चक्र 

पुरुषोत्तम योग

श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को पुरुषोत्तम योग के बारे में ज्ञान दिया।

 

श्रीभगवान ने कहा-

 

है शाश्वत अश्वत्थ तरु, जड़ें दिखें नभ ओर।

शाखाएँ नीचें दिखें, पतवन करें विभोर।। 1

जो जाने इस वृक्ष को, समझे वेद-पुराण।

जग चौबीसी तत्व में,बँटा हुआ प्रिय जान।। 1

 

शाखाएँ चहुँओर  हैं, प्रकृति गुणों से पोष।

विषय टहनियाँ इन्द्रियाँ,जड़ें सकर्मी कोष।। 2

 

आदि, अंत आधार को, नहीं जानते लोग।

वैसे ही अश्वत्थ है, वेद सिखाए योग।। 3

 

मूल दृढ़ी इस वृक्ष की, काटे शस्त्र विरक्ति।

जाए ईश्वर शरण में,पाकर मेरी भक्ति।। 4

 

मोह, प्रतिष्ठा मान से, जो है मानव मुक्त।।

हानि-लाभ में सम रहे, ईश भजन से युक्त।। 5

 

परमधाम मम श्रेष्ठ है, स्वयं प्रकाशित होय।

भक्ति पंथ जिसको मिला,जनम-मरण कब होय।। 6

 

मेरे शाश्वत अंश हैं, सकल जगत के जीव।

मन-इन्द्रिय से लड़ रहे, माया यही अतीव।। 7

 

जो देहात्मन बुद्धि को, ले जाता सँग जीव।

जैसे वायु सुगंध की, उड़ती चले अतीव।। 8

 

आत्म-चेतना विमल है, करलें प्रभु का ध्यान।

जो जैसी करनी करें, भोगें जन्म जहान।। 9

 

ज्ञानचक्षु सब देखते, मन ज्ञानी की बात।

अज्ञानी माया ग्रसित, भाग रहा दिन-रात।। 10

 

भक्ति अटल हो ह्रदय से, हो आत्म में लीन।

ज्ञान चक्षु सब देखते, तन हो स्वच्छ नवीन।। 11

 

सूर्य-तेज सब हर रहा, सकल जगत अँधियार।

मैं ही सृष्टा सभी का, शशि-पावक सब सार।। 12

 

मेरे सारे लोक हैं, देता सबको शक्ति।

शशि बनकर मैं रस भरूँ, फूल-फलों अनुरक्ति।। 13

 

पाचन-पावक जीव में, भरूँ प्राण में श्वास।

अन्न पचाता मैं स्वयं, छोड़ रहा प्रश्वास।। 14

चार प्रकारी अन्न है, कहें एक को पेय।

एक दबाते दाँत से, जो चाटें अवलेह्य।। 14

एक चोष्य है चूसते, मुख में लेकर स्वाद।

वैश्वानर मैं अग्नि हूँ, सबका मैं हूँ आदि।। 14

 

सब जीवों के ह्रदय में, देता स्मृति- ज्ञान।

विस्मृति भी देते हमीं, हम ही वेद महान।।15

 

दो प्रकार के जीव

दो प्रकार के जीव हैं,अच्युत-च्युत हैं नाम।

क्षर कहते हैं च्युत को, ये है जगत सकाम।। 16

क्षर अध्यात्मी जगत में, अक्षर ये हो जाय।

जनम-मरण से छूटता, सुख अमृत ही पाय।। 16

 

क्षर-अक्षर से है अलग, ईश्वर कृपानिधान।

तीन लोक में वास कर, पालक परम् महान।। 17

 

क्षर-अक्षर के हूँ परे, मैं हूँ सबसे श्रेष्ठ।

वेद कहें परमा पुरुष, तीन लोक कुलश्रेष्ठ।। 18

 

जो जन संशय त्यागकर, करते मुझसे प्रीत।

करता हूँ कल्याण मैं, चलें भक्ति की रीत।। 19

 

गुप्त अंश यह वेद का, अर्जुन था ये सार।

जो जानें इस ज्ञान को, होयँ जगत से पार।। 20

 

इति श्रीमद्भगवतगीतारूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन संवाद में ” पुरुषोत्तम योग ” पन्द्रहवां अध्याय समाप्त।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 3 (61-65)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #3 (61-65) ॥ ☆

 

आघात उसका विकट झेल छाती पै रघु गिरे नीचे औं आँसू भी सबके

पर झट व्यथा भूल, ले धनुष, लडने लगे सुनके जयकार फिर सँभल तनके। 61।

 

वज्राहत रघु के पराक्रम औं साहस से होके प्रभावित लगे इंद्र हँसने

सच है सदा सद्गुणों में ही होती है ताकत सदा सभी को वश में करने ॥ 62॥

 

कहा इंद्र ने इस बली वज्र से बस सहा पर्वतों के सिवा सिर्फ तुमने

मै हूँ तुम से खुश रघु अब इस अश्व को छोड़ वरदेने का सोचा है हमने ॥ 63॥

 

तब स्वर्ण रंजित चले बाण कतिपय से भासित सी दिखती थी जिसकी ऊँगलियाँ

उस रघु को बाणों को रख बात करते खिली पुष्प सी इंद्र के मन की कलियाँ। 64।

 

यदि अश्व यह आप देते नहीं है, तो यह दें – ‘‘ पिता यज्ञ का पुण्य पायें

इस सौवें अश्वमेघ के पूर्ण फल से पिता जी मेरे लाभ पूरा उठायें ॥ 65॥

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




सूचना/Information ☆ सम्पादकीय निवेदन – सौ. मनीषा रायजादे पाटील – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

💐संपादकीय निवेदन💐

💐 सौ. मनीषा रायजादे पाटील – अभिनंदन 💐

 

💐  अभिनंदन! अभिनंदन! अभिनंदन! 💐 

ई–अभिव्यक्तीच्या लेखिका, कवयत्री  सौ. मनीषा पाटील रायजादे यांच्या काव्यमनीषा या कवितासंग्रहाचे प्रकाशन १२ सप्टेंबर रोजी प्रा. वैजनाथ महाजन यांच्या अध्यक्षतेखाली  झाले. यावेळी झालेल्या परिसंवादात श्री. सुधाकर ईनामदार, दयासागर बन्ने,व ई – अभिव्यक्तीचे लेखक श्री आनंद हरी आणि सौ मनीषा पाटील यांचा सहभाग होता.  ई – अभिव्यक्तीतर्फे सौ. मनीषा पाटील रायजादे यांचे अभिनंदन व पुढील वाटचालीसाठी शुभेच्छा. – संपादक मंडळ, ई – अभिव्यक्ती

आजच्या अंकात वाचा सौ. मनीषा पाटील रायजादे यांची कविता 

🦋 घे जरासे 🦋 

शृंगार आज केला निरखून घे जरासे

ओल्या मिठीत आता झिरपून घे जरासे

 

श्वासात श्वास माझे बेधुंद होत गेले 

ओठास ओठ माझे बिलगून घे जरासे

 

बेभान मोग-याच्या फुलल्या कळ्या सुगंधी

गंधीत या क्षणाना कवळून घे जरासे

 

गंधाळल्या फुलांच्या त्या पाकळ्या गुलाबी

स्पर्शातले तराणे समजून घेऊ जरासे

 

फुलवित नभात माझ्या ही रात चांदण्याची

अधरातले  उसासे समजून घे जरासे

(काव्यमनीषा काव्यसंग्रहातून)

मनीषा रायजादे-पाटील

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 78 – स्वप्न…! ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #78 ☆ 

☆ स्वप्न…! ☆ 

पावसात भिजताना “तिला”

आठवणारा मी

आज माझ्या फुटपाथ वरच्या झोपडीची

तारांबळ बघत होतो

आणि…

पावसाचं पाणी झोपडीत येऊ नये म्हणून

माझ्या माऊलीची चाललेली धडपड

नजरेत साठवत होतो

इतक करूनही..झोपडीत

निथळणार पाणी थेट तिच्या

काळजाला भिडत होत

आणि…

काय कराव या विचारानेच

तिच्या डोळ्यात पाणी कसं

अगदी सहज दाटत होत

कुटुंबातली लेकरं

अर्ध्या-मुर्ध्या कपड्यावर

मनसोक्त भिजत होती

माझी माय मात्र

आपल्या तुटपुंज्या संसाराची

स्वप्ने आवरत होती

तिची स्वप्ने म्हणजे तरी

काय असणार?

एका बंद पेटीत कोंडलेली चार दोन भांडी

आणि संसारा प्रमाणे फाटलेली

बोचक्यात बांधुन ठेवलेली काही लुगडी

फुटपाथ वरच्या संसारात

असतच काय खरतर

आवरायला कमी आणि सावरायला जास्त

कुठेही गेल की

चुल तेवढी बदलत जाते आणि..

फिरता संसार घेऊन फिरणार्‍या

माझ्या माऊलीची स्वप्न मात्र

ती बंद पेटीच पहात असते…!

 

© सुजित कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈