हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 150 ☆ लघुकथा – चोर ओटी ! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय एवं हृदयस्पर्शी लघुकथा ‘चोर ओटी। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 150 ☆

☆ लघुकथा – चोर ओटी☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

वह काम के लिए निकल ही रही थी कि स्वयं सेवी संस्थावालों का फोन आया कि वे आज बेटी को ले जाने के लिए आनेवाले हैं। काम से छुट्टी तो नहीं ले सकती, पहले ही बहुत नागा हो चुका है। आँसू पोंछती हुई वह काम पर निकल पड़ी। हमेशा की तरह डॉक्टर मैडम के घर समय से पहुँच गई। उसे देखते ही मैडम बोली- “संगीता जल्दी से झाड़ू-पोंछा कर दो बहू की ‘चोर ओटी’ की रस्म करनी है। “

“चोर ओटी? यह कौन सी रस्म होती है मैडम?”

 मैडम हँसते हुए बोली – “ हमारे यहाँ गर्भधारण के तीन महीने पूरे होने पर घर की औरतें गर्भवती स्त्री की गोद भरती हैं। उसके बाद ही उसके माँ बनने की खबर सबको दी जाती है। इसे ही ‘चोर ओटी’ कहते हैं। अब समझ में आया संगीता?”

संगीता के चेहरे का रंग उतर गया उसने मानों हकलाते हुए कहा- हाँ—हाँ मैडम!। उसके चेहरे पर भाव आँख-मिचौली कर रहे थे। वह सोचने लगी – मेरी बेटी के भी तो तीन महीने पूरे हो गए ——? जो भी हुआ उसमें मेरी बच्ची का क्या दोष है? कितने सपने देखे थे बेटी की शादी के लिए, एक पल में सब चकनाचूर हो गए। रोज की तरह काम करने गई थी, पीछे कौन आकर बेटी के साथ जबरदस्ती कर गया, पता ही नहीं चला।

 संगीता का काम में मन ही नहीं लग रहा था। जल्दी- जल्दी काम निपटाकर वह घर की ओर चल दी। रास्ते में उसने चूड़ियाँ और श्रृंगार का सामान खरीद लिया। घर आकर एक कोने में निर्जीव सी पड़ी बेटी को उठाकर उसको चूड़ियाँ पहनाई, बाल बनाएं। लाल चुनरी उढ़ाकर, माथे पर बिंदी लगाकर अंजुलि में चावल लेकर उसकी गोद भर दी। वह अपनी बेटी को खाली हाथ कैसे जाने देगी? संगीता सितारों से उसकी गोद भर देना चाहती है। वह बेटी को छाती से चिपकाए रो रही है। बलात्कार की शिकार नाबालिग बेटी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संगीता मन ही मन कलप रही है – काश! वह भी सबको बता सकती कि उसकी बेटी माँ बनने वाली है।

स्वयंसेवी संस्थावाले दरवाजे पर आ गए हैं।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 238 ☆ संस्कारों के मूल्य… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना संस्कारों के मूल्य। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 238 ☆ संस्कारों के मूल्य

अक्सर लोग शिकायती मुद्रा में दिखते हैं; हमेशा असंतुष्ट। किसी भी चीज में बुराई देखना तो मानो जन्मसिद्ध अधिकार है। दस कार्यों में यदि एक कार्य गलत भी होता है तो नौ को भूल कर उस दसवें के पीछे पड़ जाते हैं जो किसी कारणवश बिगड़ गया हो।

अब सोचिए यदि व्यक्ति डर कर कार्य करेगा तो सारे बिगड़ेंगे। जो करेगा उसी से तो गलती होगी। परन्तु नकारात्मक विचार धारा के लोग बस बाल की खाल निकाल कर खुद को श्रेष्ठ मानने का ढोंग करते हुए कब असहाय हो जाते हैं ये उन्हें पता ही नहीं चलता।

संस्कार का अर्थ -सजाना, अपने आस पास के परिवेश को नैतिक मूल्यों द्वारा समृद्ध करना जिससे भावी पीढ़ी संस्कारित हो अपनी संस्कृति पर गौरव कर सके। हमारे संस्कारों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाना ठीक वैसा ही है जैसे ये अजर अमर आत्मा एक शरीर को छोड़ दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।

भारतीय संस्कृति का ज्ञान वेदों में समाहित है जो हर भारतीय जनमानस में किसी न किसी रूप में देखा जा सकता है। हम अपने पूर्वजों के मूल्यों का अनुकरण करते हुए समाज में मिल जुल कर रहने का कार्य बड़ी निपुणता से करते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का मंत्र हमारे जीवन का आधार है। सर्वे भवन्तु सुखिनः… कार्यशैली है। देवों ने भी इस पुण्यधरा पर अवतरित होकर यहाँ की संस्कृति व संस्कार का परिमार्जन किया है। इन्हीं पद चिन्हों पर चलकर भारत का गौरव बढ़ा सकते हैं —

संस्कार की जननी भारत

पुण्य धरा अवतारों की।

स्वर्ण कलश सी सम्मोहक है

गंग जमुन रसधारों की। ।

*

यहीं कृष्ण की सम्मोहक छवि

गीता का वरदान मिला।

मर्यादा श्री रामचन्द्र सी

तुलसी मानस ज्ञान मिला। ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अबाध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अबाध ? ?

एक क्षण में मनुष्य,

वर्तमान से

अतीत हो जाता है,

फिर स्मृतियाँ,

अतीत को

वर्तमान बनाए रखने का

निरंतर यत्न करती हैं,

साकार में अतीत,

निराकार में वर्तमान,

समय की गति अबाध बहती है,

अक्षुण्ण कालचक्र की बारम्बारता,

मनुष्य की अबाध स्मृतिरेखा के आगे

हर बार बौनी सिद्ध होती है..!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:36 बजे, 1 अप्रैल 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 46 – आम आदमी की खोज में ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना आम आदमी की खोज में)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 46 – आम आदमी की खोज में ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

सुबह-सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई। आँखें मलते हुए दरवाज़ा खोला, तो सामने एक आदमी खड़ा था। कुर्ता फटा हुआ, बाल बिखरे हुए और चेहरे पर ऐसा भाव, जैसे पूरी दुनिया का बोझ उसी के कंधों पर हो। मैंने पूछा, “कौन हो भाई?”

वह बोला, “मैं आम आदमी हूँ।”

मुझे झटका लगा। आम आदमी? यह तो वही प्राणी है, जिसका ज़िक्र नेता चुनावी भाषणों में करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उसे भूल जाते हैं। मैं चौंक कर बोला, “अरे वाह! तुम सच में आम आदमी हो? सुना है, अब तुम्हारा अस्तित्व ही नहीं बचा। तुम्हें तो सरकारों ने योजनाओं में उलझा दिया, नीतियों में घुमा दिया, और विकास में दबा दिया। फिर तुम यहाँ कैसे?”

वह लंबी साँस लेकर बोला, “बस, जैसे-तैसे ज़िंदा हूँ। कभी महँगाई मुझे मारती है, कभी बेरोज़गारी। कभी कोई योजना मेरे नाम पर बनती है और फिर फाइलों में गुम हो जाती है। कभी मुझे सब्सिडी का सपना दिखाकर लूट लिया जाता है। पर मैं फिर भी जी रहा हूँ।”

मैंने उसे अंदर बुलाया और कुर्सी पर बैठने को कहा। लेकिन उसने कुर्सी को घूरकर देखा और फर्श पर बैठ गया। मैंने कहा, “अरे भाई, कुर्सी पर बैठो।”

वह कड़वा हँसा और बोला, “कुर्सी मेरी किस्मत में नहीं है। मैं तो हमेशा ज़मीन पर ही बैठता आया हूँ। कुर्सी तो नेताओं और अफसरों के लिए बनी है। मैं जब भी कुर्सी की ओर बढ़ता हूँ, कोई न कोई मुझसे पहले उस पर बैठ जाता है।”

मैं उसकी व्यथा समझने लगा। मैंने पूछा, “खैर, बताओ, कैसे आना हुआ?”

वह बोला, “सुनो, मैं परेशान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि मैं आखिर जाऊँ तो जाऊँ कहाँ? सरकार कहती है कि सबके लिए रोज़गार है, लेकिन जब मैं नौकरी के लिए आवेदन करता हूँ, तो फॉर्म की फीस ही इतनी होती है कि नौकरी से पहले ही कंगाल हो जाता हूँ। इंटरव्यू तक पहुँचता हूँ, तो कोई न कोई मेरा हक़ मार लेता है। कहते हैं, आरक्षण की व्यवस्था है, लेकिन मेरी स्थिति ऐसी हो गई है कि मैं आरक्षित भी नहीं हूँ और सामान्य भी नहीं। मैं एक लावारिस जाति का आदमी हूँ, जिसका कोई माई-बाप नहीं।”

मैंने सिर हिलाया, “बात तो सही है, लेकिन सरकारें तो कहती हैं कि वे आम आदमी के लिए बहुत कुछ कर रही हैं। योजनाएँ बना रही हैं, मुफ्त अनाज बाँट रही हैं, डिजिटल इंडिया बना रही हैं।”

आम आदमी हँसा, “हाँ, यही तो विडंबना है। अनाज बाँटते हैं, लेकिन पहले टैक्स के नाम पर मेरी कमाई काट लेते हैं। कहते हैं, गैस सब्सिडी देंगे, लेकिन पहले दाम इतना बढ़ा देते हैं कि सब्सिडी भी मज़ाक लगती है। डिजिटल इंडिया बना रहे हैं, लेकिन नेटवर्क ऐसा है कि जब ज़रूरत होती है, तब ग़ायब हो जाता है। और फिर, मोबाइल तो खरीद लिया, लेकिन रीचार्ज के पैसे नहीं बचे।”

मैंने चाय बनाई और उसे दी। उसने कप को घूरकर देखा, जैसे उसमें कोई गूढ़ रहस्य छिपा हो। मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

वह बोला, “चाय महँगी हो गई है। पहले पाँच रुपए में आती थी, अब बीस की हो गई है। ऐसा लगता है कि सरकार हमें चाय के बहाने आर्थिक सुधारों की चुस्कियाँ पिला रही है।”

मैं हँस पड़ा, “तुम्हारा कटाक्ष बड़ा तीखा है।”

वह गंभीर हो गया, “कटाक्ष ही तो कर सकता हूँ। हक़ की बात करूँ, तो कोई सुनता नहीं। कोर्ट जाऊँ, तो केस सालों तक चलता है। अफसरों के पास जाऊँ, तो फाइलों में उलझ जाता हूँ। और अगर गलती से नेता के पास चला जाऊँ, तो वह मुझे वोट बैंक समझने लगता है। मैं शिकायत नहीं कर सकता, क्योंकि शिकायत करने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।”

मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ एक गहरी थकान थी। यह वही थकान थी, जो किसी भी आम आदमी के चेहरे पर दिखती है, जब वह सुबह ट्रेन में धक्के खाता है, दिनभर काम करता है और शाम को खाली जेब लेकर घर लौटता है।

मैंने कहा, “तो फिर अब क्या करोगे?”

वह उठ खड़ा हुआ और बोला, “फिर से कोशिश करूँगा। यही तो मेरी नियति है। मैं हर बार गिरता हूँ, लेकिन उठकर फिर से चल पड़ता हूँ। मुझे कोई नहीं पूछता, लेकिन पूरा देश मेरे नाम पर चलता है। बजट बनता है, तो कहा जाता है कि आम आदमी के लिए है। योजनाएँ बनती हैं, तो दावा किया जाता है कि आम आदमी को फायदा होगा। और चुनाव आते ही सब मुझे भगवान बना देते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, मैं फिर से सड़क पर आ जाता हूँ।”

मैंने उसे जाते हुए देखा। वह धीरे-धीरे भीड़ में गुम हो गया। मैंने सोचा, यह आम आदमी किसी एक का नहीं है। यह हम सबका चेहरा है, जो कभी किसी बस में धक्के खाता है, कभी राशन की लाइन में खड़ा होता है, कभी महँगाई से परेशान होता है और कभी अपने ही देश में खुद को बेगाना महसूस करता है। यह देश आम आदमी का नहीं, बल्कि आम आदमी के नाम पर चलने वालों का है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 344 ☆ आलेख – “आलेख – ए आई : लाभ और हानि…” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 344 ☆

?  आलेख – ए आई : लाभ और हानि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

अपने स्कूल के दिनों की याद आती है, एक निबंध, भाषण या वाद विवाद का विषय बड़ा लोकप्रिय था ” विज्ञान के लाभ और हानि “, विज्ञान ने गुणक के स्वरूप में आम जनता की जिंदगी में हस्तक्षेप बढ़ाया है, और आज ए आई के लाभ और हानि पर चर्चा हो रही है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई की दक्षता, व्यक्तिगत अनुभव और नवाचार जैसे कई लाभ स्पष्ट दिख रहे हैं। लेकिन इसके प्रभाव से नौकरी समाप्त होने के खतरे हैं, व्यक्तिगत गोपनीयता भंग होने जैसे नुकसान भी दिखते हैं।

एआई स्वचालन के माध्यम से उत्पादकता बढ़ा सकती है, लेकिन इससे रोजगार में कमी भी हो सकती है, जो एक जटिल और विवादास्पद मुद्दा है। अप्रत्याशित रूप से, एआई के दीर्घकालिक जोखिम, जैसे गलत संरेखण और धोखेबाज व्यवहार, आज भविष्य के लिए महत्वपूर्ण चिंताएं हैं।

एआई मशीनों में मानव बुद्धिमत्ता का अनुकरण करने की तकनीक है, जो सीखने, तर्क करने और समस्या-समाधान जैसे कार्य करने में सक्षम बनाती है। वर्ष 2025 में, वैश्विक एआई बाजार का मूल्य $244.22 बिलियन है और इसे 2031 तक 26.6% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है। यह इसके विभिन्न उद्योगों पर परिवर्तनकारी प्रभाव को दर्शाता है। डेटा विश्लेषण जैसे कार्यों के लिए 48% व्यवसायों द्वारा एआई को अपनाने के साथ, इसका प्रभाव व्यापक है। ए आई स्वास्थ्य सेवा, वित्त और विनिर्माण में नवाचार को बढ़ावा देती है, लेकिन नैतिक और आर्थिक चिंताएं भी उठाती है।

एआई के लाभ 

एआई कई क्षेत्रों में लाभ प्रदान करती है, जैसे दक्षता में सुधार (24/7 संचालन), निर्णय लेने में सहायता (बड़ी डेटा सेटों का विश्लेषण), और नवाचार (दवा खोज और आटोमेशन )।

रोजगार विस्थापन (स्वचालन से नौकरी हानि), उच्च लागत (छोटे व्यवसायों के लिए बाधा), और गोपनीयता जोखिम (डेटा उल्लंघन) ए आई के नुकसान नजर आते हैं।

एआई कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी प्रभाव डाल रही है, जैसे दक्षता और उत्पादकता, एआई स्वचालित कार्यों को संभाल सकती है, जैसे डेटा प्रविष्टि, और 24/7 काम कर सकती है, जिससे मानव त्रुटि कम होती है और उत्पादकता बढ़ती है। उदाहरण के लिए, विनिर्माण में एआई-चालित रोबोट उत्पादन को सुव्यवस्थित करते हैं, लागत में बचत करते हैं एआई एजेंट, एंथ्रोपिक से, स्वायत्त रूप से शेड्यूलिंग और कार्य संभालते हैं, तथा उत्पाद दक्षता को और बढ़ाते हैं। एआई तकनीक बड़ी डेटा सेटों का विश्लेषण कर पैटर्न और रुझान पहचान लेती है, जो वित्त, स्वास्थ्य और विपणन में निर्णय लेने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, यह भविष्य विश्लेषण के माध्यम से सटीक पूर्वानुमान प्रदान करती है, जिससे व्यवसायों को लाभ होता है। एआई ग्राहक व्यवहार का विश्लेषण कर व्यक्तिगत सिफारिशें और बेहतर ग्राहक सहायता प्रदान करती है, जैसे चैटबॉट्स और वर्चुअल सहायक। नेटफ्लिक्स एआईचालित सुझावों से वार्षिक $1 बिलियन कमाता है, जो ए आई की प्रभावशीलता दर्शाता है।

एआई चिकित्सा अनुसंधान, रोबोटिक्स, और ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में नई तकनीकों को बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, नवीडिया और फाइजर ने वर्ष 2025 में साइटोरिज़न में $80 मिलियन का निवेश किया है, जो नई दवा की खोज को गति प्रदान करता है।

ऑटोमेशन में ए आई मॉडल सायबर सुरक्षा बढ़ाते है, और हर व्यक्ति की ज्ञान तक पहुंच बनाते हैं।

एआई खतरनाक कार्यों, जैसे खनन, निर्माण, और अंतरिक्ष अन्वेषण में मानव जीवन के जोखिम को कम करती है, जिससे कार्यस्थल सुरक्षा में सुधार होता है।

यह जलवायु मॉडलिंग के माध्यम से वातावरण स्थिरता का भी समर्थन करती है, जैसे गूगल के ए आई गैजेट्स का उदाहरण समझा जा सकता है। एआई का प्रभाव कृषि और औद्योगिक क्रांतियों के समान हो सकता है, और उन्नत प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकांश कार्यों में इंसान से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। भविष्य के प्रोजेक्शनों के अनुसार, एआई वर्ष 2059 तक मानव से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, उच्च बैंडविड्थ, समानांतरता, और लागत-प्रभावशीलता बेहतर हो सकता है।

एआई के नुकसान

एआई के कई लाभों के बावजूद, इसके नुकसान भी कम नहीं दिखते।

स्वचालन से पारंपरिक नौकरियों में कमी आ सकती है, जिससे बेरोजगारी बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, डिजिटल सहायक HR कार्यों को बदल सकते हैं, जिससे कर्मचारियों को नई AI-सक्षम कार्यप्रवाह में शामिल करने की आवश्यकता होती है।

वर्ष 2025 में, 34% वित्त संस्थानों ने राजस्व वृद्धि की रिपोर्ट की है। एआई लागू करने में हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, और कुशल कर्मचारियों की उच्च लागत आती है, जो छोटे व्यवसायों के लिए एक बड़ी बाधा हो सकती है। रखरखाव और अपडेट की लागत भी महत्वपूर्ण हो सकती है; 40% छोटे फर्मों ने इसे बाधा के रूप में उद्धृत किया है।

 एआई बड़ी मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है, जिससे पारंपरिक डेटा गोपनीयता और सुरक्षा के मुद्दे उठते हैं। इसके अलावा, एल्गोरिदम में पक्षपात और निगरानी के नैतिक उपयोग की चिंताएं हैं।

 यूरोपीय संघ और यूएस के विनियमन अनुपालन को ए आई जटिल बना रहा है।

 एआई प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता से सिस्टम कोलैप्स की समस्याएं हो सकती हैं, विशेष रूप से यदि कभी ए आई सिस्टम विफल हो जाएं तो वैकल्पिक व्यवस्था आवश्यक होगी।

 एआई मानव भावनाओं को समझने या संवेदनशील नहीं है, जो ग्राहक संबंधों और संवेदनशील क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य देखभाल में चुनौतियां हैं।

एआई से गलत संरेखण, हैकिंग, और धोखे के व्यवहार जैसे जोखिम हैं, जो मानव नियंत्रण को कमजोर कर मशीन आश्रित बना सकते हैं। हाल के चिंताओं में एआई भ्रम शामिल हैं, जैसे जनरेटिव मॉडल गलत जानकारी उत्पन्न करते हैं, जो उपयोगकर्ताओं को गुमराह कर सकते हैं।

ए आई इंटरनेट अनुभवों का प्रोजेक्टेड विश्लेषण जनित है। अतः अनेक क्षेत्रों में भ्रम पैदा कर रहा है।

 प्रोजेक्शनों के अनुसार, एआई वर्ष 2061 तक मानव से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, जो व्यवहारिक नियंत्रण की समस्या पर उंगली उठाती है। निश्चित ही मानव जीवन को बेहतर, आराम देह, बनाने में ए आई का योगदान अप्रतिम अभूतपूर्व है, इससे घबराए बिना सकारात्मक दृष्टिकोण से इसे अपनाने से हम इसे निरंतर संशोधन करते हुए बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। कला साहित्य संस्कृति आदि क्षेत्रों में मानवीय मौलिकता की कीमत पर सुविधा युक्त अनुभव ए आई प्रदान कर रहा है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # 22 – कृतज्ञता की दृष्टि से: एक नई सुबह की शुरुआत – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ कृतज्ञता की दृष्टि से: एक नई सुबह की शुरुआत।) 

☆  दस्तावेज़ # 22 – कृतज्ञता की दृष्टि से: एक नई सुबह की शुरुआत ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

सर्जरी के अगले दिन की सुबह, जब मैं अपनी बालकनी में बैठा था, तो दुनिया मेरे सामने एक नई चमक के साथ सजीव हो उठी। मेरी पुनर्स्थापित दृष्टि केवल एक चिकित्सा चमत्कार नहीं थी—यह एक उपहार थी, एक नई अनुभूति। नीम का पेड़ मेरे सामने पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और सुंदर लग रहा था। उसकी हरी- बैंगनी पत्तियाँ कोमल हवा में नृत्य कर रही थीं, उगते हुए सूर्य की सुनहरी-लाल किरणों में स्नान कर रही थीं। उससे परे, विशाल नीला आकाश एक दिव्य छत्र की भाँति फैला हुआ था, शांत और अनंत। शाखाओं पर बैठे पक्षियों की चहचहाहट ने सुबह को और अधिक मधुर और जादुई बना दिया। यह आनंद इतना निर्मल और निष्कलंक था कि मुझे लगा मानो मैं फिर से पंद्रह साल का हो गया हूँ।

वे हाथ जो चमत्कार करते हैं:

जब मेरा हृदय इस सुंदरता को आत्मसात कर रहा था, तो वह डॉ महेश अग्रवाल के प्रति कृतज्ञता से भर गया, जिन्होंने यह रूपांतरण संभव किया। यह कहना कि वे एक कुशल नेत्र सर्जन हैं, उनके प्रति न्याय नहीं होगा। वे सच्चे अर्थों में एक चिकित्सक हैं—ऐसे व्यक्ति जो कुशलता को करुणा से, विशेषज्ञता को सहानुभूति से और अनुभव को मानवता से जोड़ते हैं।

डॉक्टर और रोगी का संबंध केवल एक लेन-देन नहीं होता। यह एक पवित्र बंधन होता है, जो विश्वास, देखभाल और समझ पर आधारित होता है। रोगी केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं, बल्कि मानसिक चिंता, भय और अनिश्चितता भी लेकर आता है। एक सच्चा चिकित्सक केवल बीमारी को नहीं, बल्कि उसके साथ आई चिंताओं को भी दूर करता है। वह एक आशा का संदेशवाहक बन सकता है, जो पीड़ा को राहत में, अंधकार को प्रकाश में और निराशा को विश्वास में बदल सकता है। डॉ अग्रवाल इस भावना को सहजता से जीते हैं। उनकी कुशलता उनकी विनम्रता से मेल खाती है, और उनका ज्ञान उनकी मानवता से।

आशा की किरण:

बढ़ती उम्र के साथ धीरे-धीरे सब कुछ फीका पड़ने लगता है—शक्ति, इंद्रियाँ और संवेदनाएँ। घुटने दर्द करने लगते हैं, सुनने की क्षमता घट जाती है, और दाँत कमजोर हो जाते हैं। लेकिन जब आँखें, जो दुनिया की खिड़कियाँ हैं, जवाब देने लगती हैं, तो ऐसा लगता है कि जीवन का सार ही धुंधला हो गया है। फिर भी, यह एक आशीर्वाद ही है कि बढ़ती उम्र में भी दृष्टि को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए हमें न केवल कुशल सर्जनों का, बल्कि उन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का भी आभार मानना चाहिए, जिन्होंने चिकित्सा विज्ञान को इस स्तर तक पहुँचाया है कि आज मोतियाबिंद की सर्जरी दर्दरहित, सरल और अत्यंत प्रभावी हो गई है।

लेकिन मेरी अपनी सर्जरी की राह इतनी आसान नहीं थी। एक अनपेक्षित स्वास्थ्य समस्या, जो वर्षों से अनदेखी बनी रही, ने मेरी सर्जरी को तीन साल तक टाल दिया। इस अनिश्चितता ने मुझे परेशान कर दिया, खासकर जब कुछ अनुभवी चिकित्सकों ने सलाह दी कि “मोतियाबिंद की सर्जरी कोई आपातकालीन प्रक्रिया नहीं है, इसे जब चाहें करा सकते हैं।” परंतु इंतजार करने का अर्थ था एक ऐसी दुनिया में रहना जो धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही थी।

इसी दौर में, डॉ अग्रवाल की बुद्धिमत्ता और उनके शब्दों ने मुझे संबल दिया। उन्होंने मुझसे कहा, “मैंने हमेशा आपको एक खुशहाल व्यक्ति के रूप में देखा है। आप दूसरों के जीवन में हँसी और खुशी लाते हैं। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि आप कोई अनावश्यक जोखिम उठाएँ। बस थोड़ा धैर्य रखें—हम जल्द ही समाधान निकाल लेंगे।” उनकी आश्वस्त करने वाली आवाज़, उनका विश्वास मेरे लिए संबल बन गया। और भगवान की कृपा से, समाधान मिल भी गया और मैं सर्जरी के लिए तैयार हो गया।

एक मास्टर का स्पर्श:

खुद सर्जरी अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था। डॉ अग्रवाल, जिन्होंने चेन्नई के प्रतिष्ठित शंकर नेत्रालय और मदुरै के अरविंद आई हॉस्पिटल से प्रशिक्षण प्राप्त किया था, ने इसे ऐसे कुशलता से किया कि मानो यह एक कला हो। माइक्रो इन्सीजन मोतियाबिंद सर्जरी—बिना दर्द, बिना पट्टी, बिना टांका, एक अद्भुत तकनीक—बिल्कुल सहजता से संपन्न हुई। ऑपरेशन थिएटर में वे पूर्णतः शांत, केंद्रित और रोगी के प्रति संवेदनशील थे। उनकी आश्वस्त करने वाली आवाज़ ने मुझे पूरे समय सहज बनाए रखा।

उनका अस्पताल, श्री गणेश नेत्रालय, केवल एक चिकित्सा केंद्र नहीं है—यह एक आशा और देखभाल का स्थान है। वहाँ की पूरी टीम—ऑप्टोमेट्रिस्ट, ऑपरेशन थिएटर तकनीशियन, नर्सिंग स्टाफ और सहायक कर्मचारी—सभी मुस्कुराहट के साथ सेवा करते हैं। यह भी संयोग नहीं कि डॉ अग्रवाल ने “शंकर” नेत्रालय में प्रशिक्षण लिया, अपने अस्पताल का नाम “गणेश” नेत्रालय रखा, और उनका स्वयं का नाम “महेश” है—शंकर, गणेश और महेश, हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे शक्तिशाली और मंगलकारी देवताओं में गिने जाते हैं। यह स्थान वास्तव में दिव्यता और शांति से भरा हुआ है।

एक नया संसार:

आज, जब मैं अपनी पुनर्स्थापित दृष्टि के साथ बाहर निकलता हूँ, तो दुनिया पहले से कहीं अधिक सुंदर लगती है। मेरी दृष्टि अब 6/6, N6 है—इतनी स्पष्ट जितनी पहले कभी नहीं थी। मुझे इस बात का पछतावा है कि मैंने सर्जरी में देरी क्यों की, लेकिन पछतावा केवल क्षणिक है। जो बचा है, वह है अनंत आनंद, जीवन को फिर से खोजने की उत्सुकता। अब किताबें पढ़ना और अधिक सुखद हो गया है, टेलीविजन देखना अधिक आनंददायक लगने लगा है, दूर और पास के दृश्य पहले से अधिक स्पष्ट और जीवंत दिखाई देते हैं। मुझे लगता है जैसे मैं मुक्त हूँ, एक चिड़िया की तरह, जो आसमान को चूमने के लिए तैयार है।

हार्दिक आभार:

डॉ महेश अग्रवाल ने न केवल मेरी दृष्टि को पुनः प्राप्त किया, बल्कि मेरी आत्मा को भी पुनर्जीवित किया। उन्होंने मेरे जीवन के एक कठिन अध्याय को एक नए उजाले में बदल दिया। इसके लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहूँगा। उनकी बुद्धिमत्ता, धैर्य और करुणा ने मुझे गहराई तक प्रभावित किया है। मैं उनके प्रति अपना हार्दिक धन्यवाद अर्पित करता हूँ। वे ऐसे ही और लोगों के जीवन में प्रकाश लाते रहें, उन्हें अंधकार से निकालकर नई रोशनी की ओर ले जाते रहें।

दुनिया फिर से सुंदर हो गई है—और इसका सारा श्रेय उन्हें जाता है।

♥♥♥♥

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 645 ⇒ अपनापन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 645 ⇒ अपनापन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्रेम में अगर ढाई अक्षर होते हैं, तो अपनापन में पाँच ! यानी ढाई से दो गुना। प्रेम को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन अपनेपन को परिभाषित करना इतना आसान नहीं।

फेसबुक पर अपने बारे में लिखने का मौका कम ही आता है ! परिचय को रिश्ते में बदलने में वक्त तो लगता है। केवल विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रिश्ते में अपनेपन का अहसास होना ही फेसबुक की खूबी है।।

कल 1 अप्रैल था ! कई लोग 1 अप्रैल को पैदा होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ ! जब छोटे थे, तो जन्मदिन सिर्फ माँ को याद रहता था। माँ हलवे से मुँह मीठा करती थी। पिताजी कुछ न कुछ लेकर ज़रूर घर लाते थे। कभी कोई खिलौना, कभी नये कपड़े, तो कभी सायकल।

समय के साथ जन्मदिन का स्वरूप बदलता चला गया। जन्मदिन, स्कूल, दफ़्तर और परिचितों की सीमाएं पार करता हुआ फेसबुक तक पहुँच गया। कल फेसबुक पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया।।

पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ ! अपरिचय से परिचय का रिश्ता जब इतना मजबूत होने लगता है, तो सब अपने लगने लगते हैं। रोज सुबह ” अभी अभी ” से अपनों की पहचान हुई। अपनों को नापने का कोई मापदंड नहीं होता। आश्चर्य हुआ, खुशी भी हुई। इतनों में अपनेपन का अहसास हुआ।

शब्द भाव प्रकट करते हैं। भाव दो शब्दों में भी प्रकट किए जा सकते हैं, और 200 में भी ! मेरे लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं तो मौन से भी अपनेपन की अभिव्यक्ति होती है। प्रकट रूप से व्यक्त हर शब्द का मैं सम्मान करता हूँ, उसके पीछे छुपे गहन अर्थ को समझना सबके बस की बात नहीं, अतः कभी कभी व्यक्ति के भाव को पूरा सम्मान भी नहीं मिल पाता।

जाने अनजाने हुई इस भूल के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।।

अभी अभी का यह सिलसिला आपके प्यार और आशीर्वाद का ही फल है। मेरे जीवन भर की उपलब्धि केवल यह अभी अभी ही है। जन्मदिन के अवसर पर आप सबने मुझे अपनेपन का अहसास कराया। कुछ का मैं धन्यवाद कर पाया, कुछ का नहीं। सभी के द्वारा व्यक्त भावों, उद्गार और जन्मदिन पर प्रेषित शुभकामनाओं हेतु मैं सबका पुनः आभार प्रकट करता हूँ।

आपके इस अपनेपन के कारण मुझे कभी अपनी उम्र का अहसास नहीं हुआ। ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर जरिया मुझे नज़र नहीं आया। मित्रों, हितैषियों और शुभचिन्तकों की इतनी बड़ी तादाद है कि मैं उनका व्यक्तितगत रूप से आभार नहीं प्रकट कर सकता।

अंत में जगजीतसिंह के शब्दों में केवल इतना ही कहूँगा –

तुमको देखा तो ये ख़याल आया

ज़िंदगी धूप, तुम घना साया।।

आभार, शुक्रिया, धन्यवाद।

बारम्बार …. 💐🙏

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #206 – बाल कथा – दौड़ता भूत – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विनोदपूर्ण बाल कथा दौड़ता भूत)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 206 ☆

☆ बाल कथा – दौड़ता भूत ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

ऊन का गोला यहीं रखा था. कहां गया? काफी ढूंढा. इधर-उधर खुला हुआ था. उसे खींच खींचकर समेटा गया. तब पता चला कि वह ड्रम के पीछे पड़ा था.

पिंकी ने जैसे ही गोले को हाथ लगाना चाहा वह उछल पड़ी. बहुत जोर से चिल्लाई, “भूत!  दौड़ता भूत.”

यह सुनते ही घर में हलचल हो गई. एक चूहा दौड़ता हुआ भागा. वह पिंकी के पैर पर चढ़ा. वह दोबारा चिल्लाई, “भूत !”

दादी पास ही खड़ी थी. उन्होंने कहा, “भूत नहीं चूहा है.”

“मगर वह देखिए. ऊन का गोला दौड़ रहा है.”

तब दादी बोली, “डरती क्यों हो?  मैं पकड़ती हूं उसे, ”  कहते हुए दादी लपकी.

ऊन का गोला तुरंत चल दिया. दादी झूकी थी. डर कर फिसल गई.

पिंकी ने दादी को उठाया. दादी कुछ संभली. तब तक राहुल आ गया था. वह दौड़ कर गोले के पास गया.

राहुल को पास आता देख कर गोला फिर उछला. राहुल डर गया, “लगता है गोले में मेंढक का भूत आ गया है.”

तब तक पापा अंदर आ चुके थे. उन्हों ने गोला पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया. गोला झट से पीछे खिसक गया.

“अरे यह तो खिसकता हुआ भूत है,”  कहते हुए पापा ने गोला पकड़ लिया.

अब उन्होंने काले धागे को पकड़कर बाहर खींचा, “यह देखो गोले में भूत!” कहते हुए पापा ने काला धागा बाहर खींच लिया.

सभी ने देखा कि पापा के हाथ में चूहे का बच्चा उल्टा लटका हुआ था.

“ओह ! यह भूत था,” सभी चहक उठे.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

21-04-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – [email protected] मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 245 ☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 245 ☆ 

☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

झूले का पुल झूल – झूल कर

मुश्किल को आसान बनाएँ।

जाते हम स्कूल हमेशा,

रस्सा से सरिता उतराएँ।।

 *

अपना लक्ष्य रहा है पढ़ना

हँसते – हँसते काम करेंगे।

ज्ञान और विज्ञान समझकर

जग में अपना नाम करेंगे।।

 *

खुशियाँ ही जीवन की कुंजी

सबसे ही हम प्रेम बढ़ाएँ।

 *

सोच – समझ कर काम करें हम

बाधाओं से हम लड़ते हैं।

हम हैं पूरे शाकाहारी,

योग हमेशा हम करते हैं।।

 *

विश्वासों को कभी न तोड़ें

मस्ती करें और हर्षाएँ।।

 *

पावन है सच्चा है मन भी

देते नहीं किसी को गच्चा।

ज्योति ज्ञान की जलती अंतस

मुस्काता हर बच्चा – बच्चा।।

 *

मूल्य समय का हम पहचानें

मिले सफलता वंदन गाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सखी कवितेस… ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

?  कवितेचा उत्सव  ?

☆ सखी कवितेस… ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

(मुक्त छंद)

कविते, तू आहेस तरी कोण ?

माझ्या भावना जाग्या करून

मुक्त करणारी सखी?

तू आहेस म्हणून तर मी जगतेय!

तुझा हात धरून हळुवार फिरतेय

*

सखी कविते, तूच माझी

जीवनदायिनी आहेस!

तूच माझे अस्तित्व टिकवलेस!

मी उन्मळून गेले तेव्हा,

तूच मला सावरलेस!

 

सखी कविते, तू आहेस अथांग!

लपतेस तू अंतरंगात !

 

भावनांचा कल्लोळ करताना,

घेतेस शब्दांचा आधार!

तुझे वर्णन मी काय करणार?

सखे, तू तर जीवनाधार!

 

मनाच्या अथांग सागरी तरंगतेस

 अन् माणिक मोत्यासारखी

येतेस!

माझ्या लेखणीत,

सजीव जीव बनून!

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares