(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी के अतिसुन्दर एवं भावप्रवण मुक्तक – एक प्रयोग।)
पार्टियों में इस वक्त भगदड़ का आलम है।सब तरफ बदहवासी है।बात यह हुई कि एक पार्टी ने जन-जन की प्यारी, दर्शकों की आँखों की उजियारी, परम लोकप्रिय ठुमका-क्वीन और जन-जन के प्यारे, दर्शकों के दुलारे झटका -किंग को फटाफट पार्टी में शामिल करके लगे-हाथ चुनाव का टिकट भी पकड़ा दिया है।चुनाव का टिकट एकदम ठुमका-क्वीन और झटका-किंग की पसंद का दिया गया है ताकि उन्हें जीतने में कोई दिक्कत न हो।तबसे उनके क्षेत्र के उनके भक्त टकटकी लगाए बैठे हैं कि कब भोटिंग हो और वे अपने दुलारे कलाकारों की सेवा में अपने भोट समर्पित करें।
विरोधी पार्टियों वाले बदहवास दौड़ रहे हैं। लगता है जैसे कोई बम फूट गया है। बुदबुदा रहे हैं—–‘दिस इज़ अनफ़ेयर। हिटिंग बिलो द बेल्ट।हाउ कैन दे डू इट?’
विरोधी पार्टियों के वे उम्मीदवार परेशान हैं जो ठुमका-क्वीन और झटका-किंग के चुनाव-क्षेत्र से खड़े होने वाले हैं।आँखों में आँसू भरकर कहते हैं, ‘भैया, हम जीत गये तो मूँछ ऊँची होना नहीं है और अगर हार गये तो नाक कट कर यहीं सड़क पर पड़ी दिखायी देगी।नाक पर रूमाल रखकर चलना पड़ेगा।अगली बार पता नहीं पार्टी टिकट दे या नहीं।कहाँ फँस गये!’
सभी दूसरी पार्टियों ने अपने सीनियर कार्यकर्ताओं को आदेश जारी कर दिया है कि तत्काल जितनी ठुमका-क्वीन और जितने झटका-किंग राज्य में मिल सकें उन्हें भरपूर प्रलोभन देकर झटपट पार्टी में ससम्मान शामिल करायें। उन्हें तुरंत उनकी पसंद का चुनाव टिकट नज़र किया जाएगा। इस काम के लिए हर पार्टी ने दो दो हेलिकॉप्टर मुकर्रर कर दिये हैं ताकि काम तत्काल हो और दूसरी पार्टी वाले क्वीनों और किंगों को झटक न लें।
ज़्यादा बदहवास उस पार्टी के उम्मीदवार हैं जिसने सबसे पहले क्वीन और किंग को अपने पाले में खींचा है। क्वीन और किंग के चुनाव -क्षेत्र से जिनको टिकट मिलने की उम्मीद थी उनकी नींद हराम है। वे बड़े नेताओं के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं——-‘सर, यह क्या किया? हमारे चुनाव-क्षेत्र का टिकट क्वीनों और किंगों को दे दिया तो हम कहाँ जाएंगे? सर, हम तीस साल से पार्टी की सेवा कर रहे हैं। तीन बार लगातार चुनाव जीते हैं।’
जवाब मिलता है, ‘जीते हो तो लगातार मलाई भी तो खा रहे हो। कौन सूखे सूखे सेवा कर रहे हो। पंद्रह साल में आपकी संपत्ति में जो बरक्कत हुई है उसकी जाँच करायें क्या?’
बेचारा उम्मीदवार बगलें झाँकने लगता है।
बड़े नेताजी समझाते हैं, ‘सवाल ‘विन्नेबिलिटी’ का है।हमें किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना है।क्वीन और किंग की पापुलैरिटी जानते हो?एक ठुमका मारते हैं तो सौ आदमी गिर जाता है। दो तीन लाख भोट तो आँख मूँद के आ जाएगा। आपकी सभा में तो सौ आदमी भी इकट्ठा करने के लिए पाँच सौ रुपया और भोजन का प्रलोभन देना पड़ता है। पार्टी की भलाई का सोचो। सत्ता हथियाना है या नहीं?’
उम्मीदवार आर्त स्वर में कहता है, ‘सर, यही हाल रहा तो एक दिन सदनों में कोई पालीटीशियन नहीं बैठेगा। सब तरफ किंग और क्वीन ही दिखायी पड़ेंगे। तब कैसा होगा, सर?’
नेताजी कहते हैं, ‘तो आपकी छाती क्यों फटती है? सदन में सुन्दर और स्मार्ट चेहरे दिखेंगे तो आपको बुरा लगेगा क्या? एक अंग्रेज लेखक हुए हैं—-आस्कर वाइल्ड। उन्होंने एक जगह लिखा कि सुन्दर चेहरे वालों को ही दुनिया पर राज करना चाहिए। सदनों में सुन्दर चेहरे रहेंगे तो दर्शक सदन की कार्यवाही देखने में ज़्यादा दिलचस्पी लेंगे। सदन में सदस्यों की उपस्थिति भी सुधरेगी। हम जो कर रहे हैं समझ बूझ के कर रहे हैं। ज़्यादा टाँग अड़ाने की कोशिश न करें। हमको इनडिसिप्लिन की बातें पसंद नहीं हैं।’
भावार्थ : हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा॥39॥
This which has been taught to thee, is wisdom concerning Sankhya. Now listen to wisdom concerning Yoga, endowed with which, O Arjuna, thou shalt cast off the bonds of action!
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
Positive Education: Teaching well-being to Young People
Positive education pairs traditional schooling with positive psychology interventions to improve well-being.
Positive education is based on the science of well-being and happiness.
Positive Education is an approach to education that blends academic learning with character and well-being. It prepares students with life skills such as: grit, optimism, resilience, growth mindset, engagement, and mindfulness amongst others.
Positive education views school as a place where students not only cultivate their intellectual minds, but also develop a broad set of character strengths, virtues, and competencies, which together support their well-being.
Positive education is a whole-school approach to student and staff well-being: it brings together the science of positive psychology with best-practice teaching, encouraging and supporting individuals and communities to flourish.
Positive Education focuses on specific skills that assist students to strengthen their relationships, build positive emotions, enhance personal resilience, promote mindfulness and encourage a healthy lifestyle.
Positive Education brings together the science of Positive Psychology with best practice teaching to encourage and support individuals, schools and communities to flourish. We refer to flourishing as a combination of ‘feeling good and doing good’.
In consultation with world experts in positive psychology and based on Seligman’s PERMA approach, the Geelong Grammar School developed its ‘Model for Positive Education’ to complement traditional learning – an applied framework comprising six domains: Positive Relationships, Positive Emotions, Positive Health, Positive Engagement, Positive Accomplishment, and Positive Purpose. This model has been augmented with four fundamental active processes that underpin successful and sustained implementation of positive education: Learn It, Live It, Teach It, and Embed It.
Widespread support is necessary for the success of the positive education movement.
(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह लघुकथा भारत के लोकतन्त्र के महापर्व “चुनाव” की पृष्ठभूमि पर रचित कटु सत्य को उजागर करती है। )
“काय कलुआ के बापू, इत्ती देर किते लगाये दई । वा नेता लोगन की रैली तो तिनै बजे बिला गई हती ना । दो सौ रुपैया तो मिलइ गए हुइहें?”
रमुआ कुछ देर उदास बैठा रहा, फिर उसने बीवी से कहा – “का बताएं इहां से तो वो लोग लारी में भरकर लेई गए थे और कही भी हती थी कि रैली खतम होत ही दो सौ रुपइया और खावे को डिब्बा सबई को दे देहें, मगर उन औरों ने हम सबई को ठग लऔ। मंत्री जी की रैली खतम होवे के बाद ठेकेदार ने खुदई सब रुपया धर लओ और हम सबई को धता बता दओ । हम ओरें शहर से गांव तक निगत निगत आ रए हैं । लौटत में बा लारी में भी हम औरों को नई बैठाओ । बहुतै थक गए हैं । आज की मजूरी भी गई और कछु हाथे न लगो,अब तो तुम बस एकइ लोटा भर पानी पिलाए देओ – ओई से पेट भर लेत है ।”
रमुआ की बीवी ऐसे ठगों को बेसाख्ता गाली बकती हुई अंदर पानी लेने चली गई ।
(सुश्री बलजीत कौर ‘अमहर्ष’ जी का हार्दिक e-abhivyakti में स्वागत है। “सुनहरे पल…….” एक अत्यंत मार्मिक एवं भावुक कविता है। इस भावप्रवण एवं सकारात्मक संदेश देने वाली कविता की रचना करने के लिए सुश्री बलजीत कौर जी की कलम को नमन। आपकी रचनाओं का सदा स्वागत है। )
(श्री सुजित कदम जी का यह आलेख वास्तव में हमें पुस्तकों की दुनिया से रूबरू कराता है। यह एक शाश्वत सत्य है कि आज पुस्तकों के पाठक कमतर होते जा रहे हैं और यहाँ तक कि पुस्तकालयों का अस्तित्व भी खतरे में है। यह आलेख समाज में पुस्तकों के महत्व को अवगत कराता है।)
आयुष्यात आपण किती कमवलं ह्या पेक्षा किती वाचलं हा विचार जोपर्यंत आपण करत नाही..तो पर्यंत आपण फक्त श्वास घेण्यापूरता जन्माला आलोय असं समजावं..,कारण पुस्तके वाचताना आपल्याला पुस्तकातली एखादी व्यक्तीरेखा आपलीशी वाटू लागते..
ती व्यक्तीरेखा आपण जगत जातो.. किबंहूना जगत असतो..,अशा एक ना अनेक पुस्तकातून आपणच आपल्याला नव्याने घडवत जातो.
ही जडण घडण होताना समाजाचा एक भाग बनून रहाता आल पाहिजे. जहालाशी जहाल आणि मवाळाशी मवाळ संवाद साधता आला की माणस आपोआप जवळ येतात. पुस्तकांसारखे ती ही बरंच काही शिकवून जातात.
आवडत्या पुस्तकाची तर आपण कित्येक पारायण करतो .. का? तर त्यात कुठेतरी, आपल्याला मनासारखं जग, जगण्याची जिद्द, समाधान, वास्तवतेचं भान, आणि योग्य दिशा असं बरचं काही मिळत जातं ..
आपण माणसं… एक वेगळ्याच विश्वात वावरत असतो..जोपर्यंत आपल्याला आपला फायदा दिसत नाही तोपर्यंत आपण त्याकडे लक्ष देत नाही…,!
वाचनाचे फायदे म्हणाल तर…,ते माणसांच्या स्वभावा प्रमाणेच बदलत जाणारे आहेत.., काहीना पुस्तक जिवापाड आवडतात तर काहींना पुस्तकं वाचताना झोप येते..,!
आयुष्यास कंटाळून आत्महत्ये सारखा विचार करणाऱ्यानी…एकदा तरी पुस्तकांना आपलंस करून पहावं…! आजकालच्या मुलांना पुस्तकं वाचता का..?
विचारल्यावर.., आम्ही फक्त आभ्यासाची पुस्तकं वाचतो हेच उत्तर मिळत..खरतरं…,शाळेच्या पुस्तका बाहेर ही पुस्तकांच भलमोठं जग आहे हे त्यांना कळतच नाही..!
शाळेची पुस्तकं आपल्याला चौकटीतलं जग दाखवतात तर साहित्यिक पुस्तकं आपल्याला चौकटी बाहेरच जग दाखवतात….!
एकदा वाचनाची आवड निर्माण झाली की आपोआप वाचनाची सवय लागते. वाचनाची सवय व्यासंगात रूपांतरित होते. सुखाच्या दुःखाच्या काळात ही पुस्तके समाजातील आपले स्थान बळकट करतात.
आपण जे वाचतो ते विचारात येतं. विचारातून आचारात येतं, आणि आचारातून कृतीत येतं. वाचनाचे संस्कार व्यक्तीला अनुभवाचे विचार म॔थन करायला शिकवतात. ज्ञान देण्याच कार्य पुस्तके करतात. ते स्वीकारण्याचे कार्य आपले आहे. मत परिवर्तन आणि समाज प्रबोधन करण्याचे प्रचंड सामर्थ्य वाचनात आहे.
म्हणूनच जाणकारांनी म्हणून ठेवलय, ”ज्याने वाचल तो वाचला आणि ज्याने साचवलं तो सडला!”
आणि म्हणूनच …, आयुष्यात आपण किती कमवलं ह्या पेक्षा, किती वाचलं ? हा विचार जोपर्यंत आपण करत नाही..तो पर्यंत आपण फक्त श्वास घेण्यापुरते आणि आपल्या प्रथमिक गरजा मागविण्यात पुरते जन्माला आलोय असं समजावं..,!
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
(क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण)
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।38।।
सुख दुख को सम मान कर लाभ हानि सम जान
धर्म कार्य है युद्ध, उठ , हार औ” जीत समान।।38।।
भावार्थ : जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा।।38।।
Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat the same, engage thou in battle for the sake of battle; thus thou shalt not incur sin. ।।38।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)