हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६३ ☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)

☆ शेष कुशल # ६३ ☆

☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? – शांतिलाल जैन 

आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ.  कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.

मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”

“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”

दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं?  पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या?  बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”

मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”

“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते.  झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”

उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ? ?

आदमी

बोलता रहा ताउम्र

दुनिया ने

अबोला कर लिया,

हमेशा के लिए

चुप हो गया आदमी

दुनिया आदमी पर

बतिया रही है!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:44 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१७ ☆ बाल कथा – समझ  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१७ ☆

?  बाल कथा – समझ ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(सच्ची घटना , राम मंदिर के वर्तमान घटना क्रम के परिदृश्य पर )

सूरज की सुनहरी किरणें मंदिर के शिखर को चूम रही थीं। वातावरण में शंख की ध्वनि और धूप-बत्ती की मंद सुगंध घुली हुई थी।

मैं  अपने सात वर्षीय बेटे अमित के साथ मंदिर गया था, जो अपनी मासूम आंखों से दुनिया  समझने की कोशिश कर रहा था । मेरे हाथ का स्पर्श थामे हुए , मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैने देखा कि वह पीछे मुड़कर कोने में भीख के लिए बैठी बूढ़ी अम्मा को देख रहा था।

दर्शन कर मैने उसके छोटे से हाथों में सौ का नोट देकर  उसे दान पेटी में डालने के लिए कहा। वह धीमे कदमों से आगे  दान पेटी के सामने झुका भी ।

फिर हम बाहर आ गए ।

बाहर निकल वह उसी बूढ़ी अम्मा के पास जा रुका । उसने अपनी जेब टटोली और वह सौ का नोट निकाल कर उस बूढ़ी अम्मा की हथेली पर रख दिया।

अम्मा की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।

मैं स्तब्ध खड़ा यह सब देख रहा था। और उसकी बाल बुद्धि पर मन ही मन प्रसन्न भी था ।

(अब, जब भी समाचारों में बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों के चंदे में हेराफेरी, भ्रष्टाचार या उन पेटियों के पैसों चोरी होने अथवा गलत हाथों में जाने की खबरें सुनता हूं, तो मुझे उस दिन सीढ़ियों पर बैठी उस बूढ़ी अम्मा के झुर्रीदार  चेहरे और अमित की समझ की बरबस याद आ जाती है। दान किसी बड़े ताले वाली पेटी के भीतर कैद नहीं, बल्कि उस साक्षात ईश्वर के हाथों में सौंपना अधिक उचित है जो दीन बंधु है।)

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२५ – सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२५ ☆

☆ सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

नैन उनके झुके तो नमन हो गया।

भावना का सहज, निर्गमन हो गया।।

*

राह में कल मिले, मुस्कराते हुए।

सामने आ गए, दिल चमन हो गया।।

*

प्रेम की राह कंटक भरी है प्रिये।

वासना में फँसे, तो पतन हो गया।।

*

द्वार में बैठकर, थी प्रतीक्षा हमें।

आँख पथरा गईं सच कथन हो गया।।

*

चाँदनी रात मिलने का वादा प्रिये।

तुम न आए मन में चुभन हो गया।।

*

देश की बात पर हम सभी एक हों।

सिर निछावर किया वह रतन हो गया।।

*

शूर होता वही जो मिटे देश पर।

वीर बलिदानियों का वतन हो गया।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

16/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२७ ⇒ एक दिन पिता का ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक दिन पिता का।)

?अभी अभी # १०२७ ⇒ आलेख – एक दिन पिता का ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 father’s day

माता पिता का बराबरी का सौदा होता है,अगर मदर्स डे है तो फादर्स डे भी । महिला दिवस की तर्ज पर पुरुष दिवस कब मनाया जाता है,शायद इन तथाकथित “days” यानी “दिनों” का कोई कैलेंडर उपलब्ध हो, क्योंकि कभी कभी तो एक ही दिन में दो दो days टपक जाते है ।

खैर हमें इससे क्या,जिस तरह सुबह होती है,शाम होती है, इसी तरह कोई ना कोई day आता है,और चला जाता है । ऐसे ही पितृ दिवस यानी फादर्स डे कब आया और कब चला गया,हमें पता ही नहीं चला । हम भी कभी पिता थे,अब तो लोगों ने हमें अंकल से नाना जी और दादाजी बना दिया है ।।

हमने पिता को तो देखा है,लेकिन कभी परम पिता को नहीं देखा । पिता का और हमारा साथ 33 वर्ष का ही रहा । उसके बाद एक दिन हमारे पिता,परम पिता में विलीन हो गए, यानी हमारे सर से पिता का साया छिन गया और पिछले 42 वर्ष से हमें पिता का प्यार नहीं मिला । तब से हमने परम पिता को ही अपना पिता मान लिया है।

ईश्वर एक है,आप उसे खुदा कहें अथवा परम पिता परमेश्वर । लेकिन जिन अभागों ने अपने बाप को बाप नहीं माना,वे किसी पत्थर की मूरत को भगवान कैसे मान लेंगे । वास्तव में सबका मालिक एक का मतलब भी यही है,सबका बाप एक ।।

जिस तरह ईश्वर एक है,उसी तरह माता -पिता एक इकाई है,एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं , और शायद इसीलिए उन्हें सम्मिलित रूप से पालक का दर्जा दिया गया है और साफ साफ शब्दों में कह दिया गया है ,”त्वमेव माता च पिता त्वमेव” । अंग्रेजी में एक शब्द है spouse, जिसका प्रयोग पति पत्नी दोनों के लिए किया जाता है,यानी दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं ।

पिताजी के गुजर जाने के बाद,जब तक माता का साया सर पर रहा,पिताजी का अभाव इतना नहीं खला,लेकिन मां के गुजर जाने के बाद महसूस हुआ,एक अनाथ किसे कहते हैं,और तब केवल नाथों के नाथ जगन्नाथ की शरण में जाना ही पड़ा । क्योंकि वही तो पूरे जगत का नाथ है ।।

जिंदगी तो ठहरती नहीं,लेकिन वक्त ठहर सा जाता है । अतीत में झांकने से अब क्या हासिल होना है, हां एक पछतावा जरूर होता है,क्योंकि हमने भी माता पिता की कदर जानी ना,हो कदर जानी ना ।

शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में पितृ पक्ष की व्यवस्था भी है । उस पखवाड़े में श्रद्धा के प्रतीक स्वरूप ही श्राद्ध कर्म किया जाता है । श्रद्धा का अर्पण ही वास्तविक तर्पण है । पछतावे की भरपाई है । भूल चूक लेनी देनी का सत्यापन है । उनके प्रति नतमस्तक होना ,उस परम पिता परमेश्वर के समक्ष नतमस्तक होने के बराबर है । आज की पीढ़ी के लिए ही शायद यह गीत लिखा गया है ;

ले लो दुआएं

मां बाप की ।

सर से उतरेगी

गठड़ी पाप की ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०४ – व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न!)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०४ – व्यंग्य  – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाड़ी छूटने में अभी पंद्रह मिनट बाकी थे और मैं प्लेटफार्म पर ऐसे टहल रहा था जैसे बकरे को ईद से पहले आखिरी बार टहलाया जाता है। जेब से टिकट निकालकर मैंने तीसरी बार देखा। नंबर वही, बोगी वही, और वह कुख्यात कोना भी वही था जहाँ पहुँचकर आदमी को अपने पूर्वजों के कर्मों पर शक होने लगता है। रेल विभाग ने शायद ब्रह्मांड के सारे बचे-खुचे पापों की ईएमआई वसूलने के लिए उस जगह सीट नं. 71 साइड लोअर का आविष्कार किया होगा।

मैं जब वहाँ पहुँचा तो लगा किसी ने इंसानों के लिए नहीं, कबाड़ की बोरियों के लिए सीट बनाई है। आधी जगह पर एक राजस्थानी भाई साहब पहले से पालथी मारे जमे थे। मूँछें ऐसी कड़क जैसे दो नेवले आपस में कुश्ती लड़ने की पोजीशन में हों। मुझे देखते ही कबीलाई अंदाज़ में बोले, “आओ सा, बैठ जाओ। यहाँ आदमी नहीं बैठता, आदमी की केवल उम्मीद बैठती है।” मैं अभी इस भारी-भरकम फिलॉसफी पर विचार ही कर रहा था कि एक तमिल युवक भी वहाँ आ टपका। उसने पहले सीट देखी, फिर हमें देखा, फिर सीधे ऊपर वाले को देखा और रोनी सूरत बनाकर बोला, “अय्यो, हम किधर बैठेगा।”

तभी पीछे का जादुई दरवाजा खुला।

एक झोंका आया।

फिर दूसरा आया।

फिर तीसरा आया।

तीनों झोंकों ने मिलकर मेरे जीवन की सारी पुरानी यादों का दूरदर्शन पर लाइव री-टेलीकास्ट शुरू कर दिया। मुझे पहली कक्षा की वो मारकुटानी मास्टरनी याद आ गई। गाँव का वो कीचड़ भरा पोखरा याद आ गया। बचपन में नाली में खोया हुआ लट्टू याद आ गया। इतनी तीव्र और भयानक अनुभूति तो ऋषियों को घोर तपस्या में भी न हुई होगी। राजस्थानी भाई ने तुरंत जेब से रूमाल निकाला, उसे डिटॉल की तरह नाक पर बाँधा और बोले, “म्हारे यहाँ ऊँट के तबेले में भी इतनी आत्मीयता और खुशबू नहीं मिलती सा!” तमिल युवक तड़पकर बोला, “हमारे गाँव में मछली बाजार है भाई, पर वहाँ भी हवा अपनी मर्यादा में रहती है।”

गाड़ी चली और हमारी रही-सही इज्जत का कचरा होना भी शुरू हुआ। पहला यात्री आया, उसने हमारी बदहाल हालत को देखा, एक कुटिल मुस्कान दी और आगे बढ़ गया। दूसरा आया, उसने हमें देखकर ऐसे सिर हिलाया जैसे किसी भयानक एक्सीडेंट स्पॉट का मुआयना कर रहा हो। तीसरा आया, उसने जेब से फॉग का डब्बा निकाला, फिर हमारी शक्लें देखकर न जाने क्या सोचा और चुपचाप जेब में रख लिया। शायद उसे लगा कि टीवी के विज्ञापन तो सब फेकमफाक होते हैं, यहाँ तो साक्षात यमराज की हवा चल रही है।

कुछ ही देर में हमारी वह सीट सार्वजनिक चौपाल और लावारिस बस स्टैंड में बदल गई। कोई हमारे कंधे पर कोहनी रखकर खड़ा था, कोई अपना भारी-भरकम पेट हमारे सिर पर टिकाकर रील सरका रहा था। कोई हमारे घुटनों को रेल मंत्रालय की लावारिस संपत्ति समझकर उन पर पैर रखकर सुस्ता रहा था।

तभी एक बच्चा अपनी मम्मी से बोला, “मम्मी, ये तीनों अंकल सो क्यों नहीं रहे?”

मम्मी ने बड़े गंभीर लहजे में कहा, “बेटा, ये लोग सो नहीं रहे, ये जीवन का कड़वा अनुभव ले रहे हैं।”

मैंने जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि साला दुख भी कभी-कभी टूरिस्ट स्पॉट बन जाता है, जहाँ लोग आते हैं, आपको तड़पता देखते हैं और अपनी किस्मत को दुआ देकर चले जाते हैं।

रात जैसे-जैसे गहरी हुई, हमारा वो कोना किसी इंटरनेशनल बॉर्डर की चौकी बन गया। जो भी उधर टॉयलेट की तरफ जाता, चेहरे पर वीर रस के भाव लेकर जाता। और जो उधर से लौटता, वो किसी हारी हुई जंग को जीतकर लौटे विजयी सेनापति की मुद्रा में मुस्कुराता। हर बार दरवाजा खुलता और हवा का एक नया बदबूदार अध्याय शुरू हो जाता। हमारी आँखें जल रही थीं, घुटने कराह रहे थे और कमर तो बाकायदा पंचायत बुलाने की जिद पर अड़ी थी।

रात के दस बजते-बजते हमारी सीट रेलवे की बोगी कम और देश का जीवंत लोकतंत्र ज़्यादा लगने लगी। जिस ऐरे-गैरे का मन होता, वह हमारे पास आता, अपना हक जताता और चला जाता। एक अजनबी चाचा जी आए और बिना किसी हाय-हेलो के हमारी सीट पर अपना बदबूदार गमछा फैला गए। पाँच मिनट बाद लौटे और रौब से बोले, “जरा ध्यान रखना भाई साहब, यह मेरा तकिया है।” मैं उन्हें फटी आँखों से देखता रह गया। आदमी पहली बार मिला था और जाते-जाते मुझे अपनी चल-संपत्ति का परमानेंट चौकीदार नियुक्त कर गया था।

उधर एक और नमूना युवक आया। उसने अपना मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। प्लग बहुत दूर था, मोबाइल हमारे पास था। नतीजा यह हुआ कि चार्जर की वो पतली तार हम तीनों की गर्दनों के ठीक ऊपर से कपड़े सुखाने वाली रस्सी की तरह गुजर रही थी। हम तीनों गर्दन झुकाए ऐसे बैठे थे जैसे किसी मकड़ी ने ताज़ा-ताज़ा जाला बुना हो और हम उसमें फँसी हुई लाचार मक्खियाँ हों, जो हिलेंगी तो सीधे हलाल हो जाएँगी।

राजस्थानी भाई खिसियाकर बोले, “म्हारे खेत में जो बिजूका खड़ा रहता है, वो भी इससे ज्यादा सम्मान पाता है सा।”

तमिल युवक बिलबिलाकर बोला, “यह सीट नहीं है, यह हमारे पिछले सात जन्मों के पापों का कलेक्टिव रिजल्ट है।”

तभी एक और बुजुर्ग अवतार लिए। उन्होंने हमारे पैरों के ठीक बीच में पुराना अखबार बिछाया और सुल्तान की तरह उस पर बैठ गए। फिर जेब से मुरमुरे का लिफाफा निकाला और निशाना साधकर खाने लगे। हर तीसरा मुरमुरा मेरी शर्ट की जेब में गिर रहा था, हर चौथा तमिल भाई की गोदी में और पाँचवाँ बमुश्किल उनके खुद के मुँह में जा रहा था। पूरा डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बिगड़ा हुआ था।

आधी रात तक हमारी दशा ऐसी हो गई कि शरीर का कोई भी अंग अपने मूल मालिक के कंट्रोल में नहीं था। मेरा बायाँ घुटना राजस्थानी भाई के क्षेत्राधिकार में चला गया था। उनकी कोहनी तमिल युवक की सीमाओं में घुसपैठ कर चुकी थी। तमिल युवक का भारी बैग मेरे पेट पर वीटो पावर लगाकर बैठ गया था। हम तीनों मिलकर एक मजबूर संयुक्त परिवार बन चुके थे।

इसी बीच फिर वही खूनी दरवाजा खुला और बदबू की एक नई सुनामी लहर आई।

राजस्थानी भाई ने तुरंत रूमाल को और कस लिया।

तमिल युवक ने तंग आकर अपनी आँखें ही बंद कर लीं।

और मैंने हाथ-पैर ढीले छोड़कर जीवन के असली अर्थ पर गहराई से विचार करना शुरू कर दिया।

तभी एक सज्जन एक्सप्रेस की रफ्तार से तेज कदमों से आए, ट्रेन का थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा और वो महाशय सीधे मेरी गोद में आ गिरे। उठकर कपड़े झाड़ते हुए बोले, “माफ करना भाई, अचानक ब्रेक लग गया।”

मैंने चिढ़कर कहा, “भाई साहब, गाड़ी तो साठ की स्पीड पर सीधी चल रही है!”

वह बड़े ढीठ अंदाज़ में बोले, “अच्छा? तो फिर शायद मेरी किस्मत फिसल गई होगी।”

उस रात हमारी किस्मत इतनी बार फिसली कि गिनती भूल गई। किसी की कटी हुई चप्पल हमारे नीचे फँसी, किसी की पानी की आधी खुली बोतल हमारे पैरों में लुढ़ककर पानी-पानी कर गई। किसी का लावारिस टूथब्रश न जाने कैसे तमिल युवक के खुले बैग में सीधे लैंड कर गया।

हमारे ठीक सामने वाली बर्थों पर दो बंदे हमें बार-बार घूर रहे थे। फिर चादर ताने खर्राटे लेने लगे। उसकी नींद जितनी गहरी और कुंभकरणी थी, हमारी जिज्ञासा उतनी ही सातवें आसमान पर पहुँच रही थी। वे सोने के दौरान भी बार-बार मुस्कुरा क्यों रहे थे? उनके चेहरे पर ऐसा अजीब आत्मविश्वास क्यों था जैसे किसी डाकू ने पूरी बैंक की तिजोरी अकेले लूट ली हो और पुलिस उसका कुछ न बिगाड़ पाई हो?

सुबह हुई। जब टीटीई आया और उसने हमारी टिकटें चेक करके जो असली सच्चाई बताई,  कसम से हमारी हालत उस गरीब किसान जैसी हो गई जिसे अचानक पता चले कि जिस ज़मीन को वो बंजर और बकवास समझकर रात भर रो रहा था, उसके नीचे तो सोने की पूरी खदान दबी पड़ी थी!

वो सामने वाले चालाक युवक रात भर जिस पूरी की पूरी कंफर्टेबल बर्थ पर राजा और शहंशाह बनकर सोए थे, वो वास्तव में हमारी थी।

जी हाँ, हम तीनों सीट कंफर्म हो चुकी थी!

यह सुनते ही पूरी बोगी में पहले दो सेकंड का सन्नाटा छाया, और फिर ऐसा भयानक ठहाका गूँजा कि ऊपर वाली बर्थ पर सो रहा पैसेंजर भी भूकंप के डर से हड़बड़ाकर उठ बैठा।

राजस्थानी भाई ने तुरंत उन युवकों के सामने हाथ जोड़ लिए और बोले, “महाराज, आप लोगों की यह गहरी नींद अमर रहे।”

तमिल भाई तालियाँ बजाते हुए बोले, “भाई, तुम लोगों  ने जो सुख भोगा है, उस पर तो इतिहास में अलग से चैप्टर लिखा जाएगा।”

वे युवक पहले तो शर्म से लाल-पीले हुए, फिर खुद ही बेशर्मों की तरह हँसने लगे। फिर उसे देखकर पूरी बोगी पागलों की तरह हँसने लगी। मैं शर्ट पर पड़े मुरमुरे झाड़ते हुए खिड़की के बाहर देख रहा था और सोच रहा था कि इस देश की रेल यात्रा में सबसे महँगी चीज़ टिकट का किराया नहीं होती बॉस, सबसे महँगी चीज़ होती है सही ‘जानकारी’। जिस रात वो जानकारी हमारे पास नहीं थी, उसी एक रात में हमने बिना एक भी रुपया फीस दिए भारतीय रेल से ‘पीएचडी’ का पूरा कोर्स टॉप रैंक के साथ पूरा कर लिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ – पर्यावरण संरक्षण ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८२ – देश-परदेश – ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

करीब आठ दशक पूर्व,  अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।

“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।

विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।

अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।

सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।

हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।

हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ स्त्री गणित आयुष्याचे… + संपादकीय निवेदन – डॉ. शैलजा करोडे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. शैलजा करोडे

💐 अ भि नं द न 💐

कोकण मराठी साहित्य परिषदेचे संस्थापक अध्यक्ष श्री. मधु मंगेश कर्णिक यांचे हस्ते, आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका डॉ शैलजा करोडे यांच्या ‘ मेंदीच्या पानावर ‘ या कवितासंग्रहाचे प्रकाशन नुकतेच पनवेल येथे झाले. या प्रसंगी अनेक ज्येष्ठ साहित्यिक उपस्थित होते. श्रीमती करोडे यांच्या साहित्यिक प्रवासातील हा एक महत्त्वाचा टप्पा आहे. ई अभिव्यक्ती परिवारातर्फे त्यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन. यापुढेही त्यांची साहित्यिक वाटचाल अशीच चालू राहो यासाठी शुभेच्छा!🌹

या काव्य संग्रहातील एक कविता “स्त्री गणित आयुष्याचे” आज प्रकाशित करत आहोत.

 संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ स्त्री गणित आयुष्याचे ☆ डॉ. शैलजा करोडे

स्त्रीची भूमिका अनेक

माता भगिनी वहिनी

सून आई अर्धांगिनी

यात घडते गृहिणी

 *

कुटुंबाला सावरते

स्वइच्छेला तिलांजली

मोती नात्यांचे ओवते

उपेक्षांना श्रद्धांजली 

 *

चालविते ती प्रपंच

मांडी जीवन गणित

बेरजेला देई थारा

वजाबाकी सदोदित

 *

चिन्ह फुलीचे गुणते

गुणाकार आनंदाचा

तिच्या पदर छायेत

ठेवा मिळतो सौख्याचा

 *

पाया असते घराचा

बंध नात्यांचे जपते

क्षेत्र तिचे वर्तुळाचे

केंद्रस्थानी वावरते.

 *

अर्थ संकल्प घराचा

मांडितसे शिताफीने 

तूट भरून काढते

आकारते शिलकीने

© डॉ. शैलजा करोडे

नेरुळ नवी मुंबई मो. 9764808391

ईमेल – karodeshailaja@gmail.com 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३२ ☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३२ ?

☆ काळ सुखाचा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

बालपणीचा काळ सुखाचा

आजोबांना असं वाटतंय

सेड्यूल माझं पाहिल्यावर

कुठं आहे मला पटतंय

झोप होतच नाही आमची

सात वाजता असते शाळा

शाळेमधल्या बाकावरती

अचानकच लागतो डोळा

 *

छडी वाजता बाकड्यावर

झोपच उडते खाडकण

कुठे आहोत आपण स्वतः

कळतच नाही काही क्षण

 *

जेवण होता थोड्या वेळात

क्लासकडे वळतात पाय

नाहीच चालत कंटाळून

तुम्हीच सांगा ना करू काय

 *

खरंच सांगा आता आजोबा

कुणाचं जीवन सुखी आहे

रिक्षामध्ये कोबलंय मला

ईश्वर तुमच्या मुखी आहे

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares