हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६२ – बुन्देली कविता – ”कौन बख्त के मारे नइयाँ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – कौन बख्त के मारे नइयाँ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६२ ☆

☆  बुन्देली कविता – कौन बख्त के मारे नइयाँ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

कौन बख्त के मारे नइयाँ

कइ नें दाग उघारे नइयाँ

कौन गवाही दैबे जैहै

प्राण कौन खें प्यारे नइयाँ

 *

उन दलितों के रंग न देखौ

कौनऊँ मन के कारे नइयाँ

 *

बाड़, बिजूके काम न दैहें

जे साँचे रखबारे नइयाँ

 *

कथरी में लुक के घी खा रय

बे कौनऊँ बेचारे नइयाँ

 *

महनत की कन्दील बुझै नें

छँटे अबै इंधयारे नइयाँ

 *

धन की बाजी जीत गए तुम

‘भगवत’ मन सें हारे नइयाँ

 

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ स्वर्ण किरण के छूते ही…… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ स्वर्ण किरण के छूते ही… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाइबुन)

हरसिंगार कहते ही सिन्दूरी वृन्त पर दूधिया कोमलांगी पाँखुरियाँ ही नहीं, भीनी भीनी महक का चित्र पल में बना लेती हैं आँखें।नेत्रों से झरने लगती है ओस।

समूची कायनात किरणों की प्रतीक्षा में घुप्प अंधेरों से जंग लड़ती है।प्रतीक्षा ही तो उत्स है उर्जा का।

पहली पहली स्वर्णकिरण,पहले पहले प्रेम पत्र सी जिसे मन जी भरकर देखना चाहे, छूना चाहे, एक अटूट भरोसे की आहट।जैसे ये किरण नहीं तरी है जो सारे दिन का दरिया पार कराएगी।

जिस उजाले की पहली रश्मिरेखा से जिन्दगी का फलसफा लिखा जाता है,आशा की परियां गुनगुन करने लगती हैं वही हरसिंगार से जिन्दगी छीन लेती है।जिन्दगी सिर्फ एक रात की।उफ़।जो हवा दीप जलाती है वही बुझा भी देती है।

एक रात का अतिथि हरसिंगार। भारतीय दर्शन सारा का सारा एक फूल से निवेदित होता है।जिन्दगी कितनी मिली इसके मानी ज्यादा नहीं, कैसे जी गई सारा तत्वदर्शन इसी में समाया है।रंगकोष लुटाकर,खुशबू उड़ेलकर।मकसद पूरा ऐसे होता है।फिर धरती को देह सौंप देती है प्रकृति।

अतिशय कोमल रूप की ऐसी परिणति !कोमलता भी ऐसी कि हल्का सा परस भी आहत कर जाए।

मिट्टी के अक्षय पात्र में सब कुछ एक रंग,एक रूप, एक प्राण हो जाता है।

  कितनी ही अनिंद्य रूपराशि, पराकोटि की महक क्यों न हो सभी को मिट जाना है एक दिन।

 समुद्र मंथन से निकला था हर सिंगार।मनोमंथन से भी यह अविष्कार संभव है।

मेरे देवतरु के फूल भी मेरे —- मेरा मेरा — कुछ नहीं होता। सारा निसर्ग का है।

दरअसल इस स्वर्गिक रूपराशि से आँखों को उनके होने का गर्व अनुभव करवाना होता है।

सत्यभामा के लिये स्वर्ग से लाये थे कृष्ण —- हरसिंगार। नियति — उसके फूल रुक्मिणी के आँगन में झरते थे।अपना अपना भाग्य।

हर फूल की नियति तै है। पूर्वलिखित है।

कंपाउंड वाॅल के बाहर की टहनियों से हरी हरी घास पर बारिश की बूँदों में लिपटे भीगे भीगे फूल, कार्पोरेशन के झाड़ूवाले बड़ी बेरहमी से डस्ट बिन में डाल देते हैं।कुछ उन्हें अनजाने में रौंदते हुये चलते हैं।

कुछ संवेदनशील मन के स्वामी, एक एक फूल हौले हौले चुनते हैं—-

माना कि तुम शाख से अलग हो चुके हो पर मन है कि मानता नहीं—निष्प्राण में प्राणों के स्पंदन सुनने की बेकली,कातर आशा— सब कुछ जानते हुये भी, निरीह मन को समझाने में नाकाम।

हरसिंगार के एक दिन का सफरनामा– तेरा तुझको अर्पण।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उम्मीद से….! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उम्मीद से….! ? ?

……हिंदी की बात छोड़ दीजिए। कल्पनालोक से बाहर आइए। हिंदी कभी पढ़ाई-लिखाई, एडमिनिस्ट्रेशन, डिप्लोमेसी की भाषा नहीं हो सकती। हिंदी एंड इंग्लिश का अभी जो स्टेटस है, वही परमानेंट है…।

उसकी बात सुनकर मेरी आँखों में चमक आ गई। यह वही शख्स है जिसने कहा था,…जम्मू एंड कश्मीर की बात छोड़ दीजिए। जे एंड के का अभी जो स्टेटस है, वही परमानेंट है…।

देश उम्मीद से है।

(5 अगस्त 2019 को सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत किये जाने से एक दिन पहले, 4 अगस्त को प्रातः 5:20 पर जन्मी रचना।)

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 115 – The Secret Office Printer… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Secret Office Printer.  

☆ Witful Warmth# 115 ☆

☆ Satire ☆ The Secret Office Printer… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

In the sprawling corporate maze of OmniTech Systems, Floor 4 was known as the ‘Zone of Silence’. It housed the top executives who communicated exclusively through high-priority emails, cold nods, and severe glances. But among all the sleek chrome and glass furniture, one item held legendary status: Printer 4B.

While every other printer in the building jammed, leaked ink, or ran out of paper every twenty minutes, Printer 4B worked with flawless, whisper-quiet perfection. The catch? It was located right outside the office of Mr. Rathore, the Vice President, who considered the machine his personal property. Anyone caught using it without authorization faced immediate public humiliation or an unpleasant transfer to the basement inventory department.

Anand, a mid-level team lead, was facing an unprecedented crisis. It was 4:45 PM on a Friday. His crucial contract documents for a international client needed to be physically signed and scanned before 5:00 PM. But every standard printer on the floor was flashing bright red error lights.

Desperate, Anand clutched his flash drive like a sacred relic and tiptoed toward Printer 4B.

The corridor was deserted. Mr. Rathore’s office door was slightly ajar, but the room inside was pitch black—he had left early for his weekend golf trip. Anand’s heart pounded against his ribs like a trapped bird. He plugged in his flash drive, pressed ‘Print’, and waited.

The machine hummed smoothly. Sheet after crisp sheet began sliding out into the tray. Anand exhaled a long breath of pure relief.

Just as the final page clicked into the tray, heavy footsteps echoed down the polished wooden floor. Anand spun around, his blood running cold. Walking straight toward him was Mr. Rathore, accompanied by two senior auditors.

“Anand?” Mr. Rathore’s voice sliced through the silence like an ice pick. “What are you doing at my private terminal?”

Anand’s mind raced through excuses: a software glitch, a fire drill, a burst pipe. But the auditors were looking at him with deep suspicion. If they checked the print queue, they would discover he was using executive hardware without permission.

Thinking fast, Anand grabbed the stack of freshly printed pages, turned to Mr. Rathore, and bowed slightly with dramatic respect.

“Sir,” Anand said, his voice firm and unflinching. “The audit team requested an emergency printout of your quarterly department achievements. I knew the standard printers were unreliable, so I took the liberty of using the only printer in this building worthy of printing your leadership records.”

Mr. Rathore stopped dead in his tracks. He looked at the auditors, then at the stack of paper in Anand’s hands, and his chest swelled with immense pride.

“Outstanding initiative, Anand!” Mr. Rathore beamed, slapping him on the shoulder. “A true leader uses the best tools available for important company records!”

The auditors nodded in thorough approval and began clapping. Anand smiled gracefully, gathered his contract papers, and walked away toward the scanner, realizing that in corporate warfare, absolute audacity disguised as buttering up the boss is the ultimate survival tool.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३० ☆ हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३० ☆

?  आलेख – हिंदी दिवस : हिंदी को बचाना नहीं, उसे सक्षम और अपरिहार्य बनाना है ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी दिवस पर हम प्रायः एक ही बात कहते हैं, हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारी पहचान है, हमें हिंदी का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को बचाने की आवश्यकता नहीं बची है। फिल्मी गीतों में , लोक व्यवहार में वह सुरक्षित है। आज हिंदी को सक्षम बनाने की आवश्यकता है।

लेकिन एक प्रश्न अवश्य है, क्या हिंदी भविष्य की भाषा बन रही है?

इसका उत्तर हमारी भावनाओं में नहीं, हिंदी की उपयोगिता में छिपा है।

आज यदि किसी बच्चे को हिंदी में अच्छी शिक्षा मिले, किसी युवा को हिंदी में रोजगार मिले, किसी वैज्ञानिक को अपना शोध हिंदी में दुनिया तक पहुँचाने का अवसर मिले, किसी उद्यमी को हिंदी में अपना बाजार मिले और किसी नागरिक को तकनीक अपने ही शब्दों में उपलब्ध हो , तभी हिंदी का वास्तविक विस्तार होगा।

इसलिए हिंदी के लिए हमें तीन काम करने होंगे।

पहला, हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाना होगा।

विज्ञान, चिकित्सा, कानून, तकनीक, प्रबंधन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में तैयार करनी होगी। केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में मौलिक ज्ञान-सृजन करना होगा।

दूसरा, हिंदी को डिजिटल भाषा की पूरी ताकत देनी होगी।

आज भाषा का भविष्य पुस्तकालयों से अधिक मोबाइल और स्क्रीन पर तय हो रहा है। हमें अच्छे हिंदी ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो, ई-पुस्तकें, डिजिटल पाठ्यक्रम और एआई आधारित हिंदी उपकरण बनाने होंगे।

हिंदी जितनी अधिक टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा होगी।

तीसरा, हमें हिंदी का बाजार बनाना होगा।

 यह बात थोड़ी कठोर लग सकती है, लेकिन जरूरी है।

 जिस भाषा में आर्थिक अवसर नहीं होंगे, युवा उस भाषा से भावनात्मक रूप से जुड़कर भी व्यावहारिक जीवन में दूसरी भाषा की ओर चले जाएंगे।

 इसलिए हिंदी में कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद, प्रकाशन, विज्ञापन, सॉफ्टवेयर, शिक्षा और एआई, इन सबको रोजगार से जोड़ना होगा।

 और एक बात और।

हिंदी का विस्तार दूसरी भाषाओं को हटाकर नहीं होगा।

हमें अंग्रेजी से डरने की नहीं, उससे संवाद करने की आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा की नहीं, सहयोग की आवश्यकता है।

 हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहणशीलता है। वह संस्कृत से लेती है, उर्दू से लेती है, अंग्रेजी से लेती है और लोकभाषाओं से भी सीखती है।

 हम हिंदी के केवल अच्छे वक्ता न बनें,

हिंदी के अच्छे निर्माता बनें।

एक अच्छी किताब लिखें।

एक अच्छा डिजिटल पाठ तैयार करें।

एक उपयोगी हिंदी ऐप बनाएँ।

एक वैज्ञानिक विषय को सरल हिंदी में समझाएँ।

एक बच्चे को हिंदी में कुछ नया सिखाएँ।

क्योंकि भाषा केवल बोलने से नहीं बढ़ती।

भाषा तब बढ़ती है, जब उसमें नया ज्ञान, नया विचार और नया भविष्य लिखा जाता है।

 

आइए, हिंदी को केवल अपनी पहचान न बनाएँ।उसे अपनी सृजन-शक्ति, अपनी तकनीक और अपने भविष्य की भाषा बनाएँ।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “उसका आदमी…” ☆ श्री आशिष मुळे ☆

श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “उसका आदमी…☆ श्री आशिष मुळे ☆

गाली उसे देते हो,

मगर भिड़ते अँधेरे से हो,

इतना साहस कैसे लाते हो—

क्या तुम आदमी उसके हो?

 *

दुकानें उसकी आबाद हैं,

मगर तुम दिवालिया हो,

हँसते फिर भी रहते हो—

लगता है उसी के आदमी हो।

 *

कटघरे में नैतिकता के

खड़े जैसे गुनहगार हो,

सदियों से जलते आए हो,

फिर भी आज ज़िंदा हो।

 *

पत्थर तुमने ठुकराए हैं,

पर इंसान बचाते हो,

नाम उसका लेते नहीं—

काम उसी का करते हो।

 *

ज़रूर, तुम आदमी उसके हो,

हाँ, तुम आदमी उसके हो…

© श्री आशिष मुळे

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३४ – मनोज के दोहे – कविता ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे – कविता । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३४ ☆

☆  मनोज के दोहे – कविता  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

कविता संग की दोस्ती, थामा उसका हाथ।

मुझसे जब-जब रूठती, तब-तब हुआ अनाथ।।

*

प्रश्न करे जग बावरा, लिखता जो दिन रात ।

कौन पढ़ेगा यह सभी, तेरे दिल की बात ।।

*

कुछ अपनेे ही कोसते, देख मेरा यह काज।

प्रतिपल समय गवाँ रहा, आती है ना लाज।।

*

तन की ताकत के लिये, पौष्टिक हैं आहार ।

मन की शक्ती के लिये, जीवन में सुविचार ।।

*

कविता कभी न चाहती, मानवता पर घात ।

जिसमें जग का हित रहे, उसे सुहाती बात ।।

*

मिटे विषमता देश की, अरू मानव मन भेद ।

प्रगति राह में सब बढ़ें, व्यर्थ बहे न श्वेद ।।

*

जगे हृदय संवेदना, या बदले परिवेश ।

यही सोच कर लिख रहा, शायद बदले देश ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ टीस अभी बाकी है ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार ☆

श्री रमाकांत ताम्रकार

☆ कविता – टीस अभी बाकी है श्री रमाकांत ताम्रकार 

हम एक बाड़े में रहते थे

14 किरायेदारों का एक परिवार

और केवल तीन पाखाने

एक पर मकान मालिक

के दामाद का कब्जा

सिर्फ तेरह परिवार को केवल 2

और वह आती जर्जर काया वाली

साफ कर जाती तीनों पाखाने

बिल्कुल चमचमाते से

कोई उन्हें बुआ बोलता

तो कोई दादी

वह लोगों की बड़ी अम्मा

बड़ी बाई और न जाने

कितने रिश्तों में बँधी थी वो

हाँ हम बच्चों के लिए

लाती वह परचून की दुकान से

ठंडी मीठी पिपरमेंट की गोलियां

हम बड़े ही चाव से खाते

और वह हमसे एसे बतियाती

दुलारती जैसे हम उनके बच्चे हो

त्योहारों के समय उनकी

चौदह परिवार आवभगत करते

और तो और रक्षाबंधन पर

वह इन चौदह परिवारों के

मुँह बोले भाइयों को

पाट की  राखी बांधती.

एक दिन वह बाड़ा बिक गया

सब तिरर  बिरर हो गये.

और खो गए वो प्यारे रिश्ते

हम भी खो गए

दुनियां की स्याह गालियों में

पर प्रेम,  स्नेह, अपनत्व की

टीस अभी भी बाकी है.

एक प्रकाश पुंज की तरह.

© श्री रमाकान्त ताम्रकार

संपर्क – 423 कमला नेहरू नगर, जबलपुर। 

मोबाइल 9926660150

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’   ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०९३ ⇒ विचार और शून्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार और शून्य।)

?अभी अभी # १०९३ ⇒ आलेख – विचार और शून्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या हम हमेशा ही सोचते, विचारते रहते हैं! होते होंगे कुछ चिंतक और विचारक, लेकिन लगातार कौन सोचते रहता होगा। मेरी मां अक्सर शांत रहा करती थी, वह मितभाषी और मृदुभाषी थी। उनका चेहरा शांत था, लेकिन लगता था, जैसे वह हमेशा कुछ सोचती रहती हो। अगर पूछो तो यही जवाब मिलता था, नहीं कुछ नहीं!

लेकिन साफ नजर आ जाता था कि उनके सोचने की प्रक्रिया में मैने कुछ व्यवधान उत्पन्न कर दिया है। मुझे मालूम था, वह क्या सोचती थी। उन्हें सबकी चिंता रहती थी, वह सदा सबका भला ही सोचते रहती थी।

शायद सबकी मां ऐसी ही हो। हमें अपने आपके बारे में ही सोचने से फुर्सत नहीं मिलती, क्या हम किसी के बारे में सोचें। फिर भी हम सोचते ही रहते हैं, लोगों से

विचार विमर्श भी करते ही रहते हैं।।

लिखने के लिए पहले विचार आता है, फिर उस विचार पर हम सोचना शुरू कर देते हैं। वह विचार हमारा विषय बन जाता है। आप सोचते रहें, विचार आते चले जाएंगे, कितनों को आप अपने शब्दों अथवा लेखनी में कैद कर सकते हैं, आप ही जानो। कोई अगर बोलता है तो उसे रेकॉर्ड करना अथवा लिखना फिर भी आसान है, लेकिन हर सोचा हुआ विचार अथवा शब्द मूर्त रूप नहीं ले सकता। मन की गति और सोचने की गति से हम बराबरी नहीं कर सकते।

जब हम कुछ सोचते, विचारते नहीं, तब हम क्या करते हैं। क्या चुपचाप बैठे रहते हैं! जो भी हमें उस अवस्था में देखता है, यही कहता है, किस सोच में डूबे हुए हो ? तो क्या वाकई हम कभी कभी सोच में इतने डूब जाते हैं, कि हमें यह भी पता नहीं चलता, हम क्या सोच रहे थे।।

होती है एक विचार शून्य अवस्था, जिसमें हमारा चित्त शांत रहता है, और विचारों का आवागमन भी बंद सा हो जाता है, मानो विचारों पर कर्फ्यू लगा हो। पलट, तेरा ध्यान किधर है। सामने वाला नहीं जानता, आपकी अवस्था क्या है, क्योंकि उस समय आपका ध्यान उसकी ओर भी नहीं है।

योग में ध्यान की अवस्था बड़ी विचित्र है। अष्टांग योग में ध्यान का स्थान सातवां है, यानी यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहारऔर धारणा के बाद ध्यान का नंबर आता है, जिसके बाद तो सीधे समाधि ही लग जाती है। नहीं भाई, नहीं उलझना हमें इस योग के झंझट में, खास कर यम नियम की बात तो हमसे करो ही मत। अपने तो आसन वासन भले और बाबा रामदेव वाला अनुलोम विलोम और कपालभाति। और पते की बात बताऊं, साधो, सहज समाधि भली।।

सोचते सोचते कभी हम शून्य में चले जाते हैं, बस वही अवस्था तो विचार शून्य अवस्था है। दो विचारों के बीच कुछ समय ऐसा आ जाता है, जब हम कुछ भी नहीं सोचते, एक शून्य सा व्याप्त हो जाता है, अंदर, बस वही ध्यान है, लेकिन उसका समय बहुत कम होता है। जितनी शून्य की अवस्था बढ़ती जाएगी, उतना ध्यान का समय भी बढ़ता जाएगा।

साधन, चिंतन, मनन और स्वाध्याय सृजन के उत्तम सोपान हैं। शरीर और मन का निरोगी होना ही सहजावस्था है। इस अवस्था में हम खुद से ऊपर उठकर कुछ सोच विचार सकते हैं, कई अच्छे विचार इस समय मन में प्रवेश करते हैं, जिन शुभ संकल्पों का जीवन में क्रियान्वन संभव है। विचार की तरह, शून्य भी एक अनूठी उपलब्धि है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ – चौपाई – श्री गणेशाय नमः ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी  “चौपाई – श्री गणेशाय नमः”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ ☆

🌻 चौपाई – श्री गणेशाय नमः 🌻

शंकर  सुवन  भवानी  नंदन,  वेद  मंत्र  से  पूजन   वंदन।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

लंबोदर   है   सुंदर   प्यारे, हैं   अनंत   महिमा   है  न्यारे।

कृपा दृष्टि से पूरन  काजा, हे  गणनायक  मूषक  राजा।।

चरण   पखारे   निशदिन   सेवा,  यमुना गंगा निर्मल रेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

चार भुजाएं छबि है न्यारी, कटि पीताम्बर तुमको प्यारी।

एक  दंत  है  भगवन  धारें, संकट  विपदा  सबकी  टारें।।

बाल   मुकुंद   मनोहर   पुरवा, भोग  लगे  है  लड्डू  मेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

वक्रतुड  की  बात  निराली,  मंद –  मंद  मुस्काते  लाली।

माँ  गौरी  आँखों  के  तारें,  अरि  दानव   है तुमसे हारे।।

लौंग  पान से  सज्जित मेवा, चढ़ता  छप्पन  भोग  कलेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

मातु-पिता  सर्वोत्तम  जानें, बुध्दि  देव  सब  तुमको  मानें।

रिद्धि-सिद्धि  है संग तिहारे,  बाल सखा सब रोज  पधारे।।

आन    विराजे    मेरे    ठेवा,  मंगल   मूरत   मंगल    देवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा,  भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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