हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विरूपाक्ष मंदिर

बस से उतरकर सबसे पहले विरूपाक्ष मंदिर पहुंचे। विरुपाक्ष मंदिर खंडहरों के बीच बचा रह गया था। अभी भी यहाँ पूजा होती है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहां विरुपाक्ष-पम्पा पथी के नाम से जाना जाता है। शिव “विरुपाक्ष” के नाम से जाने जाते हैं। यह मंदिर  तुंगभद्रा नदी के तट पर है। विरुपाक्ष अर्थात् विरूप अक्ष, विरूप का अर्थ है कोई रूप नहीं, और अक्ष का अर्थ है आंखें। इसका अर्थ हुआ बिना आँख वाली दृष्टि। जब आप थोड़ा और गहराई में जाते हैं, तो आप देखते हैं कि चेतना आँखों के बिना देख सकती है, त्वचा के बिना महसूस कर सकती है, जीभ के बिना स्वाद ले सकती है और कानों के बिना सुन सकती है। ऐसी चीजें गहरी ‘समाधि’ में सपनों की तरह ही घटित होने लगती हैं। चेतना अमूर्त है। आप पांच इंद्रियों में से किसी के भी बिना सपने देखते हैं; सूंघते हैं, चखते हैं, आप सब कुछ करते हैं ना? तो विरुपाक्ष वह चेतना है जिसकी आंखें तो हैं लेकिन मूर्त आकार नहीं है।  समस्त ब्रह्मांड में शिव चेतना बिना किसी आकार के जड़ को चेतन करती है, जैसे बिजली दिखाई नहीं देती मगर पंखे को घुमाने लगती है। छठी इंद्रिय का अतीन्द्रिय अहसास ही विरूपाक्ष है। इंद्र की पाँच इन्द्रियों से परे छठी इन्द्रिय का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत तो बहुत बाद उन्नीसवीं सदी में सिग्मंड फ्रॉड के अध्ययन के बाद आया। उसके बहुत पहले विरुपाक्ष चेतन शिव की मूर्ति बन चुकी थी।

विरूपाक्ष मंदिर का इतिहास लगभग 7वीं शताब्दी से अबाधित है। विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य-2 ने करवाया था जो इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था। पुरातात्विक अध्ययन से इसे बारहवीं सदी के पूर्व का बताया गया है। विरुपाक्ष-पम्पा विजयनगर राजधानी के स्थित होने से बहुत पहले से अस्तित्व में था। शिव से संबंधित शिलालेख 9वीं और 10वीं शताब्दी के हैं। जो एक छोटे से मंदिर के रूप में शुरू हुआ वह विजयनगर शासकों के अधीन एक बड़े परिसर में बदल गया। साक्ष्य इंगित करते हैं कि चालुक्य और होयसल काल के अंत में मंदिर में कुछ अतिरिक्त निर्माण किए गए थे, हालांकि अधिकांश मंदिर भवनों का श्रेय विजयनगर काल को दिया जाता है। विशाल मंदिर भवन का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासक देव राय द्वितीय के अधीन एक सरदार, लक्कना दंडेशा द्वारा किया गया था।

विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर का निर्माण और विस्तार किया। मंदिर के हॉल में संगीत, नृत्य, नाटक, और देवताओं के विवाह से जुड़े कार्यक्रम आयोजित होते थे। विरुपाक्ष मंदिर में  शिव, पम्पा और दुर्गा मंदिरों के कुछ हिस्से 11वीं शताब्दी में मौजूद थे। इसका विस्तार विजयनगर युग के दौरान किया गया था। यह मंदिर छोटे मंदिरों का एक समूह है, एक नियमित रूप से रंगा हुआ, 160 फीट ऊंचा गोपुरम, अद्वैत वेदांत परंपरा के विद्यारण्य को समर्पित एक हिंदू मठ, एक पानी की टंकी, एक रसोई, अन्य स्मारक और 2,460 फीट लंबा खंडहर पत्थर से बनी दुकानों का बाजार, जिसके पूर्वी छोर पर एक नंदी मंदिर है।

विरुपाक्ष मंदिर को द्रविड़ शैली में बनाया गया है। द्रविड़ शैली के मंदिरों की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं कि ये मंदिर आमतौर पर आयताकार प्रांगण में बने होते हैं। इन मंदिरों का आधार वर्गाकार होता है और शिखर पिरामिडनुमा होता है। इन मंदिरों के शिखर के ऊपर स्तूपिका बनी होती है। इन मंदिरों के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहते हैं। इस मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में, इसे बनाने और सजाने के लिए गणितीय अवधारणाओं का उपयोग हुआ है। मंदिर का मुख्य आकार त्रिकोणीय है। जैसे ही आप मंदिर के शीर्ष को देखते हैं, पैटर्न विभाजित हो जाते हैं और खुद को दोहराते हैं। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का शिवलिंग है जो दक्षिण की ओर झुका हुआ है। इसी प्रकार यहां के पेड़ों की प्रकृति भी दक्षिण की ओर झुकने की है।

तुंगभद्रा नदी से उत्तर की ओर एक गोपुरम जिसे कनकगिरि गोपुर के नाम से जाना जाता है। हमने तुंगभद्रा नदी की तरफ़ से कनकगिरि गोपुर से मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया। द्वार पर द्वारपालों की मूर्तियां हैं। मंदिर का मुख पूर्व की ओर है, जो शिव और पम्पा देवी मंदिरों के गर्भगृहों को सूर्योदय की ओर संरेखित करता हैं। एक बड़ा पिरामिडनुमा गोपुरम है। जिसमें खंभों वाली मंजिलें हैं जिनमें से प्रत्येक पर कामुक मूर्तियों सहित कलाकृतियां हैं। गोपुरम एक आयताकार प्रांगण की ओर जाता है जो एक अन्य छोटे गोपुरम में समाप्त होता है। इसके दक्षिण की ओर 100-स्तंभों वाला एक हॉल है जिसमें प्रत्येक स्तंभ के चारों तरफ हिंदू-संबंधित नक्काशी है। इस सार्वजनिक हॉल से जुड़ा एक सामुदायिक रसोईघर है, जो अन्य प्रमुख हम्पी मंदिरों में पाया जाता है। रसोई और भोजन कक्ष तक पानी पहुंचाने के लिए चट्टान में एक चैनल काटा गया है। छोटे गोपुरम के बाद के आंगन में दीपा-स्तंभ  और नंदी हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 146 ☆ गीत – ।। कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # 146 ☆

☆ गीत – ।। कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।

हर जीवन में आती खुशी गम यही इसका तंत्र है।।

मुश्किलों के सफर में राह आपने खुद ही बनानी है।

अपने अरमानों की   महफिल खुद ही सजानी है।।

आपका आत्मविश्वास ही बनता सफलता का यंत्र है।

कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।।

*

ज़ख्म कितने भी   गहरें हों दुनिया को बताना नहीं है।

दिखा के जख्म अपने दुनिया वालों की दवा पाना नहीं है।।

जब हम अपने रास्ते खुद चुन सकें तभी हम स्वतंत्र हैं।

कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।।

*

कभी हारना कभी जीतना  यही जीवन की चाल है।

कभी दया की भावना कभी गुस्से का आता उबाल है।।

मानवता की हार सबसे बड़ी जब हम होते परतंत्र हैं।

कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।।

*

व्यक्ति से समाज  समाज से देश का निर्माण होता है।

आत्मनिर्भर राष्ट्र लिए हर कठिनाई का समाधान होता है।।

अनुशासन समर्पित नागरिक से बनता सच्चा लोकतंत्र है।

कभी पाना कभी खोना यही जीवन का मंत्र है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #212 ☆ शिक्षाप्रद बाल गीत – कविता – बापू का सपना… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – बापू का सपना। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # 212 ☆

☆ शिक्षाप्रद बाल गीत – बापू का सपना…  ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

बापू का सपना था—भारत में होगा जब अपना राज ।

गाँव-गाँव में हर गरीब के दुख का होगा सही इलाज ॥

*

कोई न होगा नंगा – भूखा, कोई न तब होगा मोहताज ।

राम राज्य की सुख-सुविधाएँ देगा सबको सफल स्वराज ॥

*

पर यह क्या बापू गये उनके साथ गये उनके अरमान।

रहा न अब नेताओं को भी उनके उपदेशों का ध्यान ॥

*

गाँधी कोई भगवान नहीं थे, वे भी थे हमसे इन्सान ।

किन्तु विचारों औ’ कर्मों से वे इतने बन गये महान् ॥

*

बहुत जरूरी यदि हम सबको देना है उनको सन्मान ।

हम उनका जीवन  समझें, करे काम कुछ उन्हीं समान ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 600 ⇒ मुझसे अच्छा कौन है ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुझसे अच्छा कौन है !।)

?अभी अभी # 600 ⇒ मुझसे अच्छा कौन है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अच्छा होना बुरा नहीं ! सबसे अच्छा होना तो कतई नहीं। बच्चे अच्छे होते हैं, बहुत अच्छे। अच्छे बेटे मस्ती नहीं करते, गटगट दूध पी जाते हैं। जो मम्मा का कहना नहीं मानते, वे गंदे बच्चे होते हैं।

कोई माँ अपने बच्चे को बड़ा होकर बुरा इंसान नहीं बनाना चाहती, इसलिए उसमें एक अच्छे इंसान बनने की भावना को प्रबल करती रहती है।

बाल मनोविज्ञान भी यही कहता है। बच्चों को मारना, झिड़कना, उन्हें सबके सामने अपमानित करना, उनके व्यक्तित्व पर विपरीत प्रभाव डालता है। वे जिद्दी, गुस्सैल और हिंसक हो जाते हैं। कुछ सुधारकों का यह भी मत है कि बच्चों को भविष्य में एक इंसान बनाने के लिए, सख्ती और अनुशासन भी ज़रूरी है। अधिक लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं।।

बालक के मन में केवल एक ही भाव होता है, मैं अच्छा हूँ, सबसे अच्छा ! वह हर जगह प्रथम आना चाहता है, खेल में, पढ़ाई में, बुद्धि और ज्ञान में। लोगों की तारीफ़ और प्रशंसा उसे और अधिक उत्साहित करती है और उसमें यह भाव पुष्ट होता जाता है, कि मुझसे अच्छा कोई नहीं।

शनैः शनैः जब वह बड़ा होता है, तो परिस्थितियां बदलती जाती हैं। संघर्ष, चुनौतियाँ और प्रतिस्पर्धाओं से गुजरते हुए वह परिपक्व होता है। प्रयत्न, पुरुषार्थ और भाग्य अगर साथ देता है, तो वह सफलता की सीढियां पार करते हुए सबसे आगे निकल जाता है। पद, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलते ही, अचानक उसे अहसास होता है कि वह अब एक बड़ा आदमी बन गया है। क्या उससे अच्छा भी कोई हो सकता है।।

लोगों से मिलने वाली प्रशंसा और सम्मान से अभिभूत हो, वह और अच्छा दिखने की कोशिश करता है। काम, क्रोध, लालच और अहंकार जैसे विकार अंदर ही अंदर कब विकसित हो गए, उसे पता ही नहीं चलता। उसे बस तारीफ़ और प्रशंसा ही अच्छी लगने लगती है, और वह अपने आप में स्वयं को एक सबसे अच्छा आदमी मान बैठता है।।

अब उससे विरोध, असहमति अथवा आलोचना बर्दाश्त नहीं होती। वह केवल ऐसे ही लोगों के संपर्क में रहना पसंद करता है, जो उसे केवल अच्छा नहीं, सबसे अच्छा आदमी मानें। उससे सलाह लें, मार्गदर्शन लें, उसके पाँव छुएं, लोगों के सामने उसकी तारीफ़ करें।

एक साधारण आदमी को वे परेशानियां नहीं झेलनी पड़ती, जो एक अच्छे आदमी को झेलना पड़ती है। अधिकतर प्रतिस्पर्धा सफल और अच्छे लोगों में ही होती है। एक दूसरे से आगे बढ़ने और , और अधिक अच्छा बनने की स्पर्धा। और बस यहीं से, अच्छा बनने के लिए बुरे हथकंडों का भी सहारा लिया जाने लगता है। एक मैराथन, कौन जीवन में सबसे अच्छा बनकर दिखाता है।

सबसे सच्चा नहीं, सबसे अच्छा।।

सबसे अच्छा तो खैर, ईश्वर ही है। वह ही जानता है, हम कितने अच्छे हैं। हमारा बच्चा सबसे अच्छा है, हमारी माँ सबसे अच्छी है, हमारा परिवार सबसे अच्छा है, और हमारा देश सबसे अच्छा है। सबमें अच्छाई देखना भी बुरा नहीं। लेकिन जिस दिन यह भाव आ गया, मुझसे अच्छा कौन ? समझिए, कुछ तो गड़बड़ है…!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

 

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सूचनाएँ/Information ☆ श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ की कृतियों “सुमित्र संस्मरण” एवं “अधरों पर मुस्कान” का विमोचन ☆ साभार – मंथनश्री, पाथेय एवं डायनामिक संवाद टी वी ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ की कृतियों सुमित्र संस्मरण’ एवं अधरों पर मुस्कान का विमोचन ☆ साभार – मंथनश्री, पाथेय एवं डायनामिक संवाद टी वी ☆

जबलपुर। मंथनश्री एवं पाथेय संस्था के तत्वावधान में श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ की दो कृतियों सुमित्र संस्मरण एवं  अधरों पर मुस्कान दोहावली का विमोचन आज 8 फरवरी को सायं 5 बजे से कला वीधिका, रानी दुर्गावती  संग्रहालय में आयोजित है।

समारोह संयोजक राजेश पाठक ‘ प्रवीण ‘ ने बताया कि इस अवसर पर श्री अशोक मनोध्या, पं. संतोष शास्त्री, डॉ.विजय तिवारी ‘किसलय’, डॉ. सलमा ‘ जमाल’, श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘ गुदालू’,  मदन श्रीवास्तव,डॉ. गोपाल दुबे, रूपम बाजपेयी, कविता नेमा, कु. आराध्या तिवारी ‘ प्रियम ‘ को सम्मानित किया जायेगा।

समारोह के मुख्य अतिथि मदन तिवारी वरिष्ठ समाजसेवी हैं। अध्यक्षता महाकवि आचार्य भगवत दुबे करेंगे । विशिष्ट अतिथि महामहोपाध्याय डॉ. हरिशंकर दुबे, अमरेन्द्र नारायण वरिष्ठ पत्रकार गंगा पाठक, विजय बागरी एवं प्रतुल श्रीवास्तव होंगे । मंथनश्री से आशुतोष तिवारी एवं कविता राय ने समस्त साहित्य प्रेमियों से कार्यक्रम में उपस्थिति की अपील की है।

साभार – मंथनश्री, पाथेय एवं डायनामिक संवाद टी वी 

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विवाह बाधा योग और दूर करने के उपाय ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

☆ आलेख ☆ विवाह बाधा योग और दूर करने के उपाय ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

अपने समाज पर दृष्टि डालने पर हम पाते हैं कि अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों के विवाह को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं। अगर बच्चों ने लव मैरिज भी कर ली है तो उनका वैवाहिक जीवन ठीक चलेगा या नहीं इसका भी माता-पिता को काफी चिंता रहती है। उनकी चिंता को दूर करने के लिए अगर हम बालक और बालिका के कुंडली का विश्लेषण करें तो हम आसानी से पता कर सकते हैं कि उनके विवाह में देरी या वैवाहिक जीवन ठीक से न चलने का क्या कारण है। इसके अलावा हम यह भी जान सकते हैं कि विवाह हो तथा वैवाहिक जीवन ठीक चले इसके लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। आइये आज हम इसी पर चर्चा करते हैं।

विवाह होने में होने वाली परेशानी तथा वैवाहिक जीवन की परेशानी का मुख्य कारण विवाह बाधा योग है।

 विवाह बाधा योग लड़के, लड़कियों की कुंडलियों में समान रूप से लागू होते हैं, अंतर केवल इतना है कि लड़कियों की कुंडली में गुरू की स्थिति पर विचार तथा लड़कों की कुंडलियों में शुक्र की विशेष स्थिति पर विचार करना होता है।

(1) यदि कुंडली में सप्तम भाव ग्रह रहित हो और सप्तमेश बलहीन हो, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो, ऐसे जातक को अच्छा पति/पत्नी मिल पाना संभव नहीं हो पाता है।

(2) सप्तम भाव में बुध-शनि की युति होने पर भी दाम्पत्य सुख की हानि होती है। सप्तम भाव में यदि सूर्य, शनि, राहू-केतू आदि में से एकाधिक ग्रह हों अथवा इनमें से एकाधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो भी दाम्पत्य सुख बिगड़ जाता है।

(3) यदि कुण्डली में सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो पुनर्विवाह की संभावना रहती है। नवांश कुंडली में यदि मंगल या शुक्र का राशि परिवर्तन हो, या जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र संयुक्त रूप से सप्तम भाव में हों, तो ये योग चरित्रहीनता का कारण बनते हैं, और इस कारण दाम्पत्य सुख बिगड़ सकता है।

(4) यदि जन्मलग्न या चंद्र लग्न से सातवें या आठवें भाव में पाप ग्रह हों, या आठवें स्थान का स्वामी सातवें भाव में हो, तथा सातवें भाव के स्वामी पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य जीवन सुखी होने में बहुत बाधाएं आती हैं।

(5) यदि नवम भाव या दशम भाव के स्वामी, अष्टमेश या षष्ठेश के साथ स्थित हों, तो दांपत्य जीवन में दरार आ सकती है।

(6) अगर लग्नेश तथा शनि बलहीन हों, चार या चार से अधिक ग्रह कुंडली में कहीं भी एक साथ स्थित हों अथवा द्रेष्काण कुंडली में चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में गया हो, और नवांश कुंडली में मंगल के नवांश में शनि हो, और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो तो भी वैवाहिक जीवन में विभिन्न परेशानियां आती हैं।

(7) अगर सूर्य, गुरू, चन्द्रमा में से एक भी ग्रह बलहीन होकर लग्न में दशम में, या बारहवें भाव में हो और बलवान शनि की पूर्ण दृष्टि में हो, तो ये योग जातक या जातिका को सन्यासी प्रवृत्ति देते हैं, या फिर वैराग्य भाव के कारण अलगाव की स्थिति आ जाती है, और विवाह की ओर उनका लगाव बहुत कम होता है।

(8) यदि लग्नेश भाग्य भाव में हो तथा नवमेश पति स्थान में स्थित हो, तो ऐसी लड़की भाग्यशाली पति के साथ स्वयं भाग्यशाली होती है। उसको अपने कुटुम्बी सदस्यों द्वारा एवं समाज द्वारा पूर्ण मान-सम्मान दिया जाता है। इसी प्रकार यदि लग्नेश, चतुर्थेश तथा पंचमेश त्रिकोण या केंद्र में स्थित हों तो भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है।

 (9) यदि सप्तम भाव में शनि और बुध एक साथ हों और चंद्रमा विषम राशि में हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहयुक्त बनता है और अलगाव की संभावना होती है।

 (10) यदि जातिका की कुुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं गुरू तथा जातक की कुण्डली में सप्तम भाव सप्तमेश एवं शुक्र पाप प्रभाव में हों, तथा द्वितीय भाव का स्वामी छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो इस योग वाले जातक-जातिकाओं को अविवाहित रह जाना पड़ता है।

 (11) शुक्र, गुरू बलहीन हों या अस्त हों, सप्तमेश भी बलहीन हो या अस्त हो, तथा सातवें भाव में राहू एवं शनि स्थित हों, तो विवाह होने में बहुत परेशानी होती है।

 (12) लग्न, दूसरा भाव और सप्तम भाव पाप ग्रहोें से युक्त हों, और उन पर शुभ ग्रह की पूर्ण दृष्टि न हो, तो भी विवाह होने में बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है।

 (13) यदि शुक्र, सूर्य तथा चंद्रमा पुरूषों की कुंडली में तथा सूर्य, गुरू, चंद्रमा, महिलाओं की कुंडली में एक ही नवांश में हों, तथा छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव में हों, तो भी विवाह मैं बहुत बाधा आती है।

इस प्रकार ज्योतिषीय ग्रंथों में अनेकानेक कुयोग मिलते हैं जो या तो विवाह होने ही नहीं देते हैं, अथवा विवाह हो भी जाये तो दाम्पत्य सुख को तहस-नहस कर देते हैं।

इस प्रकार के समस्याओं से निपटने के लिए पूरी कुंडली का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। पूरी कुंडली के विश्लेषण के पश्चात उचित पूजा पाठ या अन्य प्रभावी उपाय किए जा सकते हैं।

अगर आप पूरी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहते हैं आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें।

 विवाह बाधा योग को दूर करने के उपाय:-

1- नारी जातक के लिए पुखराज का पहनना एक अच्छा उपाय है।

2- पुरुष जातक के लिए हीरे की अंगूठी पहनना भी अच्छा उपाय हो सकता है।

3- सप्तमेश की पूजा करना या सप्तमेश के लिए उपयुक्त रत्न को धारण करना एक अच्छा उपाय है।

4- शनि, राहु, केतु और मंगल की बुरी दृष्टि होने के कारण विवाह बाधा योग बनने पर इन ग्रहों की पूजा करना एक अच्छा विकल्प होता है।

5- अगर ये उपाय काम नहीं करते हैं तो मेरे पास जातक की डिटेल भेज कर उपाय प्राप्त किया जा सकता है। परंतु इसके लिए पहले जातक का आसरा ज्योतिष में दूरभाष क्रमांक 89 59594400 पर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है।

 

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “आयुष्याच्या ताम्रपटावर…” ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “आयुष्याच्या ताम्रपटावर” ☆ सौ राधिका भांडारकर 

धूळ झटकता पटलावरची

लख्खच सारे दिसू लागले

जरी दडवले होते काही

सारेच कसे पुन्हा उजळले॥१॥

*

 वाटेवरचे क्षण काटेरी

 तसेच काही आनंदाचे

 पुन्हा एकदा त्यात हरवले

 सुटले धागे सुखदुःखाचे॥२॥

*

 मुठीत वाळू हळू सांडली

 प्रीत अव्यक्त मनात दडली

काळजातली हुरहुर सारी

आवेगाने कशी दाटली ॥३॥

*

निष्ठा साऱ्या मी बाळगल्या

देणी घेणी चुकती केली

बाकी सारे शून्य जाहले

आता कसली भीती नुरली॥४॥

*

आयुष्याच्या ताम्रपटावर

 एक ओळ ती होती धूसर

शब्द प्रितीचे कोवळ्यातले

तिथे राहिले कसे आजवर

© सौ. राधिका भांडारकर

ई ८०५ रोहन तरंग, वाकड पुणे ४११०५७

मो. ९४२१५२३६६९

[email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ एकदातरी भेटशील ना?… ☆ सौ. वृंदा गंभीर ☆

सौ. वृंदा गंभीर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ एकदातरी भेटशील ना?सौ. वृंदा गंभीर

एकदा भेटायचं रे तुला

मनातील भरभरून बोलायचं

जीवनातील सुख दुःखाच्या गोष्टी

सांगायच्या… 

 

डोळ्यातील आसवं तुझ्या खांद्यावर

रिचवायचे

भेटशील ना एकदा, देशील ना खांदा

तुझ्या प्रेमात न्हाऊन निघायचं

सोबत सगळेच आहेत पण मनाला

काय वाटत माहित नाही

तुझ्या जवळच मन मोकळं करायचं

तुझ्याकडे का मन ओढ घेत कळतं नाही

तुझ्यात काहीतरी स्पेशल दिसतं

या वेड्या मनाला काही आवरणं

होत नाही

तुझी आठवण मनातून जात नाही

तुला भेटल्याशिवाय राहवत नाही

सांग ना, एकदातरी भेटशील ना

मन मोकळं करायला थोडी जागा देशील ना?

© सौ. वृंदा पंकज गंभीर (दत्तकन्या)

न-हे, पुणे. – मो न. 8799843148

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ गीता जशी समजली तशी… भाग – ७ ☆ सौ शालिनी जोशी ☆

सौ शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ गीता जशी समजली तशी… भाग – ७  – गीता — श्रीकृष्णाची वाङ्मय मूर्ती ☆ सौ शालिनी जोशी

मूर्ती ही एखाद्या व्यक्तीची प्रतिमा असते. तिला रंग, रूप, आकार असतो. त्यावरून त्या व्यक्तीचे बाह्य रूप समजू शकते. ती निर्जीव असते. आचार, विचार कळू शकत नाहीत. तेव्हा एखाद्या व्यक्तीने तिच्या वाणीने म्हणजे तिच्या शब्दांत सांगितलेले विचार म्हणजे त्या व्यक्तीची वाणीरूप मूर्ती. म्हणजे संत महात्म्यानी केलेला उपदेश, त्यांचे विचार ते गेले तरी ग्रंथ रूपाने लोकांपर्यंत पोहोचतात. म्हणून त्यांच्या ग्रंथांना त्यांची वाङ्मय मूर्ती म्हणतात. ज्ञानेश्वरी ज्ञानेश्वरांची, आत्माराम- दासबोध समर्थांची आणि गाथा ही तुकारामांची वाङ्मम मूर्ती होय. म्हणून समर्थ रामदास शिष्यांना सांगतात, ‘ आत्माराम दासबोधl माझे स्वरूप स्वतः सिद्धll असता न करावा खेदl भक्तजनीll’ तर ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरीच्या शेवटी म्हणतात, ‘ पुढती पुढती पुढतीl इया ग्रंथ पुण्य संपत्तीll सर्व सुखी सर्व भूतीl संपूर्ण होईजोll’ (ज्ञा. १८/१८०९)

तशीच गीता ही श्रीकृष्णाची वाङ्मयमूर्ती. त्याविषयी सांगण्याचा हा प्रयत्न.

श्रीकृष्ण कौरव पांडवांच्या युद्ध प्रसंगी अर्जुनाचा सारथी म्हणून रणांगणावरती उतरले. युद्धात भाग घेणार नाही अशी प्रतिज्ञा. पण पांडवांच्या बाजूने त्यांनीच प्रथम पांचजन्य शंख फुंकला. आणि ते ऋषिकेश (इंद्रीयांचा स्वामी, ऋषिक- इंद्रिय) अर्जुनाच्या इंद्रियांचा स्वामी झाले. रणांगणावर नातेवाईकांना व गुरुना पाहून अर्जुनाला त्यांच्याविषयीच्या मोहाने ग्रासले. पापा पासूनचे विचार धर्मनाशापर्यंत पोहोचले. तरीही श्रीकृष्ण शांत होते. त्यांनी अर्जुनाचे म्हणणे ऐकून घेतले. अर्जुनाच्या हातातील धनुष्य गळून पडले. तो संन्यासाची भाषा बोलू लागला आणि शेवटी श्रीकृष्णाचे शिष्यत्व पत्करले. तेव्हा श्रीकृष्णानी आपले प्रयत्न सुरू केले. अर्जुनाची वीरश्री जागृत करायचा प्रयत्न केला. पण अर्जुन मोहरूपी चिखलात अधिकच रुतत आहे असे पाहून, असा मोहरुप रोग त्याला कधीच होऊ नये या दृष्टीने उपदेशाला सुरुवात केली. विचार केला, आचरण केले आणि मग सांगितले असा हा उपदेश.

आत्म्याचे अविनाशित्व, देहाची क्षणभंगूरता, स्वधर्माची अपरिहार्यता, क्षत्रियांचे कर्तव्य व जबाबदारी, निष्कामकर्माची महती अशा वरच्या वरच्या श्रेणीत उपदेश सुरू केला. लोकसंग्रहाचा विचार, यज्ञाच्या व संन्याशाच्या जुन्या कल्पनात बदल, ज्येष्ठांचे आचरण, निष्काम कर्म सांगून मी स्वतः असे आचरण करतो, दृष्टांच्या नाशासाठी व सज्जनांच्या रक्षणासाठी अवतार घेतो. असे सांगून आपला आदर्श त्याच्या पुढे ठेवला. हळूहळू आपल्या भगवंत रूपाची जाणीव करून दिली. निर्गुण निराकार असून जगाची उत्पत्ती, स्थिती, लय करणारा, भक्तांचा योगक्षेम चालविणारा, सृष्टीचे चक्र चालवणारा, सर्वांचे गंतव्य स्थान मीच आहे. सर्व व्यापकत्व स्पष्ट केले. विश्वरुप दाखवले. दैवी गुणांचे श्रेष्ठत्व पटवून दिले. स्थितप्रज्ञ, जीवनमुक्त, ज्ञानी भक्त यांचे आदर्श त्याच्या समोर ठेवले. त्यामुळे मोहाच्या पलीकडे जाऊन अर्जुन युद्धाला तयार झाला. तशी कबुली त्याने दिली. गीतोपदेशाचे सार्थक झाले. सर्वांसाठी सर्वकाळी अमर असा हा उपदेश, युद्धभूमीवर केवळ ४० मिनिटात श्रीकृष्णाने अर्जुनाला केला. आणि ‘यथेच्छसि तथा कुरु’ असे स्वातंत्र्य ही त्याला दिले.

आपल्याही जीवनात असे मोहाचे प्रसंग येत असतात खरं पाहता आपण सारे अर्जुन आहोत. तेव्हा प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण आपल्यासमोर नसले तरी हृदयात आहेत, मार्ग दाखवण्यास सज्ज आहेत, त्यांची गीता समोर आहे. तिचा आधार घेऊन जीवनाचे सूत्र त्या श्रीकृष्णाच्या हाती देवून संकट मुक्त व्हावे. अशी ही गीता म्हणून भगवंतांची वाङ्मय मूर्ती होते. साधकाने जीवन कसे जगावे सांगणारी जीवन गीता.

शंकराचार्य गीता महात्म्यात म्हणतात, ‘ सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नंदन:l पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्ll उपनिषद या गायी, श्रीकृष्ण हा दोहन करणारा गवळी, अर्जुन गीतामृत पिणारे वासरू. हा दृष्टांतच गीता ही श्रीकृष्णाची वाङ्मयमूर्ती आहे सांगायला पुरेसा आहे. गीता ही श्रीविष्णूच्या मुखकमलातून निघालेले शास्त्र आहे. त्यामुळे इतर शास्त्रांच्या अभ्यासाची गरज नाही. हेच सर्व शास्त्रांचे शास्त्र. खचलेल्या मनाला उभारणी देणारं, मन बुद्धीचा समन्वय साधणार मानसशास्त्र आहे. योग्य सात्विक आहार व त्याचे फायदे सांगणार आहारशास्त्र आहे. युक्त आहार, विहार, झोप आणि जागृती यांचे फायदे सांगणारे आचरण शास्त्र आहे. नेत्यांची जबाबदारी आणि समाजातील सर्व घटकांना त्यांची कर्तव्य सांगणारं, सर्व जाती, धर्म, स्त्रिया यांना समान लेखणारं समाजशास्त्र आहे. पंचभूतात्मक सृष्टीचे ज्ञान करून देणारे विज्ञान शास्त्र, ‘उतिष्ठ, युद्धस्व’ सांगून प्रसंगाला धैर्याने तोंड देण्यास सांगणारे विवेक शास्त्र आहे. तसेच सर्वाभूती ईश्वर सांगणारे समत्व शास्त्र आहे आणि सर्वात मुख्य म्हणजे आत्मज्ञान करून देणारं आत्मशास्त्र आहे. सर्व योगही कर्म, ज्ञान, भक्ती येथे एकोप्याने नांदतात. कारण व परिणाम सूत्र पद्धतीने मांडले आहेत. कोणतीही सक्ती नाही. अंधश्रद्धा नाही. पण शास्त्राप्रमाणे कर्तव्य करायचा आग्रह आहे. अर्जुनाचे दोष सांगण्याचा स्पष्टपणा आहे आणि स्वतःचे कर्तव्य ही सांगितले आहे. स्वतः केले, आचारले मग सांगितले असा हा उपदेश. अर्जुनाच्या मनात कधीही परत संभ्रम होऊ नये असा रामबाण उपाय. सर्व द्वंद्वातून मुक्त करून नराचा नारायण करणारा हा संवाद. वरवर प्रासंगिक वाटला तरी तसा नाही. सर्वकाली, सर्व जगाच्या कल्याणाचा आहे. श्रीकृष्ण योगेश्वर अर्जुनाचे निमित्त्य करून सर्व जगाचे साकडे फेडतात. कर्म बंधनात न अडकता कर्म करण्याची वेगळी दृष्टी जगाला देतात. कर्म हीच पूजा झाली. ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरीत म्हणतात, ‘म्हणौनि मज काहीl समर्थनी आता विषो नाही l गीता जाणा हे वाङ्मयीl श्रीमूर्ति प्रभूचीll (ज्ञा. १८/१६८४)

अशी ही गीता ५००० वर्षे झाली तरी तिचे महत्त्व कमी झाले नाही. सर्व काळी सर्व लोकांना ती मार्गदर्शक आहे. सर्व मानव जातीच्या कल्याणासाठी आहे. मानवाच्या आयुष्यातील कसोटीच्या वेळी योग्य मार्गदर्शन करणारा हा ग्रंथ म्हणजे भारताची वैचारिक संपत्तीच आहे. अन्यायाविरुद्ध लढण्याचे सामर्थ्य, धैर्य देणारी गीता हातात घेऊन अनेक क्रांतिकारकांनी प्राणांचे बलिदान केले. यशाची प्रेरणा देणारी तीच आहे. म्हणून अनेक खेळाडूही यशाचे कारण गीता सांगतात. कितीतरी विद्वान, तत्वज्ञानी, शास्त्रज्ञ गीतेचा अभ्यास करतात व केला आहे. देशी-परदेशी विद्वानांवर तिचा प्रभाव आहे. विविध भाषेत भाषांतर होत आहे. झाली आहेत. असे हे अध्यात्म प्रधान, नीतिशास्त्र भारताचा राष्ट्रीय ग्रंथ आहे. अभिमानाने गीता ग्रंथ आपण परदेशी पाहुण्यांना भेट देतो. पंतप्रधान मोदींनी ही पद्धत सुरू केली. कारण गीता ही प्रत्यक्ष भगवंताची वाङ्मयमूर्ती!

©  सौ. शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जरी आंधळा मी ! ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

? जीवनरंग ?

जरी आंधळा मी ! श्री संभाजी बबन गायके 

जन्माला झाली असतील पंधरा-सोळा वर्षं. जातीवंत आईच्या पोटी जन्मलो तेव्हा सर्वांनाच आनंद झाला होता. वीसेक एकर शेती, शिवाय इतरांची कसायला, अर्धलीनं घेतलेली तेवढीच शेती…   माझ्या येण्याने शेत-शिवार आणखी फुलून यायला मदतच होणार होती….    लेकरं चार घास आणखी मिळवणार होती.

आईनं दुधाला कमी पडू नाही दिलं. अंगी बळ वाढत होतं आणि लवकरच शेतावरही जाऊ लागलो. माझे मोठे डोळे, काळेभोर. त्वचेवर पांढ-या ढगांची जणू पखरण झालेली. दमदार चाल आणि बैजवार चालणं…   कुणाच्या अंगावर जायचं नाही आणि कुणी अंगावर आलंच तर त्याला आईचं दुध आठवावं असा माझा प्रतिहल्ला…  बाहेरचे शहाणे माझ्यापासून त्यामुळे थोडे अंतर ठेवीत असत. मात्र घरातले सर्व माझ्या अगदी अंगाशी खेळणारे..  लहान मुलं तर माझ्याभोवती निर्धास्त खेळत.

फार काही अंगाला झोंबलं, लागलं, दुखलं म्हणून कधी डोळ्यांतून एक टिपूस पाणी नाही आलं कधी…   पण एके दिवशी उजव्या डोळ्याला धार लागली. डोळ्यांत काहीबाही जातं शेतात कामं करीत असताना म्हणून मी आणि सगळ्यांनीच ही गोष्ट डोळ्याआड केली….    कामाचा धबडगाच इतका असतोय रानात….    आजारा-बिजाराला आणि त्यांचे कोड पुरवायला शेतक-याला कसली आली सवड?

पण मोठ्या दादांच्या ध्यानात आलं दोनच दिवसांत. काहीतरी गडबड आहे म्हणाला…   डॉक्टर साहेबांकडे लगोलग घेऊन गेला. “डोळा वाचणार नाही!” मी ऐकले आणि दादाने सुद्धा. पण माझ्याआधी त्याच्याच डोळ्यांत काळजीचं आभाळ दाटून आलं. डॉक्टर म्हणाले, ”कुठं खर्च करीत बसता! बघा काय निर्णय घेताय ते…   पण याला सांभाळत बसावं लागेल घरीच ठेवलं तर!”

तसं दादा लगबगीने म्हणाले, ” हा आमचाच आहे..  आमचाच राहील. सांभाळू की घरच्या घरी. काय खर्च व्हायचा तो करू…   पण याचा हा डोळा वाचतोय का बघा…   दुसरा डोळा आहेच की अजून शाबूत. ” 

डॉक्टर साहेबाचं मन ओलं झालं…   ”तुम्ही एवढी नुकसानी पदरात घेताय…   तर माझा पण शेर असू द्यात की या कामात. माझी फी बी काही नको. करून टाकू आपण जे काही गरजेचे असेल तेवढं!’ 

मी माझ्या चांगल्या डोळ्याने त्या दोघांकडे एकवार पाहून घेतलं….    दुसरा डोळा त्याच मार्गाला जाणार असं मला आपलं वाटून गेलं! 

दुखलं खूप तो डोळा डॉक्टर टाके घालून शिवत होते तेंव्हा….    पण या देहाला सवय होती सोसायची…   जन्मच तसा दिलाय देवानं…   करणार काय? 

घरी आलो…   पण खूप दिवस बसून राहणं मनाला पटेना. उभारी धरली आणि कामाला जुंपून घेतलं स्वत:ला..  जमेल ते करीत राहिलो…   एका डोळ्याने अजिबात दिसत नाही हे पार विसरून गेलो. देवाची पण काय करणी पहा…   महत्त्वाच्या चीजा एक एक जास्तीच्या दिल्यात त्यांनं…   एक निसटलं तर दुसरं हजर. बघा ना, दोन-दोन कान, दोन-दोन डोळे!

पण हे दान मला नाही पुरलं…   वर्षभरात दुस-याही डोळ्याने पहिल्या डोळ्याची वाट धरली! आता तर कुणाचा काही इलाज असेल असं वाटावं अशी हिंमतच नाही उरली काळजात. पण याही वेळेस दादा, डॉक्टर आणि इतर सर्वच माझ्या पाठीशी उभे राहिले. राहू द्या…   एका कोप-यात पडून राहील जन्मभर…   आम्ही खायला-प्यायला घालू…   शेतकरी आहोत…   घासातला घास देऊ! आमच्यात घरातल्यांना वृद्धाश्रम दाखवला जात नाही…..     उद्या आपली सुद्धा तीच गत होते…   म्हणून आपलं म्हणून जे कोणी आहेत त्यांना घरात आणि उरात जागा करून द्यायची रीत मातीत पावलं रुतवून असणा-या कृषीवलांची.

याही वेळी कुणीच माझ्या दादाकडून एक नवा पैसा घेतला नाही. पुण्य करण्याची अशी एखादी लहानसहान संधी चांगली माणसं बरी सोडतील….    मोठं पुण्य करण्याची ताकद देव देईल तेंव्हा देईल! 

आता उरलेला उजेडही माझ्यासाठी परका झाला…   आणि मी हिरव्या शेताला पोरका झालो….    मातीला पारखा झालो!

दादांची आई होती म्हातारी झालेली. तिने तिच्या सुरकुत्या पडलेल्या हातांनी मला घास भरवले…   बाकीची कामांत गुंतले असताना ही माऊली या तिच्या नातवाला गोंजारत राहिली…   दुखलं-खुपलं पाहू लागली. आणि माझ्याही नकळत मी तरुण झालो..  धष्टपुष्ट बनलो! माझा मी मला पाहू शकणार नव्हतो शेतातल्या पाटात वाहत असलेल्या पाण्यात माझं प्रतिबिंब पडेल पण मी पाहू शकणार नव्हतो….    हो…   दादाच्या डोळ्यांनी मात्र पाहीन..  त्याने शेतात नेलं तर.

एखाद्या लहानग्या पोरांचं करावं तशी माझी काळजी घेतली गेली. येणारे-जाणारे पाहुणे मला बघायला यायचे..  आणि कुणी काही, कुणी काही म्हणून जायचे. या बिनाकामाच्याला नुसतं सांभाळून होणार तरी काय? असा सर्वांचा सवाल होता…   आणि त्यात काहीही खोटं नव्हतं! 

दुसरं कुणी असतं दादाच्या जागी तर माझी रवानगी एव्हाना झालीही असती आणि माझ्या खुणा कायमच्या पुसल्या गेल्या असत्या या जन्माच्या सारीपाटावरच्या! 

गिधाडं आभाळात घिरट्या घालून घालून थकली….    पण मी कोसळून पडलो नाही. कारण बाकीचे अवयव शाबूत..  बुद्धी जागेवर..  आणि मनाची तयारी भरभक्कम होती. एखाद्या चित्रातील सुंदर चेह-यावर चित्रकार डोळे रंगवायचे विसरून गेला असावा..  तशी त-हा! 

जागच्या जागी बसून राहणे…   माझ्यासाठी चांगले नव्हते आणि मलाही ते नकोच होते. शरीर धडधाकट आहे…   का नाही काम करायचं? त्याच्या मनात नसूनही दादाने माझ्या खांद्यावर थोडं ओझं टाकून पाहिलं…   मी नको म्हणालो असतो तर त्याने जबरदस्ती नसती केली…   माझी खात्री आहे! 

पण इतक्या दिवसांच्या आरामाने स्नायू जरा आळसावलेले होते..  त्यांना सरळ करायला पाहिजेच की. लागलो कामाला. इतका का हळूहळू मी आणि सारेच विसरून गेले…   मी दोन्ही डोळ्यांनी आंधळा आहे ते! 

डोळ्यांना माती दिसत नसली तरी पावलांना तिची ओळख आधीपासूनची. पण जराशी पावलं चुकली की थांबायचो…   मग दादा म्हणायचा…   सोन्या…   जरा थोडा इकडं सर…   पलिकडं हो…   थांब…   आणि आता चल! बास…   हे चारच शब्द पुरू लागले…   मी आपसूक योग्य रस्ता धरून चालू लागलो. मजबूत खांद्यांना ओझ्याची तमा नव्हती…   पाठीवर दादाचा राठ पण प्रेमाचा हात पडला की दिसत नसलेलं आभाळ समोर येऊन उभं ठाकायचं…   आभाळातली गिधाडं मला तर केंव्हाच विसरून गेली असतील! 

घरातल्या लग्नांना जाताना मी सोबत असायचो…   खळाळून हसणा-या कलव-या, नटलेली बाया माणसं…   नाचणारी पोरं..  आणि लाजणा-या नव्या नव-या…   सारं काही अनुभवलं या शिवलेल्या डोळ्यांमधून….    दिवस गोडीने आणि जोडीने पुढे पुढे चालत होते…   माझ्यासारखे!

दादाचा संसात वाढत गेला…   खाणारी तोंडं वाढत गेली आणि माझं शेतातलं काम सुद्धा. मग कधी दुस-याच्या शेतावर जाऊ लागलो…   वाट दावायला सर्व होतेच सोबत. मला काही पाहण्याची गरज उरली नव्हती. खाल्लेल्या घासाला जागायचं म्हणून जगायचं होतं…   शेवटापर्यंत…   दादाच्या जवळ..  त्याच्या वावरात…   त्याच्या अंगणातल्या झाडाखाली!

खूप दिवस…   नव्हे खूप वर्षे उलटून गेली की माझे काळीज अंधारून गेले होते त्या गोष्टीला…   आता शरीर थकलं! दादाने मला आता शेतावर नेणं बंद केलंय…   पण घरी मन रमत नाही….    धाकल्या-थोरल्या भावंडांना इतरांनी मारलेल्या हाका ऐकल्याशिवाय गमत नाही! मला जायचं असतं…   दादासोबत शिवारात…   पण दादा नको म्हणतोय! किती केलंस आमच्यासाठी…   आता पुरे झालं की रं मर्दा! सुखानं पडून रहा…   गळ्यातल्या घाटी हलवत हलवत…   तो आवाज घुमू दे अंगणात, घरात! नातवंडं-पतवंडं खेळतात की तुझ्या नजरेच्या पहा-यात! 

शेवट दिसत नसला तरी जाणवतोय हल्ली….    देहातली शक्ती क्षीण झालीये…   पैलतीर दिसतो आहे! 

दादा कुणाला तरी सांगत होता…..     याचा देह मातीत गेला तरी याची समाधी बांधीन….    याला नजरेसमोरून हलून देणार नाही….    मी असेतोवर! 

हे ऐकून डोळ्यांच्या आत पाझारलेली आसवं…   थेट काळजात घुसली…   आणि काळीज ओलं ओलं झालं! देवा…   मी गेल्यावर डोळे भरून पाहण्याची एकवार मुभा देशील मला…   माझ्या या शेतकरी दादाला पाहण्याची? 

(गोवंश हा आपल्या मातीचा खरा आधार. आईच्या आणि गाईच्या पोटी जन्मलेलं प्रत्येक लेकरू शेतक-यास प्राणाहुनी प्रिय. सोलापूर जिल्ह्यातल्या मोहोळ तालुक्यातील वाळूज गावात एक शेतकरी दादा राहतोय…   शेती कसतोय. त्यांचं नाव…   इंद्रसेन गोरख मोटे. त्यांच्या कपिलेने एका खोंडाला जन्म दिला. दोन वर्षात हा सोन्या औतकाठीच्या कामाला आला. पण दुर्दैवाने त्याचा एक डोळा निकामी झाला. लोकांनी हा बैल बाजारात विकून टाकण्याचा व्यवहारी सल्ला दिला. पण दादांनी सोन्याला विकले नाही. कालांतराने सोन्याने दोन्ही डोळे गमावले. आता तर सोन्याची कसायाच्या कत्तलखान्यात रवानगी होणं निश्चित होतं..  पण इंद्रसेन आणि त्यांच्या कुटुंबाने सोन्याला शेवटापर्यंत सांभाळण्याचे ठरवले आणि ते करूनही दाखवले. दोन्ही डोळ्यांनी दिसत नसूनही सोन्याने शेतीच्या कामांत प्रचंड कौशल्य कमावले! दादांच्या एका शब्दावर त्याला नेमकं कुठं वळायचं, चालायचं, थांबायचं हे सर्व समजू लागलं…   आणि दादांचा संसार चौखूर चालला! 

 सोन्यावर उपचार करणा-या सर्व डॉक्टर साहेबांनी बहुतांशी मोफत उपचार करून मानवतेचा धर्म पाळला. हा सोन्या आता म्हातारा झाला आहे. सोन्या आज न उद्या हे जग सोडून जाईल…   प्राण्यांची आयुष्ये तशी कमी असतात….    पण दादा सोन्याचे स्मारक बांधणार आहेत…   त्याच्या स्मृती जपणार आहेत! महाराष्ट्र टाईम्सच्या इरफान शेख यांनी या सोन्याची आणि त्याच्या शेतकरी मालकाची एक सुंदर विडीओ बातमी केली आहे. ही बातमी पाहून मी सोन्या झालो…   आणि हे शब्द सुचले…… 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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