वह बहुत गरीब था किन्तु जैसे तैसे कर उसने ग्रेजुएशन कर राज्य सिविल सेवा में अधिकारी का पद पा लिया था। उसने सरकारी नौकरी में आने से पहले यह शपथ ली थी कि वह तन-मन से देश की सेवा करेगा और मजलूमों का सहारा बनेगा, पूरी मेहनत से अपने कर्तव्य को अंजाम देगा।
अब प्रदेश के जिलों संभागों में नौकरी करने के बाद उसकी पदस्थापना मंत्रालय में हो गई। वह मेहनत तो बहुत करता किन्तु मंत्रालय का कल्चर जिला और संभाग के कल्चर से अलग ही होता है क्योंकि यहां प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री और शीर्षस्थ अधिकारियों का राज होता ही है बल्कि यहां तो छुट भैया नेताओं का भी राज होता है, उनका कहना मानना भी नौकरी का एक हिस्सा होता है, वह भी डरते डरते मंत्रालय के कल्चर में ढल रहा था और यहां कि बारीकियां भी कुछ हद तक सीख गया था। किन्तु अभी तक वह ढर्रे में ढल नहीं पा रहा था। वह यहां के कल्चर में भी डेड ईमानदार बने रहना चाहता था किन्तु किन्तु किन्तु…
उसकी पत्नी आए दिन उसे ताने मारती और कहती देखो तुम्हारे साथ के लोगों ने कितनी तरक्की कर ली है उनके पास खुद का मकान है फार्म है गाड़ियां है नौकर चाकर है लड़के बच्चों के लिए अलग से कारें और रोजगार है पर तुम्हारे पास क्या है एक खटारा गाड़ी उसमें भी कभी कभी धक्का लगाना पड़ जाता है सोचो रिटायरमेंट के बाद क्या किराये के घर में ही रहोगे। अभी भी समय है कुछ कर गुजरों जिससे बुढ़पा आराम से कट जाए। वह विचार करता किन्तु कर कुछ नहीं पाता। वह पत्नी के बातों से तंग आकर कभी कभी कुछ कुछ सोचने लगता।
एक दिन उसकी पत्नी ने कहा ’देखो जी टाॅमी को कितनी गर्मी लग रही है इसकी कुछ व्यवस्था करो।’ उसने कहा ’अभी तनख्वाह नहीं हुई है हो जाएगी तो एक पंखा खरीद लायेगें।’ इस बात पर उसकी और पत्नी में बहुत बहस हुई।
वह आफिस तो आ गया पर वह बहुत ही उखड़ा हुआ था। आफिस का बड़ा बाबू बड़ा ही घाघ था वह उसकी स्थिति को देखकर समझ गया कि साहब आज किसी बात से बड़े परेशान है। वह लोगों से कहता था कि मैं इस मंत्रालय की दाई हूॅ मुझसे कुछ छुप नहीं सकता। उसकी चिड़चिड़ाहट को देखकर आफिस के बड़े बाबू ने उससे पूछा ’क्या बात है सर यदि किसी बात से परेशान है तो मुझे बताईए मैं हल करने की कोशिश कर आपकी परेशानी खत्म कर दूंगा। ’ बड़े बाबू की आत्मीयता उसे पहले दिन से ही प्रभावित कर रही थी। बड़े बाबू के प्यार भरे शब्द सुनकर उसने बड़े बाबू को सारी बात विस्तार से बताई। इस पर बड़े बाबू ने कहा ’सर मैं आपके घर दो ए.सी. भिजवा देता हूँ एक आप उपयोग कीजिए और दूसरा टाॅमी के लिए लगवा दीजिए।’
’टाॅमी के लिए ए.सी…।’
’हाँ सर, ए.सी.।’
’पर ऐसा होगा कैसे, हम रिकार्ड में क्या शो करेंगे’ उसने कहा। तब बड़े बाबू ने बड़े ही इत्मीनान से कहा – ’आप बिल्कुल चिन्ता न करें सर, एक ए.सी. मंत्री जी के यहां तथा दूसरा ए.सी. बड़े साहब के घर में लगा हुआ रिकार्ड में शो कर देंगे, न मंत्री से कोई पूछ सकता है और न ही बड़े साहब से।’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपका गीत – बसंत।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के दोहे – महाकुंभ । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नागरिक शास्त्र…“।)
अभी अभी # 599 ⇒ नागरिक शास्त्र श्री प्रदीप शर्मा
बचपन में मैं एक मंद-बुद्धि छात्र था। घर में दादा जी के कल्याण विशेषांक पड़े रहते थे, सो शास्त्र शब्द से परिचित था। जब नागरिक शास्त्र का नाम सुना तो आश्चर्य हुआ कि नागरिकों के लिए लिखा गया शास्त्र बच्चों को क्यों पढ़ा रहे हैं? बाद में मास्टरजी ने मेरी अलग से क्लास लेकर नागरिक शास्त्र का मतलब समझाया।
हमने नागरिक शास्त्र भी पढ़ा और सामाजिक अध्ययन भी, क्योंकि कोर्स में था। तब समझने की उम्र नहीं थी। परीक्षा के लिए पढ़ते थे। पानीपत की पढ़ाई और प्लासी के युद्ध की तारीख तक याद करनी पड़ती थी। नागरिकों के अधिकार और कर्त्तव्य, मताधिकार और चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार की योग्यता में यह भी अनिवार्य था कि वह पागल और दिवालिया न हो। आज लगता है, दुनिया पागल है, या फिर में दीवाना।।
कॉलेज में जाकर फिर वही सब समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, कानून की पढ़ाई और एमबीए में मानव संसाधन के अंतर्गत आ गया। लोकतंत्र और संविधान की आत्मा की चिंता जब एकदम बढ़ जाती है, तो आम आदमी सोचने लग जाता है कि ऐसा क्या हो रहा है, जो उसने कहीं नहीं पढ़ा। कहीं सिद्धांत और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर तो नहीं।
कॉलेज में अर्थ-शास्त्र और राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले साईकल पर आते थे, और व्यापारियों और नेताओं के पुत्र स्कूटर, मोटर सायकिल और जीप में। छात्र-संघ के चुनाव में राजनैतिक पार्टियों के लोगों का भी आना जाना लगा रहता था। कुछ छात्र केवल राजनीति करने आते थे। परीक्षा में चाकू की नोक पर नकल करते थे, फिर भी पास नहीं हो पाते थे। अगर पास होते रहते, तो कॉलेज छोड़ना पड़ता। प्रोफ़ेसर भगवान से प्रार्थना करते थे, कि ऐसे छात्र पास हो जाएं, तो मिठाई बाँटें।।
जो ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाए वे नेता और वकील बन गए। अच्छे वाद-विवाद और परिसंवादों में भाग लेने वाले पत्रकार बन गए, जो अच्छी गालियाँ बक लेते थे, वे पुलिस में चले गए। बाकी जो बचे, वे बैंक, एलआईसी और शिक्षा विभाग में सेटल हो गए।
आज संविधान और लोकतंत्र पर एक अनजान खतरा मंडरा रहा है। बंद, हड़ताल, धरने और सत्याग्रह का आदी यह देश विरोध और असहमति को नहीं पचा पा रहा। हमारे दिवंगत समाजसेवी शेर जॉर्ज आज की परिस्थिति में रेल के पहिये छोड़, किसी साधारण फैक्ट्री में हड़ताल भी नहीं करवा सकते थे। आज इंकलाब जिंदाबाद और बोल मजूरा हल्ला बोल, बोलने वाला वामिया कहलाता है। लाल झंडे को सलाम करने वाला अर्बन नक्सल कहलाता है।।
सुप्रीम कोर्ट में और संसद में संविधान पर बहस होती है। न्यूज़ हेड-लाइन्स बनती है, लोकतंत्र खतरे में ! आम आदमी सोचता है कि आखिर उसने ऐसा क्या कर डाला कि संविधान और लोकतंत्र खतरे में पड़ गया। उसे तो अपनी रोजी रोटी और बाल-बच्चों से ही फुर्सत नहीं। सरकार के अनुसार तो, सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। रेडियो, अखबार, सोशल मीडिया और स्वयं प्रधान सेवक इसके गवाह है। मतलब यह सब, भ्रष्टाचारियों, काला-बाज़ारियों और विपक्ष का किया धरा है।।
अब आपातकाल की घनघोर निंदा करने के बाद, सरकार देश में इमरजेंसी तो घोषित करने से रही। बस जो राज्य देश में अस्थिरता फैला रहे हैं, देशद्रोहियों का साथ दे रहे हैं, वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाकर पुनः चुनाव करवा सकती है। कांग्रेस भी तो यही करती आ रही है। आम आदमी तो नोटा का बटन दबाकर भी बदनाम ही हुआ जा रहा है। वह तो सरकार को माई-बाप समझकर, जिसको कहेगी, उसको वोट दे देगा। वह तो यह सोचकर ही डर गया है कि फलाना नहीं तो कौन।
इधर देश बेचने की अफवाह भी चल रही है। विपक्षी यह भी नहीं बता रहे कि किसको बेचने वाले हैं। अब तक एक पार्टी को आँख मूँदकर वोट देते चले आए, कुछ साल किसी और को भी देकर देख लेते हैं। एक वोट का ही तो सवाल है। एक नागरिक, शास्त्र पढ़ सकता है, लेकिन संविधान तो विशेषज्ञों का काम है। वह तो रोज मंदिर जाता है, और जहाँ भी कुम्भ और महाकुंभ होता है, वहाँ जाकर एक डुबकी लगाकर अमृत की कुछ बूंदों से कृत-कृत्य हो जाता है। जब तक एक नागरिक की ईश्वर में आस्था है, हमारा देश सुरक्षित है। अब अंधों में काना राजा देश चलाते आया है, आज भी विपक्ष में सब अँधे हैं। नागरिक शास्त्र तो यही कहता है।।
☆ व्रतोपासना – १०. काय काय करावे ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆
आतापर्यंत आपण बऱ्याच गोष्टी बघितल्या. त्यात काय करू नये हे विशेषतः सांगितले होते. आज आपण काय करावे यावर लक्ष देऊया. या गोष्टी आपण रोजच आचरणात आणल्या तर त्याचा स्वतः सहित सर्वांनाच फायदा होणार आहे. उपनिषदामध्ये एक थोर वचन आहे. या विश्वातील वस्तुमात्र ईश्वराने व्यापलेले आहे. त्यामुळे त्यागपूर्वक (जीवनावश्यक) भोगाचा स्वीकार करावा. कोणत्याही धनाचा लोभ करू नये हा सिद्धांत म्हणजे भारतीय संस्कृतीचा पाया आहे. त्याग पूर्वक भोग आणि लोभाचा त्याग यामुळे आपले जीवन समृद्ध बनू शकते. त्यासाठी मनाचे सामर्थ्य वाढवावे लागते. आपल्या बलवंत मनाला अंतर्मुख बनवण्यासाठी व्रते फार महत्त्वाची असतात. व्रत म्हणजे निश्चयाने सतत अखंडपणे करायची कृती. त्यासाठी निष्ठा धैर्य सहनशीलता असे गुण असावे लागतात.
आत्ता पर्यंत आपण सोपी व्रते बघितली. आजही सहज अंगीकार करता येतील अशी व्रते बघू या. यात रोज आचरणात आणण्याची व्रते आहेत.
१) रोज व्यायाम करणे. ज्याला जो जमेल त्याने तशा पद्धतीने करणे. रोज प्राणायाम करणे.
२) रोज ध्यान करणे.
३) चेहेऱ्यावर एक स्मितहास्य कायम असावे. त्यामुळे बघणाऱ्या व्यक्तीला आनंद मिळतोच. पण याचा फायदा आपल्याला जास्त होतो. हसण्या मुळे शरीरात एंडॉरफिन नावाचा अंतस्त्राव स्त्रवू लागतो. तो पेनकिलरचे काम करतो.
४) कायम वर्तमानात रहावे. काल काय झाले हे आठवू नये.आणि उद्या काय होणार याचीही चिंता करु नये.
५) प्रत्येक घटना, व्यक्ती यातील सकारात्मकता शोधून त्याकडे लक्ष द्यावे. आणि सकारात्मक बोलावे.
५) जमेल तेवढे कोणत्याही स्क्रीन पासून लांब रहावे. आवश्यक तेवढाच वापर करावा.
६) सामाजिक संपर्क ठेवावा. त्यामुळे आपली मनस्थिती नक्कीच बदलते.
७) तुलना करण्या पासून लांब रहावे. कोणाचीच कोणाशी अगदी स्वतःची सुद्धा इतर कोणा बरोबर तुलना करू नये.
८) अपेक्षा फक्त स्वतःकडून ठेवावी. साधारणपणे अपेक्षा दुसऱ्या व्यक्ती कडून ठेवली जाते. आणि अपेक्षा या शब्दाला जोडून येणारा शब्द बहुतांशी भंग हा असतो. आणि अपेक्षा भंग झाला की त्याच्या बरोबर दुःख, मानसिक ताण येतोच.
९) शक्य तेवढा आनंद द्यावा. आपण जे जे दुसऱ्याला देतो ते आपल्याकडे कित्येक पटींनी परत येते. आनंद हवा असेल तर तो वाटावा. म्हणजे सगळेच आनंदी राहतील.
१०) महत्त्वाचे म्हणजे यातील जमतील तेवढी व्रते अंगीकारण्याचा प्रयत्न करावा.
व्रते वैकल्ये कायमच असतात. फक्त त्या त्या काळानुसार त्यात बदल होत असतो. त्याप्रमाणे आजच्या काळाला अनुकूल व अनुरूप अशी काही व्रते सांगितली आहेत अर्थात हे माझे विचार आहेत. पण त्याचा फायदा मात्र नक्कीच आहे.
(“ध्येय आणि जिद्द असली की सगळं जमतं. रमेशचंच बघा ना!किराणा दुकानात साफसफाईचं आणि पुड्या बांधण्याचं काम करणारा रमेश आज क्लास वन ऑफिसर झालाय. ते या जिद्दीमुळेच ना?”) – इथून पुढे —
बैठकीत शांतता पसरली. कुणाला काय बोलावं ते सुचत नसावं. तेवढ्यात आतून शैला वहिनी बाहेर आली
“पण भाऊजी मी काय म्हणते….. “
“एक मिनिट शैला वहिनी. बायकांनी या प्रकरणात सहभागी होऊ नये असं मला वाटतं.
याच कारणास्तव आपण सुरेखा वहिनीला बोलावलेलं नाही. खरं ना?”
शैला वहिनी चुप बसली. मी पुढे बोलू लागलो
“आणि हा जो मी निवाडा केलाय तो फक्त दोन्ही भावांत भांडणं होऊ नये, गोष्टी कोर्टकचेऱ्यांपर्यंत पोहचू नयेत याचकरीता. शेवटी निर्णय बापूकाकांना घ्यायचा आहे “
” योग्य निवाडा केलाये तुम्ही वकीलसाहेब. बापू आता जास्त ताणू नका. मृत्युपत्र ताबडतोब बनवून घ्या. आमच्या सह्या घ्या आणि सगळ्यांना मोकळं करा “एक प्रतिष्ठित बोलले.
” ठिक आहे जयंता बनवून घे मृत्यूपत्र” बापूकाका माझ्याकडे बघत म्हणाले तसा मी माझ्या असिस्टंटला इशारा केला. तो लगेच कारमधून लॅपटाॅप आणि प्रिंटर घेऊन आला. मृत्यूपत्र बनलं. बापूकाकांनी आणि दोन्ही प्रतिष्ठित व्यक्तींनी साक्षीदार म्हणून सह्या केल्या.
” उद्या तालुक्याला जाऊन हे मृत्यूपत्र रजिस्टर करुन घ्या. मी माझ्या माणसाला पाठवतो. तो सर्व काही व्यवस्थित करुन घेईल ” मी बापूकाकांकडे पहात म्हणालो. त्यांनी आणि रमेशने होकारार्थी मान हलवली. बैठक संपली.
सगळे निघाले. मीही निघालो.
” चला येतो ” बाहेर उभ्या असलेल्या रमेश आणि योगेशकडे पाहून मी म्हणालो. नेहमी मला निरोप द्यायला बाहेर येणारी शैला वहिनी आज मात्र बाहेर आली नव्हती. मी मघाशी तिला बोलायची मनाई केली होती याचा कदाचित तिला राग आला असावा.
मी घरी पोहचलो. आज बैठकीत काय निर्णय झाला हे सुनंदाला सांगितल्यावर ती म्हणाली
“तुम्ही असा कसा काय निर्णय बदललात?इथून जाण्यापुर्वी तर तुम्ही योगेश भाऊजींनाच सर्व काही देऊन टाकू असं ठरवलं होतंत “
” हो सुनंदा. मी तसंच ठरवलं होतं. पण गावाच्या अलीकडे माझा मित्र शरद मला भेटला. त्याने मला योगेशबद्दल जे सांगितलं ते ऐकून मी माझा हा निर्णय लांबणीवर टाकायचं ठरवलं. तो सांगत होता की योगेश शेतीकडे लक्ष देत नाही. तो सध्या गावातल्या राजकारणात जास्त रस घेतोय. नदीकाठच्या मंदीराजवळ तो आणि त्याचे हे राजकारणी मित्र कामंधामं सोडून दिवसभर एकतर चकाट्या पीटत असतात नाहीतर पत्ते खेळत बसलेले असतात. योगेशला आता सरपंच व्हायचे वेध लागले आहेत त्यामुळे तो या रिकामटेकड्या लोकांबरोबर भटकत असतो. या लोकांमुळेच त्याला गुटखा खाण्याचं आणि दारु प्यायचं व्यसन जडलंय”
“अरे बापरे!”
” शरद खरं बोलतोय का हे तपासण्यासाठी मी मुद्दामच मंदिराकडे गेलो आणि खरोखरच योगेश तिथे पत्ते खेळतांना सापडला. त्याला घेऊन मी त्यांच्या घरी गेलो. घराची अवस्था अजूनही वाईटच आहे. घराचे वाटेहिस्से करतांना ते कदाचित विकावं लागेल या भीतीने योगेशची घरासाठी खर्च करायची तयारी नाही हे शरदचं म्हणणं खरं ठरलं. संसाराला हातभार लागावा म्हणून सुरेखावहिनीने शैला वहिनीला महिनाभर आपल्याकडे ठेवून शिलाईचा क्लास लावून दिला. स्वखर्चाने तिला शिलाई मशीन घेऊन दिली. पण ती मशीन धुळ खात पडलीये. शैला वहिनी त्या मशीनकडे ढूंकून पहात नाही. रमेश आणि सुरेखा वहिनी योगेशच्या कुटूंबासाठी नेहमीच धडपड करत असतात. मदत करत असतात. पण योगेश आणि शैला वहिनी त्यांची किंमत ठेवत नाहीत हे माझ्या लक्षात आलं. म्हणून मी ठरवलं की योगेशला दया दाखवण्यात काही अर्थ नाही. इस्टेटीची वाटणी दोघांना समान करुन द्यायची म्हणजे भांडणाची शक्यताच उरणार नाही. तुला काय वाटतं मी योग्यच केलं ना?”
” तुम्ही म्हणता ते मीही बऱ्याचदा अनुभवलंय. ती सुरेखा नेहमी या दोघांची तक्रार करत असते त्यात तथ्य आहे म्हणायचं. तुम्ही योग्य तेच केलंत”
मृत्यूपत्र रजिस्टर्ड होऊन सोळा दिवसही होत नाहीत तर बापूकाका गेल्याची नकोशी बातमी
रमेशने फोन करुन मला दिली. मी सुनंदाला घेऊन गावी गेलो. अंत्यसंस्कार होण्यापूर्वी आणि झाल्यानंतरही योगेश माझ्याशी एक शब्दही बोलला नाही. बापूकाकांच्या जाण्याचं त्याला नक्कीच दुःख झालं असणार कारण रमेशपेक्षा तो त्यांच्या जास्त जवळ होता. शिवाय तो त्यांचा लाडकाही होता. दुसऱ्या दिवशी एका महत्वाच्या खटल्यात ऑर्ग्युमेंट असल्यामुळे मला नाईलाजास्तव घरी परतावं लागलं. सुनंदा मात्र तिथेच राहिली. तिसऱ्या दिवशीच्या धार्मिक विधीसाठी मात्र मी परत गांवी गेलो. दुपारच्या जेवणानंतर मी निरोप घेण्यासाठी योगेशकडे गेलो. “मी निघतो. काही मदत लागली तर कळव “असं त्याला म्हंटल्यावर त्याने फक्त होकारार्थी मान हलवली. मी आणि सुनंदा गाडीत बसून निघालो. थोडं अंतर गेल्यावर सुनंदा म्हणाली
” योगेश भाऊजी तुमच्याशी काही बोलले नाहीत वाटतं?”
” सध्या तो दुःखात असेल. बापूकाकांवर फार प्रेम होतं त्याचं “
” प्रेमबीम होतं ते ठिक आहे. पण दुःख्खबीख्ख काही नाही. आपला राग आलाय त्यांना”
” काय सांगतेस?”
” हो मग!बापूकाका त्यांना पुर्ण प्राॅपर्टी देणार होते आणि तुम्ही ती अर्धी करुन टाकली. मग त्यांना राग येणं स्वाभाविक आहे. ती शैलाही माझ्याशी तीन दिवसांत एक शब्दही बोलली नाही. मी काय घोडं मारलंय तिचं?तुम्ही तिला बैठकीत बोलू दिलं नाही त्याचा राग ती माझ्यावर काढतेय. सुरेखाही सांगत होती की योगेश भाऊजी आणि शैला दोघंही तिच्याशी बोलत नाहियेत. वाटण्या झाल्यावर शैला तिच्याशी फोनवर खुप भांडली. सुरेखाने तुमच्या मनात योगेशभाऊजींबद्दल काहीबाही भरवून दिलं असं तिचं म्हणणं होतं”
” कमाल आहे या लोकांची. भांडणं होऊ नये म्हणून दोघांना समान वाटे करुन दिले. तरी त्यावरुनही भांडणं करताहेत. बापूकाकांनी बोलावलं, त्यांनी निर्णय माझ्यावर सोपवला म्हणून मी मध्यस्थी केली. नाहीतर मला त्यांच्या भानगडीत नाक खुपसायचं काही कारण नव्हतं. असो. आता बापूकाका गेले. आता दोघं भाऊ भांडोत की प्रेमाने राहोत आपल्याला काय करायचंय “
नवव्या दिवशी रमेशचा फोन आला. दशक्रिया विधी, गंधमुक्ती आणि उदकशांतीच्या कार्यक्रमाला मला निमंत्रण देत होता. मी त्याला म्हंटलं
” रमेश खरं तर निमंत्रण देण्याचं काम योगेशचं आहे. पण तो आणि त्याची बायको आमच्याशी बोलतही नाही. मग आम्ही यायचं तरी कशासाठी?”
” दादा ते आमच्याशीही बोलत नाहीत पण म्हणून आपल्याला आपलं कर्तव्य तर टाळता येत नाही ना? तुम्ही माझ्याकडे बघून कार्यक्रमाला या. तुम्ही आला नाहीत तर बापूंच्याही आत्म्याला शांती मिळणार नाही “
त्याने असं म्हंटल्यावर माझा नाईलाज झाला. इच्छा नसतांनाही मी आणि सुनंदा कार्यक्रमाला जाऊन आलो.
बापूकाका जाऊन तीन महिने उलटून गेले. या तीन महिन्यात ना योगेशचा फोन आला ना रमेशचा. मीही आता सगळं आलबेल झालं या समजुतीने कुणालाही फोन करणं टाळलं. इस्टेटीच्या वादात स्वतःहून नाक खुपसणं म्हणजे मुर्खपणा असतो याचा मी अनेकदा अनुभव घेऊन चुकलो होतो.
एकदिवस संध्याकाळी सुरेखावहिनीचा फोन आला आणि मी धास्तावलो.
” हं. बोल वहिनी. आज बऱ्याच दिवसांनी आठवण काढलीस “
” हो भाऊजी. मला तुम्हांला हे विचारायचं होतं की आमच्या वाट्याची प्राॅपर्टी योगेश भाऊजींच्या नावावर करायला काय करावं लागेल?”
ते ऐकून मला धक्काच बसला.
” योगेशच्या नावावर?का गं?अचानक असा धक्कादायक निर्णय का?”
” खरं सांगू भाऊजी ह्यांना तर नाहीच नाही पण मलाही त्या प्राॅपर्टीत कसलाही इंटरेस्ट नव्हता. देवाच्या दयेने आमच्याकडे सगळं काही भरपूर आहे. मात्र बापूंनी आयुष्यभर ह्यांच्यावर जो अन्याय केला तो मला सहन होत नव्हता. ह्यांनी त्या घरासाठी इतकं काही केलं पण बापूंनी त्याची किंमत नाही केली. सतत लहान मुलाचे लाड केले. एखादा बाप असा दोन मुलात भेदभाव कसा करु शकतो या विचाराने माझा संताप व्हायचा. बघा ना त्यादिवशी तुम्ही मध्यस्थी केली नसती तर सगळी प्राॅपर्टी बापू योगेश भाऊजींना द्यायला निघाले होते. मग संताप येणार नाही तर काय?”
” तुझं म्हणणं बरोबर आहे. पण अर्धा हिस्सा मिळाल्यानंतर आता परत करायचं काय कारण?”
” भाऊजी परवा शैला आणि योगेशभाऊजी शैलाच्या तपासणीसाठी आमच्याकडे आले होते “
“का काय झालंय शैलाला? आणि ते तर तुमच्याशी बोलत नव्हते ना?”
“भाऊजी माणसावर संकटं आली की त्याची गुर्मी, ताठा गायब होतो. त्याला बरोबर नातेवाईक आठवतात. गावातल्या डाॅक्टरांना शैलाला ब्रेस्ट कँन्सरचा संशय होता. तो इथल्या डाॅक्टरांनी खरा ठरवला”
“ओ माय गाॅड!मग आता?”
“आता काय!तिला मुंबईला जावं लागणार आहे. केमोथेरपी सुरु करावी लागणार आहे. ऑपरेशन करावं लागेल. लाखो रुपये खर्च होतील. ते दोघं तर ते ऐकूनच खचूनच गेले आहेत. म्हणून मग मीच ह्यांना म्हंटलं की जाऊ द्या आपल्या हिश्शाची प्राॅपर्टी त्यांना परत देऊन टाका. अशीही ह्यांची प्रमोशनवर पुण्याला बदली झालीये. आम्ही सगळेच पुण्याला शिफ्ट होणार आहोत. आमचं असंही त्या प्राॅपर्टीकडे लक्ष देणं होणार नाही. मग कशाला तिचा मोह करायचा?”
“पण तरीही वाट्याला आलेली तीसचाळीस लाखाची इस्टेट अशी सोडून देणं तुम्हांला चुकीचं नाही वाटत?”
“असं बघा भाऊजी देव आपल्याला जन्म देतांनाच स्वभावगुणांची वाटणी करत असतो. कुणाला तो स्वार्थ, मत्सर, लोभ, बेजबाबदारपणा देतो तर कुणाला परोपकार, चांगुलपणा, निस्वार्थीपणा. देवाने अशी स्वभावगुणांची वाटणी करतांना ह्यांच्या वाट्याला प्रेम, दयाळूपणा, निस्वार्थीपणा, कर्तव्यपरायणता हे गुण दिलेत. मी माझी स्वतःची तारिफ करत नाही पण थोड्याफार प्रमाणात हेच गुण माझ्याही वाट्याला आलेत. मलाही दुसऱ्यांची दुःखं बघवत नाहीत. आणि कुणीही मदतीचा हात मागितला तर मलाही धावून जावंसं वाटतं. त्याच्या उलट शैला आणि योगेशभाऊजींच्या वाट्याला लोभीपणा, द्वेष, निष्क्रियता, दुसऱ्यांकडून फक्त घेण्याची प्रव्रुत्ती हे दुर्गुण दिलेत. जशी ही वाटणी होते तसा माणूस वागत असतो”
” हो बरोबर आहे तुझं. हो पण मग काय आता शैलाच्या ट्रिटमेंटचा खर्चही तुम्हीच उचलणार की काय?”
” हो. आमच्याकडून शक्य होईल तितका उचलू. काय करणार!शेवटी स्वभावाला औषध नसतं. बरं तुम्ही सांगताय ना ती प्रोसेस?”
मी तिला सगळं समजावून सांगितलं. सगळं कायदेशीर काम करुन देण्यासाठी माझ्या एका असिस्टंट वकीलाला पाठवण्याचंही कबूल केलं. तिनं समाधानाने फोन ठेवला तशी माझी नजर समोरच्या गणपतीच्या फोटोवर गेली. सुरेखावहिनीचे शब्द आठवले आणि माणसाला केलेल्या वाटणीसाठी मी देवाला मनापासून हात जोडले.
☆ ‘माझी शिदोरी…’ भाग-१७ ☆ सौ राधिका -माजगावकर- पंडित ☆
बुधवारातली खाऊगल्ली-
या परिसराचं प्रमुख आकर्षण म्हणजे ‘ बुवा आईस्क्रीमवाले ‘ .. मधुर,मुलायम चवीचं असं सुंदर आईस्क्रीम. आम्हा मुलांचं जीव की प्राण असलेल्या या दुकानाचे नाव ‘बुवा’ का ठेवले असेल? हे कोडं सोडवणं आमच्या बुद्धीपलीकडचं काम होत.आमच्यात तशी खूप चर्चाही व्हायची. शेवटी एकाने दिवे पाजळले, दुकानाच्या मालकांच्या भरगच्च मिश्यांमुळे ते ‘बागूल बुवा’ सारखे दिसतात म्हणून असं नाव ठेवलं असावं. पण काही म्हणा,हे ‘बुवा आईस्क्रीम वाले’ पुण्यात खूप प्रसिद्ध होते. धंदाही दणक्यात चालला होता.
लग्न मुंजीसाठी मुहूर्ताची पहिली अक्षत कसबा गणपती पुढे असायची. नंतर दुसरा मान होता जागृत ग्रामदैवत तांबड्या जोगेश्वरीचा. भर उन्हात कसबा गणपतीनंतर श्री जोगेश्वरीला अक्षत देऊन बाहेर पडल्यावर कोऱ्या साडीला खोचलेल्या चार बोटाच्या टिचभर रुमालाने घाम पुसत, नऊवारीचा बोंगा आंवरत, नथीचा आकडा सावरत वधू माय नवऱ्याला म्हणायची, “ काय बाई हे ऊन ! इश्य ! कित्ती उकडतंय ! अहो आपण आइस्क्रीम खाऊया का गडे ? ” गौरीसारख्या नटून थटून आलेल्या बायकोकडे बघून आणि तिच्या गोड बोलण्याला विरघळून नवऱ्याचं आईस्क्रीमच व्हायचं.आणि मग ती जोडी त्या गारव्यात शिरायची . आम्हाला त्यांच्यामागे दुकानात शिरावंस वाटायचं. पण फ्रॉकचा खिसा रिकामाच असायचा. मन मारून मग आम्ही प्रसादाचा, खडीसाखरेचा खडा मिळवण्यासाठी देवीच्या गाभाऱ्यात शिरायचो. आईस्क्रीमची किंमत चार आणे बाऊल होती. ते आम्हाला परवडणार नव्हतं. त्यापेक्षा फुकटची देवीसमोरची खडीसाखर परवडायची.’– दुधाची तहान ताकावर दुसरं काय ‘—-
टकलेआत्या नावाची आमची एक मानलेली आत्त्या होती.. त्यावेळची गर्भश्रीमंत, दागिन्यांनी नटलेली, आत्त्या कारमधून उतरली की आम्ही विट्टी दांडू फेकून जीव खाऊन पळत सुटायचो. कारचा दरवाजा उघडायला एकमेकांना ढकलत पुढे जायचो. ही आत्त्या आली की आमचा आनंद गगनाला भिडायचा, कारण श्रीमंत माहेरवाशिणीला कान तुटक्या कपातून पांचट दुधाचा चहा कसा काय द्यायचा ? अशा धोरणी विचाराने आमची आई सौ.टकले आत्यांकरिता चक्क आईस्क्रीम मागवायची. आम्ही आशाळभूतपणे गुलाबी थंडगार आईस्क्रीमकडे बघत तिथेच घिरट्या घालायचो. आत्याच्या ते लक्षातच यायचं नाही. आत्याचा बाउल साफ- सूफ व्हायचा. आणि मग तिच्या लक्षात आल्यावर ती म्हणायची ,” हे काय वहिनी मुलांसाठी नाही का आईस्क्रीम मागवलत? “ आईला काय बोलावं काही सुचायचंच नाही कारण तिच्याजवळ इतके पैसेच नसायचे. चाणाक्ष आत्या ‘त ‘ वरून ताकभात ओळखायची. आणि मग हळूवारपणे आपल्या मखमली, चंदेरी टिकल्या लावलेल्या बटव्यातून नाणी काढायची, अलगद आमच्या हातावर ठेवून म्हणायची, ” पळा रे पोरांनो आईस्क्रीम खाऊन या. ” हे वाक्य ऐकण्यासाठीचं तर आम्ही आतुर झालो होतो. पैसे हातात पडताच छताला टाळू लागेल अशी उंच उडी मारावीशी वाटायची. पण मग धाड्दिशी जमिनीवर आदळायचो.कारण आईचे डोळे मोठे झालेले असायचे. आईच्या डोळ्यांकडे नजर गेल्यावर आम्ही चुळबूळ करायचो, आत्या म्हणायची “आईकडे काय बघताय ? मी सांगतेय ना ! हे पैसे घ्या आणि पळा लौकरआणि जा बुवांकडे” .. मग काय आम्ही हावरटासारखे चार आण्याचं नाणं मुठीत पकडून जिन्यावरून एकेक पायरी वगळत उड्या मारत बुवा आईस्क्रीमवाल्यांच्या दुकानात शिरायचो.आणि मग काय बुवांकडे गुलाबी, पोपटी,पिस्ता आईस्क्रीम खाताना मनांत यायचं आपला ढग झालाय आणि आपण हवेत तरंगतोय. अहाहा ! काय तो सुखद गारवा.,काय ती आईस्क्रीमची मिठ्ठास चव, अजूनही जिभेला विसर पडला नाही.आणि मग मनाला सुखावणारा गारवा अंगावर घेता घेता आमची ब्रह्मानंदी टाळी लागायची. स्वर्गच आमच्या हातात आला होता.
आईस्क्रीमची चटक लागली होती,पण पैशांचा ताळमेळ जमत नव्हता. अखेर पगार झाल्यानंतर माझ्या वडिलांनी ति.नानांनी आईस्क्रीमचा पॉटच घरी आणला. पण तो फिरवतांना नाकी दम आले. घामाच्या धारा लागल्या, पण नंतर मात्र तीन-तीन वाट्या आईस्क्रीम हादडायला मिळालं . अगदी तुडुंब पोटभर.
.. .. पण मंडळी गेले ते दिवस,आणि गेली ती आईस्क्रीमची तेव्हाची चव.
.. .. अजूनही रंग उडालेली –‘ बुवा आईस्क्रीम वाले ‘ — ही पाटी डोळ्यासमोरून हालत नाहीये बघा !
.. मनाचं पाखरू अजूनही त्या दुकानाभोवती घिरट्या घालतंय… त्या जोगेश्वरीच्या परिसरातच घुमतंय .