हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 238 ☆ गीत – हर शहादत देश की इक शान है… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 238 ☆ 

☆ गीत – हर शहादत देश की इक शान है…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

हर शहादत देश की इक शान है।

कह रहा यह पूर्ण हिंदुस्तान है।

देश पर जो मर- मिटे वे वीर हैं,

शौर्य का गाता सकल जग गान है

=1=

हर किसी को ये मेरा पैगाम है

एक रब रहमान वो घनश्याम है

तोड़ना मत भूल कर निज देश को

एकता से देश का सम्मान है।।

=2=

फूट ने ही डस लिया इतिहास है

आज भी जयचंद का क्या वास है

प्रेम की गंगा दिलों से बह रही

भारतीयता की यही पहचान है।।

=3=

गुरुजनों को मान दें सम्मान   दें

पश्चिमी क्यों सभ्यता पर ध्यान दें

 हिन्द की मिट्टी उगाती स्वर्ण है

रत्न मणियों का वतन ये खान है

=4=

वे फिदा हैं इस वतन पर आज भी

कर रहे हैं और इस पर नाज भी

गा रहे हैं स्वर्ग से मन गीत ये

हर कोई सुख से जिए तो मान है।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 598 ⇒ l| अनाड़ी || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “l| अनाड़ी ||।)

?अभी अभी # 598 ⇒ l| अनाड़ी || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Clumsy)

बलमा अनाड़ी मन भाये

का करूं, समझ ना आये ..

अनाड़ी अनपढ़ नहीं होता, वह अकुशल हो सकता है, नासमझ हो सकता है। बच्चे भी नासमझ होते हैं, लेकिन वे अबोध होते हैं, बढ़ती उम्र के साथ परिपक्व होते चले जाते हैं।

शैलेन्द्र का अनाड़ी सब कुछ सीख गया, बस होशियारी नहीं सीख सका। यहां साहिर का बलमा इतना अनाड़ी है कि ;

होठ हिले तो बात न जाने

नैन मिले तो घात न जाने

निस दिन जी तरसाये

हाय …

यानी बलमा का होशियार होना भी जरूरी है। वह इतना पढ़ा लिखा होना चाहिए कि उधर होंठ हिले, और इधर बात पकड़ी। आपस में आँखें तक नहीं मिल पा रही हैं, क्योंकि जनाब चश्मा चढ़ाकर अखबार पढ़ रहे हैं। घर का कुंभ छोड़ प्रयाग महाकुंभ में आंखें गड़ाए पड़े हैं।।

अब बेचारी का अगर बेडलक ही खराब है तो क्या करे। कहीं कहीं तो यह शिकायत होती है, कि मिलकर बिछड़ गए नैना, हाय मिल के बिछड़ गए नैना। लेकिन यहां मामला कुछ अलग है ;

नेहा लगा ऐसे प्रीतम से

बिन कारन जो रूठे हमसे

समझे न समझाए

आ आ समझे न समझाए

हाय राम …

यानी बेचारा बलमा तो दिल दे बैठता है और आप उससे प्रेम करती हैं। वैसे नेहा का अर्थ प्यार से देखना भी होता है। जिनके कलेजे पर छुरियां चलती हैं, शायद वे ही नेहा लगाने का अर्थ जानते हैं। जो अनाड़ी है, वह तो अकारण ही रूठ जाता है, नासमझ है, उसे कौन समझाए।

साफ साफ क्यों नहीं कहती, वह नादान भी है। देखिए, फिल्म अलबेला(१९५१) में जनाब राजेंद्र कृष्ण क्या कहते हैं ;

बलमा बड़ा नादान रे

प्रीत की ना जाने पहचान रे

बैयां पकड़ूं, हाथ दबाऊं

समझत नाहीं कैसे समझाऊं

लाख जतन किए

हार गई मैं, मैं रोगी हो गई

जान रे …

बलमा बड़ा नादान रे।।

अनाड़ी है, नादान है, भोला है, नासमझ है, यानी टेढ़ा है, फिर भी मेरा है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ प्रयोगशील लघुकथाएं आमंत्रित – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ प्रयोगशील लघुकथाएं आमंत्रित – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश करेंगे शिरकत ☆

(1) एक या दो लघुकथा और

(2) इनमें आपने अपना प्रयोग किस स्तर पर किया है?

भाषा, शिल्प, कथ्य, कहन, शैली आदि किस स्तर पर और किस तरह का प्रयोग किया हैं?* (कम से कम 200 शब्दों में और अधिकतम 1000 शब्दों में लिखें।)

सभी साहित्यप्रेमी लघुकथाकारों, लेखकों और रचनाकारों से आग्रह है कि वे अपनी प्रयोगशील लघुकथाओं को हमारे साथ साझा करें। हम वरिष्ठ, कनिष्ठ, मध्यम श्रेणी के साहित्यकारों और नवोदित लेखकों से, जिन्होंने अभी लघुकथा लिखना आरंभ किया हो, उन सभी से समान रूप से लघुकथाएं आमंत्रित करते हैं। चाहे आप एक अनुभवी साहित्यकार हों या लिखने की यात्रा शुरू कर रहे हों, आपकी प्रयोगशील लघुकथाएं का मौलिकता और रचनात्मकता के साथ का स्वागत करते हैं।
लघुकथा और उसकी प्रयोगशीलता —-

आप किसी भी वर्ग या श्रेणी के लघुकथाकार हैं, आप अपनी दो-दो लघुकथाएं भेज सकते हैं। प्रयोगशील लघुकथा के साथ अपना मंतव्य भेजना अनिवार्य है। आपने यह लघुकथा कब, क्यों और कैसे लिखी? अर्थात यह लघुकथा दिमाग में कैसे आई और किस प्रक्रिया के तहत कागज पर उतरी हैं? इसमें आपने अपना प्रयोग किस स्तर पर किया है? भाषा, शिल्प, कथ्य, कहन, शैली आदि किस स्तर पर और किस स्तर का प्रयोग किया हैं? यह बताना अनिवार्य है।

निर्देश:

  • आपकी लघुकथाएं मौलिक, प्रकाशित और अप्रकाशित हो सकती हैं।
  • लघुकथा भेजने के बाद, कम से कम 8 महीने तक पत्राचार न करें, क्योंकि यह एक लंबी और शोध आधारित प्रक्रिया है।
  • चयनित रचनाओं को एक शोधग्रंथ या पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाएगा।

प्रकाशन प्रक्रिया:

इस प्रक्रिया के अंतर्गत सभी श्रेणियों की लघुकथाएं का चयन होगा। यह पुस्तक विशिष्ट प्रक्रिया और रचनात्मकता को नई पहचान देगी, बल्कि साहित्य जगत में लघुकथाओ के योगदान को भी रेखांकित करेगी।

आवश्यक जानकारी:

  • अंतिम तिथि: इस सूचना के प्रकाशन के 15 दिन तक
  • शब्द सीमा: लघुकथा के अनुसार।
  • रचना भेजने का माध्यम: [email protected]

आइए, इस रचनात्मक यात्रा का हिस्सा बनें और अपनी (1) एक या दो लघुकथा और (2) इसमें आपने अपना प्रयोग किस स्तर पर किया है? भाषा, शिल्प, कथ्य, कहन, शैली आदि किस स्तर पर और किस तरह का प्रयोग किया हैं? को हमारे साथ सांझा करें।

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ झेप घेतसे पाखरु… ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कवितेचा उत्सव ?

☆ झेप घेतसे पाखरु ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

(कुटुंबातील मुले कर्तृत्ववान होताना आईच्या भावना)

हासू कसले आसू कसले नका विचारु कुणी

एक पाखरु झेप घेतसे पंख नवे लावुनी

 *

उरातली ही धडधड माझ्या नकोस ऐकू बाळा

अजून माझ्या कानी घुमतो तुझाच घुंगुरवाळा

बघू नको तू मागे आता, ‘आई, आई’ म्हणुनी

एक पाखरु झेप घेतसे पख नवे लावुनी

 *

अंगण सोडून नभांगणाचा ध्यास तुला लागला

निरोप तुजला देताना परि दाटून येतो गळा

खुशाल जा तू सोडून माया, ठेवून आठवणी

एक पाखरू झेप घेतसे पंख नवे लावुनी

 *

दूर यशाचे शिखर खुणविते, गाठायाचे तुला

काटे वेचुन कर्तृत्वाचा  फुलवायाचा मळा

वाटेवरुनी चालत जा तू ध्येय एक ठेवुनी

एक पाखरु झेप घेतसे पंख नवे लावुनी

 *

असेच येतील अश्रू नयनी तू परतून येता घरी

ओठही हसतील झेलत असता तुझ्या यशाच्या सरी

मायपित्याचे आशिर्वच जा, सोबतीस घेउनी

एक पाखरु झेप घेतसे पंख नवे लावुनी

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ अष्टविनायक…! ☆ श्री सुजित कदम  ☆

श्री सुजित कदम

 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ अष्टविनायक…! ☆ 

☆ 

मोरगावी मोरेश्वर

होई यात्रेस आरंभ

अष्ट विनायक यात्रा

कृपा प्रसाद प्रारंभ….!

*

गजमुख सिद्धटेक

सोंड उजवी शोभते

हिरे जडीत स्वयंभू

मूर्ती अंतरी ठसते….!

*

बल्लाळेश्वराची मूर्ती

पाली गावचे भूषण

हिरे जडीत नेत्रांनी

करी भक्तांचे रक्षण….!

*

महाडचा विनायक

आहे दैवत कडक

सोंड उजवी तयाची

पाहू यात एकटक….!

*

थेऊरचा चिंतामणी

लाभे सौख्य समाधान

जणू चिरेबंदी वाडा

देई आशीर्वादी वाण…!

*

लेण्याद्रीचा गणपती

जणू निसर्ग कोंदण

रुप विलोभनीय ते

भक्ती भावाचे गोंदण….!

*

ओझरचा विघ्नेश्वर

नदिकाठी देवालय

 नवसाला पावणारा

देई भक्तांना अभय….!

*

महागणपती ख्याती

त्याचा अपार लौकिक

रांजणगावात वसे

मुर्ती तेज अलौकिक….!

*

अष्टविनायक असे

करी संकटांना दूर

अंतरात *निनादतो

मोरयाचा एक सूर….!

© श्री सुजित कदम

मो.7276282626

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आकाश माझे… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ आकाश माझे… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

नात्यास आपल्या जरीही,

रुढ नाव कोणतेच नाही.

तरी  कसे निक्षून सांगू,

आपल्यांत नातेच नाही.

*

भान ठेऊ अंतराचे,

जे आजही रुंदावले.

थंडावले आवेग सारे,

मनोवेगही मंदावले.

*

मेघ कांही भरुन आले,

आत्ताच ते बरसून गेले.

मागमूस अवघे पुसोनी,

आकाश माझे स्वच्छ झाले.

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ४२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ४२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- समीर जिवंत राहिला तरी कधीच बरा होणार नाही हे डॉ.देवधर यांनी मला अतिशय सौम्यपणे समजावून सांगितलेलं होतं. त्यावेळी त्यांच्या केबिनमधे माझ्याबरोबर आलेले माझे ब्रँचमॅनेजर घोरपडे साहेब होते फक्त. ही गोष्ट घरी किंवा इतर कुणालाच मी मुद्दाम सांगितलेली नव्हती. असं असताना हे लिलाताईला कसं समजलं? मला प्रश्न पडला.)

विशेष म्हणजे या प्रश्नाचं उत्तर मी कुणाला न विचारताच त्याच दिवशी मला परस्पर मिळणार होतं आणि माझ्या दुःखावर फुंकर घालत मला

दिलासाही देणार होतं हे त्या क्षणी मात्र मला माहित नव्हतं. सगळं घडलं ते योगायोगाने घडावं तसंच.

‘ समीर पृथ्वीवरील औषधाने बरा होण्याच्या पलिकडे गेल्यामुळे तो बरा होण्यासाठी देवाघरी गेलाय आणि बरा होऊन परत येणाराय ‘

हे लिलाताईच्या पत्रातील वाक्य पुत्रवियोगाच्या धक्क्यातून मला अलगद बाहेर घेऊन आल़ं होतं. ही अंतर्ज्ञानाची खूणगाठच होती जशीकांही! एका क्षणार्धात माझं पुत्रवियोगाचं दु:ख विरुनच गेलं एकदम…

“कुणाचं पत्र..?”

“लिलाताईचं. घे. बघ तरी काय लिहलंय? वाच”

ती न बोलता उठली. ‘चहा करते..’ म्हणत आत जाऊ लागली.

“आधी वाच तरी.. मग चहा कर.”

“सांत्वनाचंच पत्र असणार. काय करू वाचून? आपला समीर गेलाय हे कटू सत्य बदलणाराय कां?” तिचा आवाज भरून आला.

“हो बदलणाराय. बघशील तू. आधी वाच..मग तूही कबूल करशील.”

तिने ते पत्र घेतलं. वाचलं. निर्विकारपणे मला परत दिलं.

“तुला हे वाचून खरंच काहीच वेगळं वाटलं नाही?”

“नाही. लिलाताईंचं मराठी भाषेवर प्रभुत्त्व आहे म्हणून त्यांनी चांगल्या भाषेत आपलं सांत्वन केलंय एवढंच. बाकी वेगळं काय आहे त्यात?” ती म्हणाली.

तिचंही बरोबरच होतं. समीरच्या आजारपणाच्या बाबतीतल्या कांही गोष्टी तिला त्रास होऊ नये म्हणून मी त्या त्या वेळी मुद्दामच सांगितल्या नव्हत्या. आता सगळं घडून गेल्यानंतर ते तिला सांगण्यात कशाचाच अडसर नव्हता. ते नाही सांगितलं तर या पत्रातलं मला जाणवलेलं वेगळेपण तिला कसं  जाणवावं….? पण ती ते सगळं समजून घेण्याइतकी सावरलेली नाहीय. सगळं ऐकल्यानंतर ती बिथरली तर? नकोच ते‌. जे सांगायचं ते तिचा मूड पाहून तिच्या कलानेच सांगायला हवं. तरीही ती केव्हा सावरतेय याची वाट पहात आता गप्प राहून चालणार नाही. लवकरात लवकरात लवकर तिला या एकटेपणातून बाहेर काढायलाच हवं….’

कितीतरी वेळ असे उलट सुलट विचार माझ्या मनात गर्दी करत राहिले. तिने चहाचा कप माझ्यापुढे ठेवला आणि मी भानावर आलो. डोळे पुसत ती किचनमधला पसारा आवरु लागली.

“आरती, ऐक माझं. पटकन् जा आणि आवर तुझं. मी तयार होतोय..”

“कां ? कुणी येणार आहे कां?”

“नाही..” मी हसून म्हटलं “कुणीही येणार नाहीय, आपणच जायचंय..”

“आत्ता? कशाला? कुठं जायचंय..?”

मला एकदम लिलाताईच्या माहेरघराची आठवण झाली.ते सर्वजण किर्लोस्करवाडी सोडून कोल्हापूरला आले त्याला दहा वर्षं होत आली होती. सुरुवातीची एक दोन वर्ष कष्टात गेली तरी आता त्यांचं छान बस्तान बसलं होतं.स्वत:चं घर झालं. कोल्हापूरला उद्यमनगरमधे स्वतःचं वर्कशॉप होतं, दोन लेथ होते, मशिनरी स्पेअर पार्टसचं स्वतःचं दुकान होतं. सगळे भाऊ स्वतः राबत होते. दोन वर्षांपूर्वीपासून लिलाताईचे वडिल प्रकृती अस्वास्थ्यामुळे सर्व पसारा मुलांच्या हवाली करून अलिकडे घरी अंथरुणाला खिळून असायचे. क्वचित मधे कधीतरी एक दोनदा कामानिमित्ताने त्या भागात गेल्यानंतर मी उभ्या उभ्या त्यांच्या घरी जाऊन आलो होतो. पण त्यालाही बरेच दिवस गेले होते. शिवाय सगळी हालहवाल लिलाताई वाडीला भेटली की वेळोवेळी तिच्याकडून समजायचीच. माझा लहान भाऊ कोल्हापूरमधेच असल्याने नेहमी त्यांच्या संपर्कात असायचा. त्याच्याकडून चार दिवसांपूर्वीच लिलाताईचे वडील गेल्याचे समजले होते. या रविवारी मी त्यांच्या घरी भेटून यायचे ठरवले होतेच.त्यापेक्षा आरतीलाही बरोबर घेऊन आजच गेलो तर…? हा विचार मनात आला तेव्हाच आरतीने मला पुन्हा विचारले…”सांगा ना, कुठं जायचंय..?”

उद्यमनगरमधे. लिलाताईचे वडील नुकतेच गेलेत. तिच्या आईला भेटून तरी येऊ.” मी म्हणालो.

आरती गप्पच झाली एकदम.

“का गं? काय झालं?”

“नाही… नको.”

“का ?”

“आपला समीर अडीच तीन महिने दवाखान्यात अॅडमिट होता. त्यांच्यापैकी कुणी आलं होतं कां बघायला? तो गेल्याचंही समजलं असेलच ना त्यांना? त्यानंतरही कुणी आलं नाही.आपणच कां जायचं?”

मी निरुत्तर झालो. ती बोलली यात तथ्य होतंच.पण तरीही मला ते स्विकारता येईना.

हे बघ, त्यांनी केलं ते न् तसंच आपणही करायचं कां? लिलाताईचे वडीलही झोपून होते. त्यांचा कांही प्रॉब्लेम असेल. इतर कांही अडचणी असतील. त्यामुळे येणं जमलं नसेल. पण ती अगदी साधी माणसं आहेत गं. माणुसकी सोडून वागणारी तर अजिबातच नाहीयत.आणि आपण रहायला जातोय कां तिकडे? घटकाभर बसून बोलून येऊ. त्यांनाही बर वाटेल.”

ती न बोलता स्वतःचं आवरू लागली. मला तेवढं पुरेसं होतं. ती यायला तयार झालीय

हेच खूप होतं माझ्यासाठी.  

त्यांच्या घराचं दार उघडंच होतं. हॉलमधे दारासमोरच्या भिंतीला टेकून लिलाताईच्या  आई नेहमीसारख्या बसून होत्या.

मला दारात पहाताच त्यांना गलबलून आलं.

“ये रेss माज्या लेकरा..ये…” रडवेल्या आवाजातच त्यांनी अतीव मायेनं आमचं स्वागत केलं.आम्ही आत जाताच आरतीकडं पाहून त्यांचे डोळे भरुन आले.त्यांनी तिला जवळ बोलावलं..

“तू कां उबी? ये माझ्याजवळ.बैस अशी..” म्हणत तिला जवळ बसवून घेतलं.

” खूप आजारी होते कां हो बाबा?”

” हां तर काय? तरण्या वयापासून घाण्याला बांदलेल्या गुरासारका राबराब राबल्येला जीव त्यो. दोन वर्सं झाली आंथरुन सोडलं नव्हतं बग ल्येका. मी ही अशी.लांबून बघत बसायची निस्ती. पण समद्या पोरांनी लै शेवा केली बग त्येंंची.”

बोलता बोलता आरतीकडं लक्ष जाताच त्या बोलायचं थांबल्या.

” हे बघ बै.झालं गेलं गंगेला अर्पण करुन टाकायचं बग.त्यातच रुतून बसायचं न्है.कळतंय का? यील त्ये पदरात घ्यायचं न् पुढं जात -हायचं बग.” त्यांनी तिला समजावलं. त्यांच्या तोंडून बाहेर पडणारा प्रत्येक शब्द त्यांच्या अंत:करणातूनच उमटलेला असावा इतका आपुलकीने ओथंबलेला होता.”गप.रडू नको. तुजा इस्वास नाई बसनार,पन इतं गेटभाईर जीप हाय नव्हं , तिची डिलीवरी कवा मिळालीती सांगू?तुजं बाळ देवधर डाकतराकडं अॅडमीट झालंय त्ये आमाला समजलं त्याच दिवशी. मी कोल्हापूरच्या अंबाबाईचं दरसन घ्यून लई वर्सं झाली बग.पोरं म्हनत हुती ‘चल.तुला उचलून नव्या जीपमंदी बशीवतो न् अंबाबाईच्या दरसनाला बी तसंच उचलून घ्यून जातो म्हणून.तवा म्या काय म्हनले ठाव हाय? मी म्हनले, त्या म्हाद्वार   रस्त्यावरच अरविंदाचं बाळ हाय नव्हं दवाखान्यात? अंबाबाईचं दरसन राहूं दे.. मला उचलून त्या दवाखान्यात नेताय का सांगा.तरच मी जीपमध्ये बशीन. त्येच्या बाळाला बगून तरी येते यकडाव. पन दोन अवगड जिनं चढाय लागत्यात म्हनली पोरं.त्ये कसं जमणार हुतं? म्हनून मग जीपमदे बसनं न् देवीचं दरसन दोनी बी नगंच वाटलं. आज तुमी दोगं आला झ्याक वाटलं बगा…

आरती थक्क होऊन ऐकत होती. तिच्या मनातल्या प्रश्नाचं प्रश्न न विचारताच तिला परस्परच उत्तर मिळालं होतं!

“तुझ्या आईला न् तुला बी माजी लिलाबाई भेटती न्हवं वाडीत न्हेमी? ती सांगत असती मला…”

“हो.बऱ्याचदा भेट होते आमची”

” तिची पन लई सेवा झालीय बग दतम्हाराजांची.तुला म्हनून सांगत्ये..,तुझ्या बाबावानी लिलाबाई बोलती त्ये बी खरं व्हाय लागलंय बग.”

त्या सहज बोलायच्या ओघात बोलून गेल्या न् मग लिलाताईबद्दलच कांहीबाही सांगत राहिल्या.तिच्या वाचासिध्दीबद्दलच्या अनुभवांबद्दलच सगळं. त्यातला प्रत्येक शब्द मला निश्चिंत करणारा होता! सगळं ऐकत असताना लिलाताईच्या पत्रातला मजकूर माझ्या नजरेसमोर तरळत राहिला होता! त्यातला शब्द न् शब्द खरा होणाराय हा विश्वास आरतीपर्यंत कसा पोचवायचा हा प्रश्न मात्र त्याक्षणीतरी अनुत्तरीतच राहिला होता..!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ वाटणी… भाग – ३ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ वाटणी… भाग – ३ ☆ श्री दीपक तांबोळी

(तेवढ्यात मला पसारा आवरल्याने कोपऱ्यात शिलाई मशीन दिसली.) – इथून पुढे —- 

” मशीन नवी घेतली वाटतं. ५-६ महिन्यांपूर्वी आलो होतो तेव्हा नव्हती “

” हो. सुरेखा वहिनींनी घेऊन दिली “शैला वहिनी उत्तरली

” पण शिवणार कोण?तुला येतं?”

” हो येतं ना!उन्हाळ्यात मी महिनाभर सुरेखावहिनींकडे होते. त्यांनीच मला आग्रह करुन शिवण क्लास करायला लावला होता “

” अरे वा!मग आता गावातल्या बायकापोरी तुझ्याकडेच ब्लाऊज वगैरे शिवायला येत असतील”

” नाही हो भाऊजी. शेतीची कामं, घरची कामं, स्वयंपाक यात वेळच मिळत नाही. बरं बसा गप्पा मारत मी चहा करुन आणते “

मग मी बापूकाका आणि योगेशशी गप्पा मारत बसलो. हल्ली गावागावात राजकारण थैमान घालतंय. आमचं गांवही त्याला अपवाद नव्हतं. योगेशही एका राजकारणी पक्षाचा सक्रिय कार्यकर्ता होता. येत्या सहा महिन्यात ग्रामपंचायतीच्या निवडणुका होणार होत्या. चहा पिता पिता कोणता पक्ष बाजी मारणार यावरच चर्चा सुरु होती. योगेश जरा अस्वस्थ वाटत होता. आणि तो का अस्वस्थ आहे याची मला चांगलीच जाण होती. ३-४ तासानंतर बापूकाकांच्या प्राँपर्टीचा निवाडा मी करणार होतो. त्यामुळे माझं मत जाणून घ्यायचा तो प्रयत्न करत होता. पण तो त्या विषयावर आला की मी दुसरा विषय काढत होतो.

एक वाजता आमचं जेवण आटोपलं. मला जेवण फारसं आवडलं नाही. जास्त तेलकट आणि मसालेदार म्हणजे चांगलं जेवण असा बहुतेक शैला वहिनीने समज करुन घेतला असावा. मला सुरेखा वहिनीच्या हातचा स्वयंपाक आठवला. तिच्या हाताला विलक्षण चव होती. शिवाय वेगवेगळे नवीन पदार्थ करण्यात ती तरबेज होती. बापूकाकांकडे मात्र आलं की तोच तोच मेनू जेवायला असायचा.

दुपारी तीन वाजता रमेश आला. माझ्या सांगण्यानुसार त्याने सुरेखा वहिनीला आणलं नाही त्याचा मला आनंद झाला.

चार वाजता गावातली दोन तीन प्रतिष्ठित मंडळी येऊन बसली. त्यातल्या दोघांना मी ओळखत होतो. तिसऱ्याला मात्र मी ओळखलं नाही. तसं मी योगेशला विचारलं

” हे आमच्या पक्षाचे तालुकाध्यक्ष” योगेशने ओळख करुन दिली. मी त्यांना नमस्कार केल्यावर ते हसत म्हणाले

“वकीलसाहेब मी तुम्हाला चांगला ओळखतो. आमच्या पक्षाच्या तीनचार कार्यकर्त्यांच्या केसेस तुमच्याकडेच आहेत “

मग त्यांनी त्या कार्यकर्त्यांची नावं सांगितली. अर्थातच मी त्यांना ओळखत होतोच.

चहापाणी झाल्यावर मी मुद्द्यावर यायचं ठरवलं.

” मग मंडळी सुरु करायचं?”मी विचारलं

“हो हो करा ना”सगळे एक सुरात बोलले

मी सावरुन बसलो.

” या इस्टेटीचे मालक बापूकाका आहेत. तेव्हा त्यांचं काय मत आहे हे अगोदर जाणून घेणं आवश्यक आहे. काका तुम्ही सांगा तुम्हाला काय वाटतं ते “

” मला काय दोन्ही मुलं सारखीच आहेत. दोघांना समान वाटणी करुन द्यावी असं मलाही वाटतं. पण रमेश शहरात रहातो. त्याची आर्थिक परिस्थिती चांगली आहे. तेव्हा त्याने मन मोठं करुन लहान भावाला सगळं देऊन टाकावं असं मला वाटतं. अर्थात सर्वसंमतीने जे ठरेल ते मला मान्य राहील “

मी रमेशकडे पाहिलं. त्याच्या चेहऱ्यावर काही भाव मला दिसले नाहीत. म्हणून मी योगेशकडे वळलो.

” योगेश तुझं काय मत आहे?”

“दादा शेतीशिवाय माझ्याकडे उत्पन्नाचं दुसरं साधन नाही. आणि तुम्ही तर जाणताच शेतकऱ्यांची परिस्थिती किती वाईट आहे ते. या शेतीत वाटेहिस्से  झाले तर मला जगणं मुश्किल होईल. तीच गोष्ट घराची. हे घर जर रमेशदादाला दिलं तर आम्ही रहायचं कुठे?नवीन घर बांधण्याची तर माझ्यात क्षमता नाही”

बैठकीत शांतता पसरली. मी रमेशकडे पाहिलं तो अजुनही तसाच स्थितप्रज्ञ दिसत होता

” रमेश तुझं काय म्हणणं आहे?”

मला वाटलं तो आता सुरेखा वहिनीने जे त्याला पढवलं असेल ते बोलेल पण तो शांततेनं म्हणाला

” दादा मला काहीच म्हणायचं नाही. तुम्ही जो निर्णय घ्याल तो मला मान्य असेल आणि मला माहित आहे तुम्ही योग्य तोच निवाडा कराल”

आता सुरेखा वहिनी असती तर ती नक्कीच रमेशवर संतापली असती. कदाचित रमेशला तिने पुढे बोलूच दिलं नसतं. स्वतःच आपली बाजू मांडली असती. या कुटूंबासाठी आम्ही कायकाय केलं त्याचा पाढा वाचला असता. तिला बैठकीत येऊ दिलं नाही ते चांगलंच झालं असं मला जाणवून गेलं.

” मंडळी तुम्हाला काय सांगायचं आहे?”समोरच्या दोघा प्रतिष्ठितांना मी विचारलं

” वकील साहेब तुमचं पुर्ण जिल्ह्यात नांव आहे. आपल्या गांवातही तुमच्या शब्दाबाहेर कुणी नाही. तुम्ही काय चुकीचा निवाडा करणार नाही. तेव्हा तुम्हीच काय तो निर्णय सांगून सगळ्यांना मोकळं करावं असं आम्हांला वाटतं.

मी सगळ्यांच्या चेहऱ्यावरुन नजर फिरवली. बापूकाका निश्चिंत झालेले वाटले. योगेश आणि त्याच्या सोबतच्या पक्षाध्यक्षाच्या चेहऱ्यावर विजयाचे भाव दिसत होते. रमेश मात्र पुर्वीसारखाच स्थितप्रज्ञ दिसत होता. जणू कोणत्याही निर्णयाने त्याला काहीच फरक पडत नव्हता.

मी एक दिर्घ श्वास घेतला आणि बोलायला सुरुवात केली

” मंडळी मी गेली वीस वर्ष वकीलीचा व्यवसाय करतोय. या वीस वर्षात मी प्राॅपर्टीच्या वादाच्या अनेक केसेस पाहिल्यात. या प्राॅपर्टीमुळे सख्ख्या भावाभावात, भावाबहिणीत वाद निर्माण होतात. कोर्टात केसेस केल्या जातात. दहादहा पंधरापंधरा वर्षं या केसेस चालतात. काही वेळा तर आजोबाचा खटला नातू चालवतो. पैसा, वेळ आणि मानसिक स्वास्थ्य सगळ्यांचा अपव्यय या खटल्यांमध्ये  होतो. आपापसातलं प्रेम, संबंध कायमचे संपून जातात. नव्वद टक्के केसेसमध्ये शेवटी  तडजोड होते. मग दोन्ही पक्षांना वाटायला लागतं की हीच तडजोड अगोदर केली असती तर इतका पैसा, इतकी वर्षं वाया गेली नसती. बरं वादग्रस्त प्राॅपर्टीमधून जे इन्कम मिळणार असतं तेही ठप्प पडलेलं असतं. म्हणजे इतकं करुनही हातात काय येतं तर शुन्य. योगेश आणि रमेशच्या बाबतीत मला हे होऊ द्यायचं नाहीये. दोघा भावांचे संबंध पुर्वीसारखेच रहावेत आणि दोघांपैकी एकावरही अन्याय होऊ नये या हेतूने मी माझा निर्णय आता सांगणार आहे. तो निर्णय मान्य करायचा की नाही हे सर्वस्वी रमेश आणि योगेशवर अवलंबून आहे “

” नाही नाही दादा. तुमचा कोणताही निर्णय मला मान्य असेल” रमेश घाईघाईने म्हणाला.

मी योगेशकडे पाहिलं. तो काही बोलला नाही पण चांगलाच अस्वस्थ वाटत होता.

“वकीलसाहेब तुम्ही बरोबर म्हणताय. नकोच त्या कोर्टाच्या भानगडी. आम्हीही तो वाईट अनुभव घेतलाय. सोळा वर्ष खटला चालला. होता नव्हता तेवढा पैसा वकीलाच्या मढ्यावर टाकला. आणि हातात काय आलं तर भोपळा” एक प्रतिष्ठित उद्वेगाने म्हणाले. त्यावर दुसऱ्या प्रतिष्ठितानेही मान हलवून सहमती दर्शवली

” तर मंडळी माझा निर्णय एकदम साधा सोपा आहे ” मी क्षणभर थांबलो. सगळे श्वास रोखून माझ्याकडे पाहू लागले. मी पुढे बोलू लागलो

” जी चार एकर शेती आहे त्यातले दोन दोन एकर दोघा भावांनी वाटून घ्यावेत. रमेश शहरात रहातो. त्याच्याकडून शेती होणार नसेल तर तो ती कसण्यासाठी योगेशला देऊ शकतो. आणि एक ठराविक वार्षिक उत्पन्न योगेशकडून घेऊ शकतो. मात्र मालकी रमेशकडेच राहील. आज त्या शेतीचा भाव एकरी दहा लाख आहे. जर योगेशला ती पुर्ण शेती हवी असेल तर त्याने रमेशला वीस लाख देऊन विकत घ्यावी. आता प्रश्न उरला या घराचा. मी काढलेल्या माहितीनुसार आजच्या बाजारभावाने या घराची किंमत वीस लाख आहे. हे घर विकून दोघा भावांनी दहा दहा लाख रुपये वाटून घ्यावे. जर योगेशला याच घरात रहायचं असेल तर त्याने दहा लाख रमेशला द्यावे. जर तो एवढे पैसे एकदम देऊ शकत नसेल तर त्याने पाच वर्षांत तेवढी रक्कम रमेशला द्यावी. या रकमेवर व्याज घ्यावं की नाही हा रमेशचा प्रश्न असला तरी त्याने ते घेवू नये असं मी त्याला सुचवेन “

मी थांबलो आणि सगळ्यांकडे नजर टाकली. बापूकाका मान खाली घालून बसले होते. त्यांना हा निर्णय पटलेला दिसत नव्हता. रमेशच्या चेहऱ्यावर कोणतेच भाव नव्हते. योगेशच्या चेहऱ्यावर मात्र राग, निराशा, दुःख यांचं अजब मिश्रण दाटून आलेलं दिसत होतं.

“एकदम बरोबर निवाडा केला वकीलसाहेब. दोघांना समान वाटणी करुन दिलीत हे छान केलंत “एक प्रतिष्ठित म्हणाले

” होय वकीलसाहेब तुमचा निर्णय आपल्याला एकदम आवडला. कुणालाच कमी किंवा जास्त नाही. त्यामुळे भांडणाची आणि कोर्टकचेऱ्यांची शक्यताच नाही “दुसऱ्या प्रतिष्ठितांनीही पहिल्याची री ओढली.

” पण वकीलसाहेब तुम्ही योगेशच्या आर्थिक परिस्थीतीचा विचारच केलेला नाही. आता दोन एकर शेतीमध्ये तो पिकवेल काय आणि खाईल काय?लेकराबाळाची पोटं त्याने कशी भरायची?”पक्षाध्यक्ष नाराज होऊन बोलले.

” तुम्ही आपल्या गावातल्या शरद पाटीलला ओळखता?” मी प्रतिप्रश्न केला

” हो मग!शरद पाटीलला कोण ओळखत नाही?तो तर आता मोठा माणूस झालाय ” एक प्रतिष्ठित म्हणाले

“दहा वर्षांपूर्वी शरद आणि त्याच्या तीन भावांमध्ये शेतीची वाटणी झाली. शरदच्या वाट्याला फक्त दोन एकर शेती आली. पण त्या एवढ्याशा शेतीत शरदने सोनं पिकवलं. त्याने शेतीत वेगवेगळे प्रयोग केले. रासायनिक खतांचा वापर टाळून सेंद्रिय खतांवर भर दिला. पावसाच्या लहरीपणाचा त्यालाही फटका बसला असेलच की नाही पण गडी हरला नाही. फक्त शेतीवर अवलंबून रहाता येणार नाही हे ओळखून त्याने म्हशी विकत घेतल्या. दुधविक्रीचा व्यवसाय सुरु केला. आता त्याच्याकडे चाळीस म्हशी आहेत. गावात एक डेअरी आहे. तालुक्याला एक डेअरी आहे. दोन्हीकडे त्याचा व्यवसाय तुफान चालतो. शेतीतली एक काडीही तो वाया जाऊ देत नाही. तो, त्याची बायको आणि आता मुलं रात्रंदिवस झटत असतात. त्यांना एक मिनिटाचीही फुरसत नसते. शरदचे भाऊ आजही दहा वर्षांपूर्वी होते त्याच स्थितीत आहेत. पण शरद आज शेठ झालाये. त्याच्याकडे दोन ट्रॅक्टर आहेत. एक कार आहे. गावात बंगला आहे. तालुक्याला दोन प्लाॅट आहेत. मागच्याच वर्षी त्याने वीस एकर शेती विकत घेतली हे तर तुम्हांला माहित असेलच”

सगळ्यांनी माना डोलावल्या. क्षणभराने पक्षाध्यक्ष म्हणाले “पण वकीलसाहेब जे शरदला जमलं ते सगळ्यांनाच जमतं असं नाही. योगेशला तर ते अजिबातच जमणार नाही”

“ध्येय आणि जिद्द असली की सगळं जमतं. रमेशचंच बघा ना!किराणा दुकानात साफसफाईचं आणि पुड्या बांधण्याचं काम करणारा रमेश आज क्लास वन ऑफिसर झालाय. ते या जिद्दीमुळेच ना?”

– क्रमशः भाग पहिला 

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9503011250

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ कुंभमेळा… लेखिका : सौ. प्राची सहस्रबुद्धे – वेलणकर ☆ प्रस्तुती – सौ. उज्ज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

सौ. उज्ज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

 ☆ मनमंजुषेतून ☆

 ☆ कुंभमेळा… लेखिका : सौ. प्राची सहस्रबुद्धे – वेलणकर ☆ प्रस्तुती – सौ. उज्ज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

आतापर्यंत माझ्यासाठी कुंभमेळ्याचा रेफरन्स हा bollywood असल्याने, “कुंभ के मेले मे बिछड गये” हेच माहिती…

पण ह्यावर्षी काहीतरी वेगळे च!  2 /3 मैत्रिणीनी कुंभला जायचे booking केलेले. मला पण विचारलेले पण तसा काही फार इंटरेस्ट येत नव्हता, कारण ” bollywood बॅकग्राऊंड” आणि शिवाय मुलांच्या परीक्षा वगैरे होतेच. आताच भारतात जाऊन आल्याने तसेही काही पुण्याला जायचे वगैरे नव्हते..

पण नाही..कुंभस्नानाचा योग ह्यावर्षी होता..काहीतरी व्हायचे असेल तर “पुरी कायनात” ते पूर्ण होण्यासाठी प्रयत्न करते.  पुन्हा बॉलीवूड ज्ञान..

Dettol ची ad असते “सगळ्या germs ना संपवते” आणि मग साधारणपणे तो साबण घ्यायला बळी पडायला होते , काहीसे तसेच कुंभस्नानाबाबतीत झाले. कुंभस्नानाने सगळी पापे धुतली जातील, चक्र align होतील, अशा typeचे इतके फॉरवर्ड्स आले आणि त्यातून विशेष म्हणजे योगींनी केलेल्या व्यवस्थेचे videos. एवढ्या प्रचंड area मध्ये सामान्य लोकांसाठी बांधलेले तंबू , संत महंतांचे आखाडे, खाण्यापिण्याची व्यवस्था, सगळ्यांबद्दल बातम्या,  forwards यांनी social मीडिया वर कुंभमेला गाजायला लागलेला.. मग एक दिवस मैत्रिणीला म्हणाले ,’जाऊया काय?’ तर ती तर तयारच होती , मग आणि एकीला  पण विचारले..झाले .. तिघींचे जायचे तर ठरले..

आधी चर्चा झाली की 28 ला निघायचे , 29 ला शाही स्नान आणि 30 ला परत. मग कळले शाही स्नानासाठी पोचणे मुश्किल आहे, कारण सगळे रस्ते ट्रॅफिक कंट्रोलसाठी ब्लॉक करणार आहेत.

मग शाही स्नानाचा मोह सोडला. मग 31 to 2 फेब जायचे ठरवले. तिघींची सोय बघून ते त्यातल्या त्यात बरे वाटत होते, पण tickets बघितले तर खूप महाग !

मग काय कधी, कसे, असे करताना , 21 ला संध्याकाळी ठरवले, 23 ला निघू.  नवऱ्याकडे पण बॉलीवूड ज्ञानच असल्याने त्याने जायला लगेच होकार देऊन तिकीट बुक करून दिले, “बरंय परस्पर काम झाले तर” असाच विचार असणार.. असा माझा दाट संशय आहे. आता घरातल्या विद्यार्थ्यांच्या exam तारखा पण फायनल कळल्या होत्या. ह्या काळात दोघांचेही अभ्यास करायचे प्लॅन नव्हते, कारण 23 ला दोघांच्या परीक्षा संपणार होत्या .

झालं मग, 23 ला वाराणसीला डायरेक्ट जायचे, 24 ला सकाळी अगदी लवकर उठून प्रयागला जायचे, संध्याकाळी परत यायचे आणि 25 ला परत. अगदी आटोपशीर..

पण देवाच्या मनात better प्लॅन होता.

23 ला आम्ही वाराणसीला 5 ला उतरलो, 6-30 ला ड्राइवर अनिल दुबेना भेटलो , तर त्यांनी सुचवले, की तसेही आताची संध्याकाळची गंगा आरती तुम्हाला मिळणार नाही, उद्या सकाळी निघायच्या ऐवजी आत्ता का निघत नाही. ‘तिथे राहायची सोय नाही’ हे कारण सांगितल्यावर , ‘ते मी बघतो’ असा त्यांनी विश्वास दिला, पण रात्रीची मेळ्याची मजा बघा- हा त्यांचा हट्टच होता. मग काय, मी बरं म्हणाले, प्रयागला जाताना वाटेत त्यांचे घर लागते तर त्यांनी घरी नेले, तिथे भरपूर पांघरूण बरोबर घेतली, घर आणि घरातले खूप छान होते. तिथून निघून 10-45 च्या आसपास प्रयाग ला पोचलो.

त्यांनी त्यांचे शब्द खरे केले. एका पुलावर गाडी उभी केली. इतका सुंदर दिसत होता मेळा. सत्य की स्वप्न प्रश्न पडावा. आम्ही आजूबाजूला लोकांना चालताना बघत होतो. लोकं 8 ते 10 किमी चालत होती, मोठ्या बॅग्स, मुलं बाळ सगळे… आम्हाला इतके लाजल्यासारखे झाले की आम्ही गाडीत निवांत बसलो होतो. लोकांच्या श्रद्धेला नमन करून,  आहे त्याबद्दल कृतज्ञता व्यक्त केली.

खूप one ways, exit closed ह्यामधून मार्ग काढत तब्बल 45 मिनिटांनी आमच्या ड्राइवरने कुंभ मेळ्यात प्रवेश मिळवला, आणि गाडी डायरेक्ट संगमपाशी, जिथे पार्किंग होते तिथेच नेली. साधारण 11-30 झालेले , तर झोपायला कुठे जागा शोधायची? ह्यावर ड्राइवर काकांनीच ‘गाडीत झोपा’ असा तोडगा काढला. त्यांनीच अंथरूण घालून सीट फ्लॅट करून दिल्या. पडत्या फळाची आज्ञा घेऊन मी पाठ टेकली. आम्ही तिघी तशाच झोपलो. 

साधारण 3 च्या आसपास जाग आली, बघितले तर एक मैत्रीण जागीच होती, म्हटलं, ‘चल, उठुया’

मग गाडीतून बाहेर आलो, काय व्यवस्था आहे ते बघायला. Lights भरपूर होते. त्यामुळे उजेड होता.  Changing रूम्स, पब्लिक temporary टॉयलेट्स भरपूर होते. णी आपले आपण घेऊन जायचे असल्याने आणि आपले महान लोक तेवढे जबाबदार नसल्याने, आत  सगळेच toilets स्वच्छ नव्हते , पण सरकारने केलेली व्यवस्था चोख होती. वापर करायची अक्कल नसेल तर सरकार काय करणार ! ते असो..

आम्ही फ्रेश झालो. आता आणि काय करणार असा विचार करून ब्रह्म मुहूर्तावर साधारण 3-45am च्या आसपास सरळ गंगेत डुबकी मारायला गेलो. पाणी खूप थंड होते, मी खूप थडथडत होते, पण मारल्या 4/ 5 डुबक्या. कुंभस्नान मिळेल का नाही असे वाटत असताना, देवाने ब्रह्म मुहूर्तवर स्नान घडवले. योगायोगाने तो सुनीताचा तिथीने वाढदिवस होता. मग जरा आवरून चक्कर मारायला बाहेर पडलो. कुठेतरी आत मनात “ब्रह्म मुहूर्तावर स्नान करायला हवे” ही इच्छा होती ती पूर्ण झालेली. एकदम जी मनात  target achieved feeling होते.  कोणालाच आम्ही ह्या कुंभमेळ्याला येण्याबद्दल सांगितले नव्हते कारण आम्हालाच खात्री नव्हती की हे घडू शकेल ..

तर अंघोळ झाल्यावर मेळ्यात tea कॉर्नरला मस्त आल्याचा चहा घेतला.

वाटेत एक आयुषवाल्यांचा  टेंट दिसला, एक बाई उभी होती, म्हणून तिच्याशी बोलायला मी आत शिरले की चौकशी करावी , तर ती म्हणे, ‘आम्ही इथे फक्त टॉयलेट साठी आलोय’, इथे राहत नाही. त्यांचा उरका पडल्यावर मग आम्ही पण तिथेच नंबर लावला, भरपूर पाणी आणि स्वच्छ टॉयलेट होते. देवाने एकदम रॉयल व्यवस्था केली आमची. Adult diaper वापरावे का की काय करावे ह्या विचारात होतो तर देवाने कोणतीच कसर सोडली नाही.

आता परत किनाऱ्यावर आलो, तर गंगा स्नानासाठी बोटी सुरू झालेल्या . संगमाच्या मध्यात नेऊन स्नान .. मग आम्ही नुसते तरी जाऊ म्हणून गेलो. संगमात नुसते प्रोक्षण केले. अगदी छान वाटली बोट ट्रिप. तिथेच एक जण होती, २५ शी मधलीच असेल , ती म्हणाली, ” कितना अच्छा लग रहा हैं, सब लोग बस एकही सोच रहे है, ऐसा लगता हैं की सब एकही माँ के बच्चे हैं ” ..इतक्या साध्या शब्दात तिने तिथल्या वातावरणाचे यथार्थ वर्णन केले. Vibes का काय ते !!

सूर्योदय बोटीतून पाहिला, परत आलो तर 8-30 होत आलेले. मग एक रामकथा 9-30 ला सुरू होणार होती, तिथ गेलो. वाटेत जाताना आखाडे बघत गेलो, तिथे 2 तास बसलो आणि साधारण 11 ला परत गाडीकडे आलो आणि वाराणसीकडे निघू असे सांगितले फक्त जेवणाचा वेळ सोडला तरी जवळपास वाट काढत वाराणसीत यायला 4 वाजले. तिथे गेलो तर तिथे खूप जास्त ट्रॅफिक, त्यात बुक केलेले हॉटेल जरा आत गल्लीमध्ये. मग गाडी सोडली, चालत हॉटेलवर पोचलो. लगेच ड्रेस change करून गंगा आरतीला गेलो. बोट ride, गंगा आरती सगळं छान झालं..

एकाने अर्ध्या तासात दर्शन करवतो म्हणून गळी उतरवले आणि मी फसले. त्याच्या मागे गेलो. दर्शन होईस्तो 10-15 झाले रात्रीचे !

आधीच्या रात्री अवनीश exam म्हणून लवकर उठलेले, मग संगमावर गाडीत जेमतेम अडीच तीन तास.. त्यामुळे सकाळी 4-30 विश्वेश्वर दर्शनला निघायचं प्लॅन कॅन्सल केला. 11-15 पर्यंत पोचलो हॉटेल वर , 12 च्या आसपास झोपलो.

सकाळी परत 4-15 ला जाग !

5-30 ला आवरून हॉटेल बाहेर आलो तर लगेच समोर रिक्षा. मग संकटमोचन हनुमानला गेलो, झक्कास दर्शन झाले , फार गर्दी नव्हती.

तिथून अस्सी घाटला सूर्योदय बघितला. आदल्या दिवशी आरती घ्यायला  मिळाली नव्हती , ती इथे मिळाली. तिथून मग कालभैरवला आलो, 8-30 च्या आसपास तेही झाले. मग विशालाक्षीचे दर्शन घ्यायचे ठरवले.

वाटेत वाराणसीच्या गल्ल्या मधून फिरलो, मग राम मिठाई भांडार लागले, तिथे फेमस कचोरी जिलेबीचा नाश्ता केला. मग भरपूर चालत गल्ली बोळ फिरत  विशालाक्षीला आलो. वाटेत बघितलं आज विश्वेश्वराला भूतो न भविष्यती गर्दी होती. मोठ्या line लागल्या होत्या .त्यामुळे मधल्या छोट्या गल्ल्या बंद केलेल्या .. 

आदल्या दिवशी दर्शन घेतले ते अगदी योग्य झालेले !

शक्ती पीठ असलेल्या विशालाक्षीचे दर्शन घेतले. मंदिर दक्षिणी पध्द्तीचे आहे पण खूप शांत वाटले. तिथली ऊर्जा जाणवत होती. 

मग मात्र लगेच हॉटेल वर आलो. फ्रेश झालो व टॅक्सी बुक केली. ट्रॅफिकमुळे टॅक्सीवाल्याने मेन रोडपर्यंत म्हणजे जवळपास 2 किमी चालत यायला suggest केले , जे आम्ही मान्य केले कारण गाड्या हालतच नव्हत्या , थांबून राहिलो तर आमचीच flight मिस झाली असती. 

चालत गेल्यावर लक्षात आले आमच्याकडे 1 तास हातात आहे. मग वाटेत सारनाथला जाऊ ठरले.

तिथे गेल्यावर बरीच निराशाच झाली. एवढी सुंदर मंदिरे, त्यावरचे कोरीव काम आपल्या सनातनी मंदिरांची असताना आमच्या लहानपणी कधीही अभ्यासात त्याबद्दल शिकवले गेले नाही आणि ह्या सारनाथबद्दल मात्र मलाच नव्हे तर माझ्या लेकीच्या अभ्यासात पण अजून त्याबद्दल माहिती आहे. पण काशीबद्दल नाही हे लक्षात आल्यावर चिडचिड झाली. असो .

परमेश्वराचीच इच्छा , त्याला जेव्हा प्रकट व्हायचे असेल तेव्हा तो नक्की होईलच फक्त आपला तो विश्वास कायम हवा. 

एक मात्र नक्की …. 

होतं  ते बऱ्यासाठीच हा माझा विश्वास ह्या ट्रिपनंतर नक्कीच बळावला..

लेखिका : सौ. प्राची सहस्रबुद्धे – वेलणकर

प्रस्तुती : सौ.  उज्ज्वला सहस्रबुद्धे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ||◆||  नंदकुमार  सप्रे  ||◆|| – लेखक : श्री सुनील होरणे ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ||◆||  नंदकुमार  सप्रे  ||◆|| – लेखक : श्री सुनील होरणे ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर

मध्यंतरी  एका अंत्यविधीसाठी अमरधाम मध्ये गेलो होतो. जवळचे नातेवाईक आणि

मृताच्या घरचे लोक चितेच्या ओट्याजवळ तयारी करत होते. इतर जे परिचित हजेरी लावण्यासाठी आले होते, ते नेहमी प्रमाणे समोरच्या पायऱ्यांवर एकमेकांची ख्याली खुशाली विचारत हास्य विनोदात दंग होते. 

सर्व विधी पूर्ण झाल्यावर एक गृहस्थ तिथे आले. त्यांच्या हातात एक पिशवी होती. त्या पिशवीत दोन तीन पाण्याच्या बाटल्या आणि एक थर्मास होता. मृताच्या घरच्या लोकांना त्याने पाणी पिण्यास दिलं आणि नंतर पेपर कपमध्ये चहा प्यायला दिला. कोणी नातेवाईक असावेत असं मला वाटलं.

या घटनेनंतर बऱ्याच दिवसांनी मी नोबल हॉस्पिटलमध्ये कोणाला तरी भेटायला गेलो होतो. ऑपरेशन थिएटरच्या बाहेर बरेच लोक बसले होते. बहुधा त्यांच्या कोणा नातेवाईकांचं आत ऑपरेशन चालू असावं. आणि अचानक बघितलं तर त्या दिवशी अमरधाम मध्ये दिसलेले ते गृहस्थ इथं देखील त्या बसलेल्या लोकांना चहा देत होते. आता माझी उत्सुकता वाढली. थोड्या वेळाने सर्वांना चहा देऊन ते थोडे बाजूला आले, मी ताबडतोब त्यांच्या जवळ गेलो….. 

” नमस्कार !” मी म्हटलं. त्यांना हे अपेक्षित नसावं… ते कावरे बावरे होऊन माझ्याकडं बघू लागले. मी

पुन्हा नमस्कार केला, या वेळी त्यांनी फक्त मान हलवली. 

” आपलं नाव काय? ” मी विचारलं. त्यांचा पुन्हा प्रश्नार्थक चेहरा. यावेळी कपाळावर आठया देखील.  

“तुमचं नाव सांगा.” त्यांनी तुटकपणे मलाच उलटा प्रश्न केला. आता मी त्यांच्या जवळ गेलो, त्यांचे दोन्ही हात हातात घेतले आणि म्हणालो, 

” अहो महाराज, माझं नाव प्रशांत कदम. मला तुमच्याशी थोडं बोलायचं होतं म्हणून नाव विचारलं.

आपण दोन मिनिटं बोलू शकता का?”

“नाही.” समोरून फटकन उत्तर आलं. आता मला धक्के पचवायची सवय झाली होती.

“नाही म्हणजे आत्ता नाही कारण आत्ता मला आणखी बऱ्याच ठिकाणी जायचंय. आपण नंतर कधीतरी

भेटू. आणि माझं नाव नंदू… म्हणजे नंदकुमार सप्रे.”

…. एवढं बोलून ते तरा तरा चालायला लागले. मी त्यांच्या पाठमोऱ्या छबी कडे बघतच राहिलो. साधारण साडेपाच फूट उंची,  मध्यम किंवा त्यापेक्षा बारीक शरीरयष्टी, अंगात पांढरा शर्ट आणि पायजमा, पायात चपला…  अहो हा माणूस बोलायला तयार नाही.

…. पण एक गोष्ट लक्षात आली. याला कुठंतरी काहीतरी दुःख आहे, वेदना आहेत. आणि त्या दिवसापासून

माझा त्याच्यातील इंटरेस्ट वाढू लागला. आता याला पुन्हा एकदा भेटलं पाहिजे.

आणि तो दिवस लवकरच आला. मी कुठंतरी चाललो होतो आणि हे महाराज रस्त्याच्या कडेला सायकल हातात धरून उभे होते. बहुधा कोणाची तरी वाट पहात असावेत. मी ड्रायव्हरला गाडी बाजूला घ्यायला सांगितले आणि पटकन खाली उतरून सप्रेच्या समोर जाऊन उभा राहिलो.

“सप्रे कोणाची वाट बघताय?” मी.

“नाही वाट नाही बघत, सायकल पंक्चर झालीय.”

“अरेच्चा, थांबा आपण पंक्चर काढायची व्यवस्था करू.” मी ड्रायव्हरला बोलावून सायकल पंक्चर

काढायला पाठवलं.

“अहो तुम्ही कशाला त्रास घेता, मी आणली असती करून.” सप्रे कसनुसा चेहरा करून म्हणाले.

“असू द्या हो सप्रे, चला आपण तोपर्यंत गाडीत बसून बोलू.”  सप्रे अक्षरशः बळजबरीने गाडीत येऊन बसले.

अतिशय अस्वस्थ झाले होते. मी बोलायला सुरुवात केली, 

“सप्रे ही चहाची काय भानगड आहे? जरा सांगता का?”  सप्रे गप्प. मला कळेना हा माणूस असा का वागतोय, धड बोलत देखील नाही… आणि माझं लक्ष्य त्यांच्या चेहऱ्याकडे गेलं, अहो हा माणूस रडत होता. त्याच्या दोन्ही डोळ्यातून अश्रूच्या धारा वहात होत्या. मला एकदम अपराधी असल्यासारखं वाटलं. मी दोन्ही हातांनी सप्रेना धरलं … 

“सप्रे मला माफ करा. तुम्हाला दुखवायचा माझा हेतू नव्हता. जाऊ द्या, मला काही सांगू नका पण

कृपा करून तुम्ही शांत व्हा. पुन्हा मी तुम्हाला असले प्रश्न विचारणार नाही. I am sorry.”

दोन तीन मिनिटांनी सप्रे शांत झाले आणि त्यांनी बोलायला सुरुवात केली…. 

 ” प्रशांतजी, आजपर्यंत या विषयावर मी कोणाशी बोललो नाही. पण आज मी तुम्हाला सगळं सांगणार, याचं कारण असं आहे की, फक्त तुम्ही एकट्यानेच हा प्रश्न मला विचारला. मी आणि माझी पत्नी दोघेही सरकारी अधिकारी. मुलगा आणि सून दोघेही अमेरिकेत. तीन वर्षांपूर्वी पत्नीचे कोविडमध्ये निधन झाले. आम्ही दोघेही बाधित होतो. मला हॉस्पिटल मिळालं, तिला खाजगी हॉस्पिटल मिळालं नाही म्हणून सरकारी दवाखान्यात ऍडमिट केलं आणि चौथ्या दिवशी ती गेली.  इथं मी कोणालाही दोष देऊ इच्छित नाही, कारण

परमेश्वरावर माझा पूर्ण विश्वास आहे. तिची वेळ भरली होती, त्यामुळे ती गेली, एवढंच सत्य आहे. आणि मुळातच एकदा माणूस गेल्यावर त्याची कारणमीमांसा तपासत बसू नये असं मला वाटतं. तिला चहा फार आवडायचा, दिवसातून चार पाच वेळा तरी ती चहा घेत असे. दुर्दैवाचा भाग असा की तिला हॉस्पिटलमध्ये चार दिवसात एकदाही चहा मिळाला नाही. आणि या गोष्टीचं मला सगळ्यात जास्त वाईट वाटलं आणि त्याच वेळी मी ठरवलं की आपण काहीतरी करायचं.  माणूस गेल्यानंतर त्याचे जवळचे नातेवाईक जास्त दुःखी असतात. आणि त्यांना काही हवंय का? हे देखील कुणी विचारत नाही. म्हणून मी थेट स्मशानभूमीत जाऊन ही सेवा देतो. त्यांच्या समाधानी चेहऱ्यात मला माझ्या पत्नीचा चेहरा दिसतो. हॉस्पिटलमध्ये गंभीर पेशंटचे नातेवाईक अतिशय तणावात असतात. त्यांना मी जाऊन भेटतो. चहा देतो, चौकशी करतो आणि दिलासा देतो. थोडा वेळ का होईना पण त्यांना बरं वाटतं. मी रिटायर असल्याने माझ्याकडे भरपूर वेळ आहे. सुदैवाने आर्थिक परिस्थिती चांगली आहे. मोठा बंगला आहे आणि मी एकटाच आहे. म्हणून तिथं

पंधरा अनाथ विद्यार्थ्यांची राहण्याची सोय केलीय.”

……. मी प्रचंड भारावून गेलो होतो. काय बोलावे हे देखील मला कळत नव्हते….. 

“सप्रे तुम्ही फार मोठं काम करताय, You are great.” एवढंच मी बोलू शकलो. 

सप्रेची सायकल तयार होऊन आली होती. सप्रे गाडीतून उतरले, मला त्यांचं व्हिजिटिंग कार्ड दिलं आणि ते निघून गेले. त्यांच्या पाठमोऱ्या आकृतीकडे बघत मी फक्त नतमस्तक झालो.

त्यानंतर सप्रेची आणि माझी गाठ भेट नाही. एक दिवस कोणीतरी सप्रे गेले असं सांगितलं. मी सप्रेच्या घरी गेलो. बंगल्याच्या गेटवर मोठा बोर्ड होता .. “मालती सप्रे मेमोरियल ट्रस्ट” . आत एक जोशी नावाचे मॅनेजर होते. त्यांनी सांगितलं इथं राहणारे विद्यार्थीच आता सप्रेचं काम करतात.

…… मला आनंद चित्रपटातला शेवटचा प्रसंग आठवला.

….. राजेश खन्ना मरतो आणि नंतर अमिताभ तिथं येतो. त्यावेळी तो दोन वाक्य बोलतो.

“आनंद मरा नहीं,  आनंद मरते नहीं।” 

लेखक : श्री सुनील होरणे 

संग्राहक : श्री मोहन निमोणकर

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares